केस मैट्रिक्स: Allahabad HC Order on 41-Year Pending Appeal
| पहलू | विवरण |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस संतोष राय (Justice Santosh Rai) |
| मूल मामला | 1984 की घटना; 1985 का ट्रायल कोर्ट फैसला (धारा 307 – हत्या का प्रयास) |
| पेंडेंसी अवधि | इलाहाबाद हाई कोर्ट में 41 वर्ष से लंबित |
| संशोधित सजा | 6 साल से घटाकर 4 साल का कारावास + ₹40,000 जुर्माना (₹35,000 पीड़ित को) |
Attempt to Murder Pending Appeal: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 1985 के हत्या के प्रयास (Attempt to Murder) के एक मामले में 60 वर्ष से अधिक आयु के पूर्व पुलिस कांस्टेबल की दोषसिद्धि (Conviction) को बरकरार रखा है।
जस्टिस संतोष राय की पीठ ने 27 जुलाई को दिए अपने फैसले में टिप्पणी की कि अपील का इतने दशकों तक लंबित रहना और न्यायिक प्रक्रिया में हुई अकारण देरी में अपीलकर्ता/दोषी की कोई भूमिका या गलती नहीं थी। हालांकि, मामले में हुई 41 साल की अत्यधिक देरी और आरोपी की ढलती उम्र को ध्यान में रखते हुए अदालत ने उसकी 6 साल की कठोर कारावास की सजा को घटाकर 4 साल कर दिया है।
मामला क्या था?: 1984 में पीर बाबा पर चाकू से हमला
- घटना और प्राथमिकी: एफआईआर के अनुसार, 21 अगस्त 1984 की सुबह लगभग 6:45 बजे बरेली में तैनात एक पुलिस सिपाही (जो बिना अनुमति वर्दी पहनकर अपने गृहनगर आया था) ने एक आध्यात्मिक संत/पीर बाबा पर चाकू से हमला कर दिया। पीर बाबा उस समय अपने शिष्यों के साथ पूजा-अर्चना करने जा रहे थे।
- ट्रायल कोर्ट का फैसला: वर्ष 1985 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी सिपाही को हत्या के प्रयास (धारा 307) का दोषी ठहराते हुए 6 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ दोषी ने 1985 में ही इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपील दायर की थी, जो पिछले 41 वर्षों से लंबित थी।
हाई कोर्ट में बचाव पक्ष के तर्क और अदालत का रुख
दोषसिद्धि (Conviction) बरकरार क्यों रही?
- बचाव पक्ष के तर्क: आरोपी के वकीलों (सैयद वाजिद अली और सुधीर अग्रवाल) ने तर्क दिया कि प्रत्यक्षदर्शी पीर बाबा के शिष्य थे, इसलिए वे पक्षपाती थे। उन्होंने यह भी दलील दी कि घटना के समय आरोपी की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी (Unsound Mind)।
- अदालत का फैसला: हाई कोर्ट ने मानसिक अस्वस्थता के दावे को साक्ष्य के अभाव में खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पीड़ित के बयान, स्वतंत्र गवाहों, वर्दी और खून से सने चाकू की बरामदगी तथा मेडिकल रिपोर्ट से अपराध साबित होता है। इसलिए दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया।
सजा में कटौती (Moulding the Sentence) क्यों की गई?
अदालत ने सजा घटाते हुए दोनों पक्षों (अपराध की गंभीरता बनाम अत्यधिक देरी) के बीच संतुलन बनाने की बात कही।
इलाहाबाद हाई कोर्ट (जस्टिस संतोष राय) की टिप्पणी: यह हमारे संज्ञान में लाया गया है कि वर्ष 1985 के दोषसिद्धि के निर्णय से उत्पन्न यह अपील इस न्यायालय के समक्ष लगभग 41 वर्षों से लंबित है। इस अत्यधिक देरी में अपीलकर्ता की ओर से कोई विफलता, टालमटोल या गलती नहीं रही है। दोषी की आयु अब 60 वर्ष से अधिक हो चुकी है। न्यायिक प्रक्रिया में लगे समय और अपराध की गंभीरता के बीच संतुलन बनाते हुए न्याय के हित में सजा में संशोधन आवश्यक है।
अदालत का अंतिम आदेश
- सजा में राहत: ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई 6 साल की कठोर कारावास की सजा को घटाकर 4 साल सश्रम कारावास किया गया।
- जर्माना और मुआवजा: दोषी पर ₹40,000 का जुर्माना लगाया गया, जिसमें से ₹35,000 की राशि पीड़ित (पीर बाबा) को मुआवजे के रूप में दी जाएगी।
- सरेंडर का निर्देश: कोर्ट ने पूर्व कांस्टेबल को अपनी शेष सजा काटने के लिए दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण (Surrender) करने का आदेश दिया है।

