Thursday, September 24, 2026
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Abuse of the Process of Law: निजी अनुबंधों के तहत वसूली के लिए आपराधिक कानून का इस्तेमाल न करें…दीवानी व आपराधिक दायित्व में अंतर है

केस एवं प्रक्रियात्मक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक/प्रशासनिक बिंदुविवरण (अगस्त 2026)
माननीय पीठन्यायमूर्ति राय चट्टोपाध्याय (कलकत्ता उच्च न्यायालय)
संबंधित कानूनBNS/IPC (धोखाधड़ी व आपराधिक विश्वासघात) एवं CrPC धारा 482 / BNSS धारा 528 (कार्यवाही रद्द करना)
मुख्य विवादअनुबंध या लोन समझौते के तहत बकाये की वसूली के लिए एफआईआर दर्ज कराना
मुख्य कानूनी सिद्धांतदीवानी देनदारी (Civil Liability) की वसूली के लिए आपराधिक कानून का इस्तेमाल ‘कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग’ है।
अदालत का निर्णयएफआईआर एवं आपराधिक कार्यवाही निरस्त/रद्द (Quashed)।

Abuse of the Process of Law: कलकत्ता हाईकोर्ट ने ₹1.60 करोड़ की कथित धोखाधड़ी के एक मामले में आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

न्यायमूर्ति राय चट्टोपाध्याय की पीठ ने 5 अगस्त 2026 को याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज एफआईआर (FIR) और आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक कानून का उद्देश्य समाज के खिलाफ होने वाले सार्वजनिक अपराधों (Public Wrongs) के लिए सजा देना है, न कि निजी अनुबंधों (Private Contracts) या दीवानी बकाये की वसूली का जरिया बनना।

हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां

  • दीवानी दायित्व बनाम आपराधिक दायित्व (Civil vs Criminal Liability):“आपराधिक कानून समाज को प्रभावित करने वाले सार्वजनिक अपराधों को दंडित करने के लिए बनाया गया है, न कि निजी अनुबंधों के तहत पैसे की वसूली के तंत्र के रूप में कार्य करने के लिए। ऐसी अभियोजन प्रक्रियाओं को जारी रखने की अनुमति देने से दीवानी दायित्व और आपराधिक दायित्व के बीच का अंतर धुंधला हो जाएगा और यह वादियों को जबरन वसूली के उपकरण के रूप में आपराधिक कार्यवाही का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करेगा।”
  • कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग: अदालत ने माना कि ऐसे मामलों में याचिकाकर्ता को पूर्ण आपराधिक मुकदमे (Criminal Trial) से गुजारना कानूनी प्रक्रिया के स्पष्ट दुरुपयोग (Abuse of the Process of Law) की अनुमति देने जैसा होगा।

मामला क्या था? (Case Background)

  1. शिकायत और एफआईआर (2023)
    • शिकायतकर्ता ने 25 जुलाई 2023 को एफआईआर दर्ज कराई थी कि आरोपी ने खुद को जमीन के एक भूखंड का मालिक बताकर ₹1.60 करोड़ में जमीन बेचने का सौदा किया।
    • आरोप था कि पूरे पैसे लेने के बाद भी आरोपी ने जमीन के ट्रांसफर दस्तावेजों पर हस्ताक्षर नहीं किए और धोखाधड़ी (Cheating) तथा आपराधिक विश्वासघात (Criminal Breach of Trust) किया।
  2. जांच में सामने आए तथ्य
    • अदालत ने पाया कि पुलिस जांच के दौरान ₹1.60 करोड़ का कोई लेन-देन साबित नहीं हुआ, बल्कि चार्जशीट के अनुसार केवल ₹40 लाख ही आरोपी के बैंक खाते में जमा हुए थे।
    • इसके अलावा, पक्षों के बीच 20 नवंबर 2019 को हस्ताक्षरित एक लिखित ‘ऋण समझौता’ (Loan Agreement) सामने आया, जिससे साबित हुआ कि दोनों के बीच का संबंध केवल ‘ऋणदाता और ऋणग्रहीता’ (Lender and Borrower) का था।
  3. बचाव पक्ष के तर्क
    • याचिकाकर्ता के वकीलों (डॉ. अर्जुन चौधरी और प्रत्युषा दत्ता चौधरी) ने तर्क दिया कि यह ₹40 लाख का एक फ्रेंडली लोन (Friendly Loan) था, जिसमें से ₹12 लाख पहले ही लौटाए जा चुके थे।
    • उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह से दीवानी प्रकृति (Civil Nature) का मामला है और याचिकाकर्ता केवल एक सद्भावी देनदार (Bona Fide Debtor) है।

⚖️ हाई कोर्ट का अंतिम फैसला

हाई कोर्ट ने पाया कि यदि कोई व्यक्ति लोन या समझौते की बाकी राशि चुकाने में असमर्थ रहता है, तो केवल भुगतान न कर पाना अपने आप में कोई आपराधिक अपराध (Criminal Offence) नहीं बन जाता

अदालत ने माना कि यह मामला मूल रूप से एक दीवानी विवाद है जिसमें दबाव बनाने और पैसे की वसूली के लिए आपराधिक प्रक्रिया शुरू की गई थी। तदनुसार, कलकत्ता हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज एफआईआर और उससे जुड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द (Set Aside) कर दिया।

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