Friday, October 16, 2026
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Right to Be Forgotten: केस रद्द होने के बाद इंटरनेट पर नाम रखने का कोई जनहित नहीं…ABC नाम से मास्क होंगे अदालती रिकॉर्ड, मामला यहां पढ़ें

Right to Be Forgotten: डिजिटल युग में किसी व्यक्ति के करियर और सामाजिक प्रतिष्ठा को बचाने की दिशा में बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ ने एक बेहद महत्वपूर्ण और प्रगतिशील फैसला सुनाया है।

संविधान के तहत निजता का अधिकार प्रदत्त: अदालत

हाईकोर्ट की जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के और जस्टिस निवेदिता पी. मेहता की खंडपीठ ने एक पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन सलाहकार (Consultant) की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट रजिस्ट्री को उसके सभी डिजिटल अदालती रिकॉर्ड्स से नाम और व्यक्तिगत पहचान हटाने (Anonymise) का सख्त आदेश दिया है। अदालत ने कहा, संविधान के तहत निजता का अधिकार (Right to Privacy) एक सुस्थापित मौलिक अधिकार है, और इसी के भीतर ‘भूल जाने का अधिकार’ (Right to Be Forgotten) भी शामिल है। सूचना तक पहुंच लोकतंत्र का एक बुनियादी हिस्सा है, लेकिन इसे किसी व्यक्ति की निजता और सम्मान के अधिकार की कीमत पर नहीं दिया जा सकता। विशेष रूप से तब, जब अदालत द्वारा आपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह रद्द (Quash) कर दिया गया हो, तब इंटरनेट पर उस व्यक्ति की व्यक्तिगत जानकारी को जिंदा रखने से किसी भी प्रकार का जनहित (Public Interest) सिद्ध नहीं होता।

मामला क्या है?: ‘एल्गोरिद्मिक स्थायित्व’ (Algorithmic Permanence) बना करियर का विलन

यह मामला एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा है जिसका एक पुराना कानूनी विवाद सालों पहले ही खत्म हो चुका था।

रद्द हो चुका था पुराना केस: याचिकाकर्ता के खिलाफ साल 2017 में एक एफआईआर (FIR) दर्ज की गई थी, जिसके बाद उसने 2018 में अग्रिम जमानत के लिए हाई कोर्ट का रुख किया था। बाद में, दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से समझौता हो जाने के कारण हाई कोर्ट ने उस एफआईआर को पूरी तरह से रद्द (Quash) कर दिया था।

बैकग्राउंड वेरिफिकेशन में आ रही थी दिक्कत: केस भले ही खत्म हो गया था, लेकिन जिला अदालत और हाई कोर्ट के अन-रेडैक्टेड (बिना नाम छुपाए) रिकॉर्ड इंटरनेट पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध थे और गूगल जैसे सर्च इंजनों द्वारा इंडेक्स किए जा रहे थे।

कैरियर और परिवार पर असर: जब भी याचिकाकर्ता के पेशेवर (Professional) या शैक्षिक बैकग्राउंड की जांच (Background Check) होती थी, तो इंटरनेट पर यह पुराना केस तुरंत सामने आ जाता था। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि इंटरनेट का यह ‘एल्गोरिद्मिक स्थायित्व’ (हमेशा के लिए डेटा दर्ज रहना) उसके करियर के आगे बढ़ने में गंभीर बाधा बन रहा है और उसकी नाबालिग बेटी व परिवार को सामाजिक कलंक (Social Stigma) झेलना पड़ रहा है।

हाई कोर्ट का फैसला: अब असली नाम की जगह लिखा जाएगा “ABC”

हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों को पूरी तरह जायज माना और उसकी प्रतिष्ठा व निजता की रक्षा के लिए निम्नलिखित निर्देश जारी किए।

सर्च रिजल्ट से हटेगा नाम

अदालत ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वह ऑनलाइन वर्जन वाले सभी आदेशों और फैसलों से याचिकाकर्ता का नाम और उसकी व्यक्तिगत पहचान उजागर करने वाले विवरणों को तुरंत हटाए या मास्क (Mask) करे, ताकि सर्च इंजन के परिणामों में वह दिखाई न दे।

‘ABC’ की पहचान के साथ दर्ज होगा केस

पीठ ने आदेश दिया कि भविष्य में इस मामले से जुड़े कॉज़ टाइटल (Cause Title), दलीलों, साइटेशन्स, फैसलों या आदेशों में याचिकाकर्ता का असली नाम कभी भी नहीं दिखाई देगा। उसके स्थान पर केवल सांकेतिक नाम “ABC” का उपयोग किया जाएगा।

विधिक केस शीट: बॉम्बे हाई कोर्ट ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ समीक्षा (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय
संबंधित अदालतबॉम्बे उच्च न्यायालय, नागपुर पीठ (Nagpur Bench of Bombay HC)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के और जस्टिस निवेदिता पी. मेहता
केस संदर्भABC बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य
मूल कानूनी मुद्दाराइट टू बी फॉरगॉटन (भूल जाने का अधिकार) और डिजिटल प्राइवेसी।
अदालत का अंतिम आदेशरजिस्ट्री को सभी ऑनलाइन अदालती रिकॉर्ड से नाम हटाकर उसे ‘ABC’ के रूप में बदलने का निर्देश।
याचिकाकर्ता के वकीलएडवोकेट एस.बी. तिवारी

बॉम्बे हाई कोर्ट का यह फैसला यह साफ संदेश देता है कि टेक्नोलॉजी को इंसानी जिंदगी को तबाह करने का जरिया नहीं बनने दिया जा सकता। ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ को बढ़ावा देने वाला यह निर्णय उन हजारों लोगों के लिए एक बड़ी राहत है जो कोर्ट से तो बरी हो चुके हैं, लेकिन इंटरनेट की दुनिया में आज भी अदालती चक्कर काट रहे हैं।

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