Friday, July 17, 2026
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Acid On Father: पिता पर तेजाब फेंकने वाले बेटे के प्रति असाधारण’ ढिलाई बरतने पर क्यूं कहा…अंधाधुंध सहानुभूति का कानून में कोई स्थान नहीं

Acid On Father: अपने ही पिता पर तेजाब (Acid) फेंककर उनकी जान लेने वाले एक कलयुगी बेटे को महज 3 साल की मामूली सजा सुनाने वाले ट्रायल जज के रवैये पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद कड़ा ऐतराज जताया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस संतोष राय की एकल पीठ ने निचली अदालत द्वारा दिखाई गई “असाधारण और अनुचित सहानुभूति” की तीखी भर्त्सना की, जिसके कारण दोषी पर हत्या (IPC 302) के बजाय केवल गंभीर चोट पहुंचाने (IPC 326) का मुकदमा चलाया गया था। अदालत ने कहा, न्यायिक विवेक कभी भी न्यायिक मनमानी (Judicial Arbitrariness) का पर्याय नहीं हो सकता। जहां कानून और सबूत एक तर्कसंगत और न्यायपूर्ण फैसले की मांग करते हैं, वहां गलत जगह दिखाई गई सहानुभूति या अनुचित ढिलाई (Misplaced Leniency) के लिए कोई स्थान नहीं है। न्यायिक सहानुभूति कभी भी कानून से ऊपर नहीं हो सकती।

मामला क्या है?: 1981 की घटना और 40 साल का कानूनी इंतजार

यह विधिक विवाद करीब 45 साल पुराना है, जो गोरखपुर की एक दर्दनाक घटना से जुड़ा है।

क्या थी घटना: 5 सितंबर 1981 को गोरखपुर में आरोपी रज्जाक का अपने पिता ‘गुलाम हुसैन’ से घर के भीतर झगड़ा हुआ था। बहस के दौरान रज्जाक ने अपने पिता पर तेजाब उड़ेल दिया। पिता करीब 60% झुलस गए थे और अस्पताल में तीन हफ्ते तक जिंदगी और मौत की जंग लड़ने के बाद सेप्टीसीमिया (इंफेक्शन) के कारण दम तोड़ दिया।

ट्रायल कोर्ट की नरमी: हालांकि पुलिस ने हत्या (धारा 302) का मामला दर्ज किया था, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने रज्जाक को केवल IPC की धारा 326 (खतरनाक हथियारों/रसायनों से गंभीर चोट पहुंचाना) के तहत दोषी माना और केवल 3 साल की सश्रम कैद की सजा सुनाई। यहां तक कि कोर्ट ने दोषी पर कोई जुर्माना भी नहीं लगाया, जो कानूनन अनिवार्य था।

आरोपी की दलील: 40 साल से अधिक समय तक अपील लंबित रहने के बाद, रज्जाक (जो अब 60 वर्ष से अधिक का बुजुर्ग हो चुका है) ने दलील दी कि यह एक दुर्घटना थी और वह अपने पिता को बचाते हुए खुद भी झुलस गया था। उसने बढ़ती उम्र का हवाला देकर प्रोबेशन (Probation – अच्छे आचरण के आधार पर रिहाई) का लाभ देने की गुहार लगाई थी।

हाई कोर्ट का कड़ा रुख: “यह न्याय का मखौल है”

जस्टिस संतोष राय ने दोषी रज्जाक की अपील को सिरे से खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले में कई गंभीर खामियां और विसंगतियां पाईं:

मृत्यु पूर्व बयान (Dying Declaration) वैध: हाई कोर्ट ने पीड़ित पिता द्वारा अस्पताल में जांच अधिकारी को दिए गए बयान को साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) के तहत ‘डाइंग डिक्लेरेशन’ के रूप में पूरी तरह वैध और विश्वसनीय माना।

सहानुभूति का दावा खारिज: कोर्ट ने कहा कि आरोपी के शरीर पर मामूली खरोंचें थीं, जबकि पिता 60% झुलस चुके थे। अपराध के बाद रज्जाक पिता को अस्पताल ले जाने के बजाय मौके से भागने की कोशिश कर रहा था, जिसे ग्रामीणों ने पकड़ा। यह उसका दुर्भावनापूर्ण आचरण (Mala fide conduct) दर्शाता है।

हत्या या गैर-इरादतन हत्या का मामला: हाई कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि ट्रायल जज सबूतों का सही मूल्यांकन करने में विफल रहे। उन्हें यह जांचना चाहिए था कि क्या यह मामला धारा 302 (हत्या) या कम से कम धारा 304 (गैर-इरादतन हत्या) के तहत आता है, न कि इसे महज एक चोट पहुंचाने (धारा 326) का साधारण मामला मान लेना चाहिए था।

मजबूरन सजा में बढ़ोतरी नहीं, पर सरेंडर का आदेश

सुप्रीम कोर्ट के स्थापित नियमों के कारण हाई कोर्ट चाहकर भी दोषी की सजा को हत्या की धारा में नहीं बदल सका।

कानूनी अड़चन: चूंकि राज्य सरकार (उत्तर प्रदेश सरकार) ने सजा बढ़ाने या धारा बदलने के खिलाफ कोई अपील या पुनरीक्षण (Revision) याचिका दायर नहीं की थी, इसलिए केवल आरोपी की अपील पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट कानूनन उसकी सजा को बढ़ा नहीं सकता था।

अंतिम आदेश: कोर्ट ने रज्जाक की अपील और प्रोबेशन की मांग को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने उसे दो सप्ताह के भीतर अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण (Surrender) करने और अपनी बची हुई जेल की सजा काटने का सख्त निर्देश दिया है।

विधिक केस शीट: इलाहाबाद हाई कोर्ट एसिड अटैक एवं न्यायिक संयम समीक्षा (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस संतोष राय (Justice Santosh Rai)
मामले की पृष्ठभूमिसितंबर 1981 एसिड अटैक (गोरखपुर, यूपी)
मुख्य कानूनी धाराएंआईपीसी की धारा 326 (दोषी ठहराया गया) | धारा 302 (हत्या – ट्रायल कोर्ट द्वारा उपेक्षित)
अदालत का अंतिम फैसलादोषी की अपील और प्रोबेशन की मांग खारिज; 2 सप्ताह में सरेंडर करने का आदेश।

यह केस इस बात की भी याद दिलाता है कि राज्य सरकारों की कानूनी लापरवाही (अपील न दायर करना) कैसे गंभीर अपराधियों को बड़ी सजा से बचा लेती है। कानून का राज तभी स्थापित हो सकता है जब जांच, अभियोजन और न्याय की तीनों कड़ियां मुस्तैदी से अपना काम करें।

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