Manual Scavenging: देश में हाथ से मैला ढोने और बिना सुरक्षा उपकरणों के सेप्टिक टैंक साफ करने के दौरान होने वाली मौतों पर बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने एक बेहद युगांतकारी और संवेदनशील फैसला सुनाया है।
राज्य सरकार पीड़ित परिवार को ₹30-30 लाख का मुआवजा दे
हाईकोर्ट के जस्टिस नितिन सूर्यवंशी और जस्टिस वैशाली पाटिल-जाधव की खंडपीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि निजी तौर पर काम पर रखे गए सफाईकर्मियों की मौत के मामले में भी राज्य सरकार पीड़ित परिवार को ₹30-30 लाख का मुआवजा देने के लिए सीधे तौर पर उत्तरदायी है। सरकार बाद में यह रकम उस मकान मालिक से वसूल (Recover) कर सकती है।
हाथ से मैला ढोने की प्रथा आज भी कलंक है: हाईकोर्ट
अदालत ने कहा, हाथ से मैला ढोने (Manual Scavenging) की प्रथा का आज भी वजूद में होना हमारे सभ्य समाज पर एक गंभीर कलंक है और इस अमानवीय प्रथा को पूरी तरह से खत्म न कर पाना हमारी सामूहिक विफलता को दर्शाता है। सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान होने वाली मौतें गरिमा, समानता और बंधुत्व के संवैधानिक वादों की विफलता हैं। राज्य सरकार इस जिम्मेदारी से अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती कि मरने वाले सफाईकर्मियों को किसी सरकारी संस्था ने नहीं, बल्कि एक निजी गृहस्वामी (Private Home Owner) ने काम पर रखा था।
पूरा मामला क्या है?: 2021 में नांदेड़ के प्राइवेट घर में हुई थी त्रासदी
यह कानूनी लड़ाई नांदेड़ जिले के एक निजी आवास में घटित बेहद दर्दनाक हादसे से जुड़ी है।
बिना सुरक्षा गियर के सफाई और मौत: साल 2021 में दो दिहाड़ी मजदूरों को नांदेड़ के एक निजी घर में बिना किसी सुरक्षा उपकरण या आधिकारिक अनुमति के सेप्टिक टैंक साफ करने के लिए बुलाया गया था। टैंक के भीतर जहरीली गैस के कारण दम घुटने (Asphyxia) और डूबने से दोनों मजदूरों की मौत हो गई।
मकान मालिक पर केस और नाममात्र मुआवजा: घटना के बाद मकान मालिकों के खिलाफ ‘हाथ से मैला ढोने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013’ (PEMSR Act) के तहत मामला दर्ज किया गया। मकान मालिक ने दोनों परिवारों को ₹2-2 लाख और अंतिम संस्कार के लिए ₹50,000 देने पर सहमति जताई, लेकिन पीड़ितों को इसका भी केवल एक हिस्सा ही मिला।
अदालत का दरवाजा खटखटाया: अक्टूबर 2023 में पीड़ितों के परिजनों ने जिला कलेक्टर से सुप्रीम कोर्ट के ‘सफाई कर्मचारी आंदोलन’ फैसले के तहत ₹10 लाख मुआवजे की मांग की। जब वहां से मदद नहीं मिली, तो उन्होंने विख्यात वकील आभा सिंह के माध्यम से बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दायर की।
सरकार का बहाना खारिज: सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र सरकार ने अपने बचाव में साल 2019 के एक सरकारी प्रस्ताव (GR) का हवाला दिया। सरकार का तर्क था कि चूंकि यह एक निजी हायरिंग (Private Hiring) का मामला था, इसलिए मुआवजे की पूरी वित्तीय देनदारी उस व्यक्तिगत मकान मालिक की है, सरकार की नहीं।
हाई कोर्ट की पीठ ने सरकार के इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए निम्नलिखित विधिक सिद्धांत तय किए।
कार्यस्थल चाहे जो हो, वित्तीय जिम्मेदारी सरकार की
जस्टिस सूर्यवंशी ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक मामलों (सफाई कर्मचारी आंदोलन और बलराम सिंह) का हवाला देते हुए कहा कि अदालत पहले ही यह पूरी तरह साफ कर चुकी है कि सीवर मौतों में मुआवजे के निर्देश कार्यस्थल की प्रकृति से परे जाकर लागू होते हैं। यानी सफाईकर्मी को चाहे सरकार ने काम पर रखा हो या किसी आम नागरिक ने, पहली वित्तीय जिम्मेदारी राज्य (State) की ही होगी।
डॉ. आंबेडकर के विचारों का स्मरण
अदालत ने पीड़ित परिवारों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए संविधान निर्माता डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के ‘मानव व्यक्तित्व की पुनर्प्राप्ति’ (Reclamation of Human Personality) के सिद्धांतों को याद किया। कोर्ट ने कहा कि ऐसी मौतें देश के नागरिकों को संविधान द्वारा दिए गए गरिमापूर्ण जीवन के वादे को पूरा करने में हमारी विफलता को दर्शाती हैं।
केस शीट: बॉम्बे हाई कोर्ट मैनुअल स्केवेंजिंग मुआवजा समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय, औरंगाबाद पीठ (Aurangabad Bench of Bombay HC) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस नितिन सूर्यवंशी और जस्टिस वैशाली पाटिल-जाधव |
| केस का शीर्षक | शारदा मारोती चोपवाड व अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य |
| मुआवजे की संशोधित राशि | ₹30,00,000 (तीस लाख रुपये) प्रत्येक मृतक के परिवार को |
| लागू अधिनियम | PEMSR एक्ट, 2013 (हाथ से मैला ढोने का प्रतिषेध अधिनियम) |
| अदालत का अंतिम आदेश | राज्य सरकार तुरंत ₹30 लाख का भुगतान करे; बाद में प्राइवेट मकान मालिक से इसे वसूलने की छूट। |
रिकवरी क्लॉज: सरकार के पास है पैसे वसूलने का हक
कोर्ट ने अपने आदेश में संतुलन बनाए रखने के लिए राज्य सरकार को एक विधिक रास्ता भी दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार पीड़ित परिवारों को तुरंत अपने खजाने से ₹30-30 लाख की बढ़ी हुई मुआवजा राशि का भुगतान करे। इसके बाद, प्रशासन कानून सम्मत प्रक्रिया अपनाकर इस पूरी राशि को उस निजी गृहस्वामी (मकान मालिक) की संपत्ति या संसाधनों से वसूल (Recover) करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।
इस मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रसिद्ध अधिवक्ता आभा सिंह और अविनाश एम. रेड्डी पेश हुए, जबकि राज्य सरकार का पक्ष एडिशनल गवर्नमेंट प्लीडर पी.के. लखोटिया ने रखा।
अदालत ने साफ कर दिया है कि कल्याणकारी राज्य (Welfare State) होने के नाते सरकार अपनी आंखें नहीं मूंद सकती। मकान मालिक की गलती का खामियाजा मृतक के अनाथ बच्चों को नहीं भुगतना पड़ेगा। सरकार पहले मुआवजा दे, और फिर रसूखदार मकान मालिकों से खुद निपटे। न्याय की यही असली परिभाषा है।

