Saturday, September 26, 2026
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Juvenile Justice: JJB के आदेश के खिलाफ अपील सुनते समय बाल मनोवैज्ञानिक की मदद लेना…यह कोई अनिवार्य नहीं, इस फैसले को समझें

केस एवं विधिक सारांश (Overview Matrix)

विधिक/प्रशासनिक बिंदुविवरण (August 2026)
माननीय पीठन्यायमूर्ति जे.बी. पारडीवाला एवं न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान (सुप्रीम कोर्ट)
संबंधित अधिनियमJuvenile Justice Act, 2015 (Sections 15 & 101(2))
मुख्य कानूनी सिद्धांत1. Section 15(1) के तहत JJB द्वारा Child Psychologist की सलाह लेना अनिवार्य है।
2. Section 101(2) के तहत अपीलीय अदालत (Sessions Court) के लिए विशेषज्ञ की मदद लेना अनिवार्य नहीं, बल्कि स्वविवेक (Discretionary) पर निर्भर है।
अदालत का अंतिम आदेशपटना उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार; अपील निष्पादित।

Juvenile Justice: सुप्रीम कोर्ट ने जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन्स) एक्ट, 2015 [JJ Act, 2015] के तहत एक महत्वपूर्ण विधिक व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि जेजे बोर्ड (JJB) के आदेश के खिलाफ धारा 101(2) के तहत अपील सुन रही सत्र अदालत (Sessions Court) के लिए बाल मनोवैज्ञानिक या विशेषज्ञ की सहायता लेना अत्यावश्यक/अनिवार्य (Mandatory) नहीं है।

न्यायाधीश जे.बी. पारडीवाला और न्यायाधीश उज्ज्वल भुयान की पीठ ने स्पष्ट किया कि धारा 15(1) के तहत जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) के लिए विशेषज्ञ की सलाह लेना भले ही अनिवार्य हो, लेकिन यह बाध्यता धारा 101(2) के तहत अपीलीय अदालत (Appellate Court) पर ‘यथा-आवश्यक परिवर्तनों सहित’ (Mutatis Mutandis) लागू नहीं होती।

अदालत ने धारा 101(2) का शाब्दिक अर्थ (Literal Construction) निकालते हुए टिप्पणी की, सत्र अदालत/अपीलीय अदालत पर केवल यह कर्तव्य है कि वह प्रत्येक मामले के तथ्यों के अनुसार यह जांच करे कि क्या ऐसी शक्ति का प्रयोग करने की परिस्थितियां मौजूद हैं। धारा 101(2) अपीलीय अदालत को विशेषज्ञों की सहायता लेने की शक्ति प्रदान करती है, लेकिन इस शक्ति का प्रयोग पूरी तरह से अदालत के स्वविवेक (Discretion) पर निर्भर करता है।

🏛️ कानूनी संदर्भ और JJB बनाम अपीलीय कोर्ट का अंतर

  1. जेजे बोर्ड (JJB) के लिए अनिवार्यता (Section 15(1)):
    • वरुण चंद्र ठाकुर बनाम भोलू (2022) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तय किया था कि जब JJB यह तय करता है कि किसी जघन्य अपराध में शामिल किशोर (16-18 वर्ष) पर बालिग/वयस्क (Adult) की तरह मुकदमा चलाया जाए या नहीं, तब बोर्ड में बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञ न होने पर विशेषज्ञ की सलाह लेना अनिवार्य (Mandatory) है।
  2. अपीलीय कोर्ट का स्वविवेक (Section 101(2)):
    • सुप्रीम कोर्ट ने अब स्पष्ट कर दिया है कि धारा 101(2) के तहत जब सत्र अदालत अपील सुन रही होती है, तो विशेषज्ञ की सलाह लेना उसका विशेषाधिकार/विवेक है, न कि कोई कानूनी अनिवार्यता।
    • उदाहरण: यदि JJB ने प्रारंभिक मूल्यांकन (Preliminary Assessment) के दौरान विशेषज्ञ की सहायता लेने में कोई चूक की थी, तो अपीलीय अदालत मामले की परिस्थितियों को देखते हुए विशेषज्ञों की मदद ले सकती है। यह फैसला बच्चे के सर्वोत्तम हित (Best Interest of the Child) और मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन में समय की संवेदनशीलता के सिद्धांतों से संचालित होगा।

मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)

  1. हत्या का मामला और कानूनी लड़ाई
    • यह अपील विधि का उल्लंघन करने वाले एक किशोर (Child in Conflict with Law) द्वारा दायर की गई थी, जिसने पटना उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें उस पर हत्या के मामले में बालिग/वयस्क के रूप में मुकदमा चलाने को मंजूरी दी गई थी।
  2. निचली अदालतों का रुख
    • JJB: शुरुआत में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने आरोपी पर बालिग की तरह मुकदमा चलाने से इनकार कर दिया था।
    • सत्र अदालत (Sessions Court): JJB के फैसले के खिलाफ अपील में सत्र अदालत ने बोर्ड के आदेश को रद्द कर दिया और किशोर पर बालिग की तरह मुकदमा चलाने का आदेश दिया।
    • पटना हाई कोर्ट: किशोर ने हाई कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) दायर कर तर्क दिया कि अपीलीय कोर्ट ने धारा 101(2) के तहत अनुभवी मनोवैज्ञानिकों की मदद नहीं ली। हाई कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

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