Sunday, August 30, 2026
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Law Puzzle: कानून आम आदमी के लिए है, इसे जितना हो सके सरल बनाएं…कानूनों को पहेली के बजाय उदाहरण से जोड़ने की वकालत क्यों की

Law Puzzle: बार-बार होने वाले विधायी संशोधनों और उनकी जटिल भाषा के कारण पैदा होने वाले कानूनी विवादों पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक बेहद व्यावहारिक और महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।

विधायिका कानून बनाए तो लागू होने की तिथि से लेकर तमाम चीजें स्पष्ट करें

हाईकोर्ट के जस्टिस अनंत रामनाथ हेगड़े की एकल पीठ ने ‘ओंकारा एसेट रिकंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड बनाम आधिकारिक परिसमापक बीपीएल इंजीनियरिंग लिमिटेड’ (Omkara Asset Reconstruction Private Limited v The Official Liquidator BPL Engineering Limited) मामले में फैसला सुनाते हुए कानूनों को सरल बनाने के लिए एक पुरानी और बेहतरीन परंपरा को पुनर्जीवित (Revive) करने की पुरजोर वकालत की है। अदालत ने कहा, कानून आम आदमी के लिए होता है और इसे सबसे सरल तरीके से तैयार किया जाना चाहिए। कानून को कभी भी कोई पहेली (Puzzle) नहीं बनना चाहिए। विधायिका (Legislature) जब भी कोई नया कानून बनाए या संशोधन करे, तो उसे स्पष्ट शब्दों में यह बताना चाहिए कि यह किस तारीख से और कैसे लागू होगा, ताकि अदालतों में भ्रम की स्थिति न बने।”

मामला क्या है?: सरफेसी एक्ट (SARFAESI Act) में संशोधन की तारीख पर विवाद

यह पूरा मामला एक वित्तीय विवाद के दौरान कानून के ‘भूतलक्षी प्रभाव’ (Retroactive Operation) को समझने की जटिलता से उपजा था।

विवाद की पृष्ठभूमि: ओंकारा एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी और आंध्र प्रदेश के वाणिज्यिक कर विभाग (CTD) के बीच एक बंद हो चुकी कंपनी (BPL Engineering) की जमीन की नीलामी और वसूली को लेकर विवाद था।

प्राथमिकता का दावा: ओंकारा कंपनी ने सरफेसी अधिनियम की धारा 26E का हवाला देते हुए दावा किया कि एक ‘सुरक्षित लेनदार’ (Secured Creditor) होने के नाते, बैंक के कर्ज की वसूली का अधिकार सरकारी टैक्स बकाए से पहले (Priority) आता है।

तारीख का पेंच: यह धारा 26E साल 2016 में जोड़ी गई थी और 2020 में लागू हुई थी। लेकिन इस मामले में जो जमीन रेहन (Mortgage) रखी गई थी और टैक्स की कुर्की हुई थी, वे सभी घटनाएं 2020 से पहले की थीं। अदालत के सामने मुख्य पहेली यह थी कि क्या 2020 में लागू हुई धारा, पुराने मामलों पर भी लागू (Retroactive) होगी या नहीं?

कोर्ट का फैसला: कोर्ट ने टैक्स विभाग के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों के अनुसार, धारा 26E भविष्यलक्षी (Prospective) रूप से काम करती है और यह राज्य के टैक्स कानूनों के तहत बनने वाले ‘संवैधानिक प्रथम प्रभार’ (Statutory First Charge) को खारिज नहीं कर सकती। इसलिए टैक्स विभाग जमीन बेचकर अपना बकाया वसूल सकता है।

हाई कोर्ट की दो महत्वपूर्ण विधिक सिफारिशें

इस जटिल कानूनी बहस के बाद जस्टिस अनंत रामनाथ हेगड़े ने विधायिका (संसद और विधानसभाओं) को कानून निर्माण की प्रक्रिया सुधारने के लिए दो बेहद अहम सुझाव दिए।

कानूनों में ‘उदाहरणों’ (Illustrations) की परंपरा को दोबारा शुरू करें

अदालत ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC, 1860), भारतीय अनुबंध अधिनियम (Contract Act, 1872), संपत्ति अंतरण अधिनियम (Transfer of Property Act, 1882) और हाल ही में बने भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) व भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) जैसे कानूनों में धाराओं के नीचे व्यावहारिक ‘उदाहरण’ (Illustrations) दिए जाते हैं। ये उदाहरण धारा के असली कानूनी अर्थ को तुरंत स्पष्ट कर देते हैं।

“जाने-अनजाने या अनजाने में विधायिका इस शानदार और मूल्यवान परंपरा को भूलती जा रही है। अब समय आ गया है कि इसे फिर से जीवित किया जाए। जहां भी आवश्यक हो, संशोधनों या नए कानूनों में उदाहरण शामिल करने से न्याय वितरण प्रणाली से जुड़े सभी पक्षों (जजों, वकीलों और आम जनता) को बड़ी मदद मिलेगी।”

संशोधन prospective है या retrospective, यह साफ-साफ लिखें

अदालत ने दुख जताया कि जब कानूनों में बार-बार संशोधन होते हैं, तो यह स्पष्ट नहीं होता कि वे पुराने मामलों पर लागू होंगे या नहीं। इससे अलग-अलग अदालतों की न्यायिक राय (Judicial Opinions) अलग हो जाती है और मुकदमों की बाढ़ आ जाती है।

“विधायिका के लिए यह हमेशा वांछनीय होगा कि वह कोई भी संशोधन लाते समय स्पष्ट शब्दों में लिखे कि कानून भविष्यलक्षी (Prospective) है, भूतलक्षी (Retrospective) है, या क्रियाशील भूतलक्षी (Retroactive) है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अतिरिक्त रूप से यह भी निर्धारित किया जाना चाहिए कि यह संशोधन पहले से लंबित पड़े मुकदमों और पुराने लेन-देन पर किस तरह लागू होगा।”

केस शीट: कर्नाटक हाई कोर्ट वैधानिक प्रारूपण और सरफेसी विवाद समीक्षा (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और मुख्य टिप्पणियां
संबंधित अदालतकर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस अनंत रामनाथ हेगड़े
मुख्य पक्षकारओंकारा एसेट रिकंस्ट्रक्शन बनाम वाणिज्यिक कर विभाग (AP)
प्रासंगिक कानून और धारासरफेसी अधिनियम (SARFAESI Act), 2002 की धारा 26E
अदालत का मुख्य संदेश“कानून आम आदमी के लिए है, इसे पहेली न बनाएं, भाषा को सरल रखें।”
अंतिम निर्णयधारा 26E को भविष्यलक्षी माना; टैक्स विभाग को वसूली की अनुमति दी गई।
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