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विवाद की पृष्ठभूमि और अदालती घटनाक्रम
- न्यायमूर्ति अजय भानोत की अदालत में विवाद और हिंसा:विवाद की शुरुआत एक वकील के साथ कथित दुर्व्यवहार के आरोपों के बाद हुई। 27 अक्टूबर को नव-निर्वाचित अध्यक्ष सी. पी. उपाध्याय और महासचिव संतोष कुमार मिश्रा के नेतृत्व में बार एसोसिएशन ने न्यायमूर्ति भानोत के खिलाफ कार्रवाई की मांग की और उनकी अदालत के बहिष्कार की चेतावनी दी। इसके अगले दिन, वकीलों के एक समूह ने न्यायमूर्ति भानोत की अदालत में कुर्सियाँ और फर्नीचर तोड़े तथा सरकारी वकीलों व कोर्ट स्टाफ के साथ हाथापाई की।
- अदालत द्वारा आपराधिक और अवमानना की कार्रवाई:न्यायमूर्ति भानोत और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की पीठ ने बार एसोसिएशन के आरोपों को पूरी तरह से “झूठा और भ्रामक” करार दिया। पीठ ने मुख्य न्यायाधीश को भेजे गए बार के पत्रों में इस्तेमाल की गई भड़काऊ भाषा पर कड़ा एतराज जताया। अदालत ने तोड़फोड़ और हिंसा के जिम्मेदार वकीलों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की सिफारिश की तथा स्वतः संज्ञान लेते हुए आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की कार्यवाही शुरू की।
- संस्थानीय मर्यादा पर संकट:मुख्य न्यायाधीश और चुनाव अधिकारियों द्वारा शपथ ग्रहण समारोह का बहिष्कार यह दर्शाता है कि पीठ और बार के बीच वकीलों के अनुचित व्यवहार और अदालत के भीतर हिंसा को लेकर गहरा तनाव उत्पन्न हो गया है। उच्च न्यायालय ने बार एसोसिएशन से अदालत की गरिमा और सुरक्षा बनाए रखने के लिए सख्त कदम उठाने की अपील की है।
मुख्य विधिक निष्कर्ष
1. न्यायिक स्वतंत्रता और बार का अनुशासन:
अदालत के भीतर हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएं न्यायपालिका की स्वतंत्रता और परिसर की सुरक्षा पर सीधा हमला हैं। मुख्य न्यायाधीश और चुनाव समिति द्वारा समारोह का बहिष्कार बार के भीतर अनुशासनात्मक सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
2. अवमानना कार्यवाही का दायरा:
न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुँचाने और न्यायिक कार्यवाहियों में बाधा उत्पन्न करने के लिए ज़िम्मेदार अधिवक्ताओं पर आपराधिक अवमानना और एफआईआर की तलवार लटक रही है, जो भविष्य के लिए नजीर बनेगी।
प्रयागराज: भारत का संविधान के अनुच्छेद 215 (अभिलेख न्यायालय के रूप में उच्च न्यायालय की अपनी अवमानना हेतु दंडित करने की अंतर्निहित शक्ति), न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) की धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना—न्याय प्रशासन में शारीरिक बाधा, तोड़फोड़ और न्यायिक अधिकारियों पर आघात), अधिवक्ताओं के पेशेवर आचार एवं शिष्टाचार नियम (Bar Council of India Rules on Professional Conduct and Etiquette), तथा पीठ की गरिमा और सुरक्षा पर सर्वोच्च न्यायालय के विधिक नज़ीरों के परिप्रेक्ष्य में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में बार और बेंच (Bar and Bench) के मध्य अभूतपूर्व और गंभीर संवैधानिक व प्रशासनिक गतिरोध उत्पन्न हो गया है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) अरुण भंसाली (Chief Justice Arun Bhansali) और तेलंगाना के राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल (Telangana Governor Shiv Pratap Shukla) ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन (High Court Bar Association – HCBA) के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने से इनकार करते हुए कार्यक्रम का पूर्ण बहिष्कार (Skipped / Boycotted) कर दिया।
राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल इस भव्य समारोह में मुख्य अतिथि (Chief Guest) और मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली विशिष्ट अतिथि (Special Guest) के रूप में आमंत्रित थे। यही नहीं, चुनाव संपन्न कराने वाले मुख्य चुनाव अधिकारी (Chief Returning Officer – CRO) और चुनाव समिति के सदस्यों ने भी शपथ ग्रहण का बहिष्कार करते हुए स्पष्ट रूप से घोषणा की कि “मौजूदा गंभीर और तनावपूर्ण परिस्थितियों में उनकी उपस्थिति न तो उचित है और न ही वांछनीय (Neither proper nor desirable in the prevailing circumstances)”। यह अभूतपूर्व संवैधानिक दूरी हाल ही में वकीलों द्वारा न्यायमूर्ति अजय भानोत के कोर्ट रूम में की गई हिंसक तोड़फोड़, सरकारी वकीलों व अदालती कर्मचारियों के साथ मारपीट और उसके बाद शुरू की गई आपराधिक अवमानना व पुलिस कार्रवाई के सीधे जवाब के रूप में सामने आई है।
विवाद के मुख्य कानूनी बिंदु, अदालती हिंसा और न्यायिक संज्ञान
1. ‘न्यायमूर्ति अजय भानोत के कोर्ट रूम में तोड़फोड़, फर्नीचर की क्षति और कर्मचारियों पर हमला’:
विवाद का केंद्र इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायालय कक्ष संख्या (Courtroom) में हुई अप्रत्याशित हिंसा है:
- एक अधिवक्ता के साथ कथित दुर्व्यवहार के आरोप को लेकर नवगठित बार एसोसिएशन ने कड़ा रुख अपनाया था। बार एसोसिएशन के नवनिर्वाचित अध्यक्ष सी.पी. उपाध्याय (President CP Upadhyay) और महासचिव संतोष कुमार मिश्रा (General Secretary Santosh Kumar Mishra) के नेतृत्व में 27 अक्टूबर 2026 को एक प्रस्ताव जारी किया गया, जिसमें न्यायमूर्ति अजय भानोत के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई और उनकी अदालत का बहिष्कार करने की धमकी दी गई।
- इस प्रस्ताव के ठीक अगले दिन उग्र वकीलों के एक समूह ने न्यायमूर्ति अजय भानोत के कोर्ट रूम में प्रवेश कर फर्नीचर तोड़ दिया, डायस के पास तोड़फोड़ की, राज्य सरकार के विधि अधिकारियों (Government Counsel) और न्यायालय के कर्मचारियों (Court Staff) के साथ शारीरिक मारपीट व अभद्रता की।
2. ‘पीठ द्वारा आपराधिक अवमानना शुरू और प्राथमिकी की संस्तुति’:
- न्यायमूर्ति अजय भानोत (Justice Ajay Bhanot) और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत (Justice Divesh Chandra Samant) की खंडपीठ ने दुर्व्यवहार के सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए न्यायिक आदेश पारित किया:“बार एसोसिएशन द्वारा मुख्य न्यायाधीश को भेजे गए संचार में घटना के संबंध में पूर्णतः झूठे लांछन (False imputations) लगाए गए हैं और अत्यंत भड़काऊ भाषा (Provocative language) का इस्तेमाल किया गया है।अदालत कक्ष के भीतर हिंसा, तोड़फोड़ और न्यायिक कर्मचारियों पर हमला न्याय प्रशासन की शुचिता और विधि के शासन पर सीधा प्रहार है।”
- पीठ ने हिंसक कृत्य में संलिप्त वकीलों के विरुद्ध न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt Proceedings) की प्रक्रिया शुरू की और तोड़फोड़ करने वाले उपद्रवी अधिवक्ताओं के खिलाफ आपराधिक प्राथमिकी दर्ज करने (Criminal Action) की कठोर संस्तुति कर दी।
3. मुख्य न्यायाधीश, राज्यपाल व चुनाव समिति द्वारा विधिक बहिष्कार:
- उच्च न्यायालय की न्यायिक गरिमा को तार-तार किए जाने के बाद कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों के शीर्ष प्रमुखों ने बार के नवनिर्वाचित निकाय के मंच को साझा करने से परहेज किया।
- मुख्य चुनाव अधिकारी (CRO) और चुनाव समिति के सदस्यों ने भी बार पदाधिकारियों के आचरण से स्वयं को अलग करते हुए औपचारिक रूप से कहा कि जब तक अदालत कक्ष की हिंसा के लिए जिम्मेदारी तय नहीं होती और गरिमा बहाल नहीं होती, तब तक ऐसे समारोहों में सम्मिलित होना न्यायपालिका के संस्थागत आत्मसम्मान के विपरीत होगा।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (अक्टूबर – नवंबर 2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| संस्थान / मंच | इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ प्रयागराज (High Court of Judicature at Allahabad) |
| घटना का स्वरूप | नवनिर्वाचित इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन (HCBA) के पदाधिकारियों का शपथ ग्रहण समारोह। |
| समारोह का बहिष्कार करने वाले गणमान्य | 1. न्यायमूर्ति अरुण भंसाली (Chief Justice Arun Bhansali) — मुख्य न्यायाधीश, इलाहाबाद उच्च न्यायालय (विशेष अतिथि)। 2. शिव प्रताप शुक्ल (Shiv Pratap Shukla) — राज्यपाल, तेलंगाना (मुख्य अतिथि)। 3. मुख्य चुनाव अधिकारी (CRO) एवं चुनाव संचालन समिति के समस्त वरिष्ठ सदस्य। |
| नवनिर्वाचित बार पदाधिकारी | • सी.पी. उपाध्याय (CP Upadhyay) — अध्यक्ष, इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन। • संतोष कुमार मिश्रा (Santosh Kumar Mishra) — महासचिव, इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन। |
| विवाद का मूल कारण | 27 अक्टूबर 2026 को बार एसोसिएशन ने आरोप लगाया कि न्यायमूर्ति अजय भानोत ने एक वकील के साथ दुर्व्यवहार किया है; बार ने उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की और उनकी अदालत का बहिष्कार करने का प्रस्ताव पारित किया। |
| 28 अक्टूबर की हिंसात्मक घटना | प्रस्ताव पारित होने के अगले दिन वकीलों के एक उग्र समूह ने न्यायमूर्ति अजय भानोत के कोर्ट रूम में जबरन प्रवेश किया। वहां रखे फर्नीचर, कुर्सियों और कोर्ट रिकॉर्ड्स को क्षतिग्रस्त किया गया। विरोध करने पर अदालत में मौजूद राज्य सरकार के वकीलों (शासकीय अधिवक्ताओं) और अदालती कर्मचारियों (पेशकार, अर्दली) के साथ धक्का-मुक्की और शारीरिक हिंसा की गई। |
| अदालत का न्यायिक हस्तक्षेप | इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायिक आदेश जारी कर बार एसोसिएशन को याद दिलाया कि न्यायपालिका की गरिमा और सुरक्षा बनाए रखना दोनों पक्षों का साझा दायित्व है। |
| न्यायमूर्ति भानोत पीठ की विधिक कार्रवाई | न्यायमूर्ति अजय भानोत और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की खंडपीठ ने आरोपों का औपचारिक खंडन किया, बार द्वारा मुख्य न्यायाधीश को लिखे पत्र को ‘दुर्भावनापूर्ण व भड़काऊ’ करार दिया, और कोर्ट रूम में तोड़फोड़ करने वाले वकीलों के खिलाफ आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) तथा पुलिस कार्रवाई/प्राथमिकी की सिफारिश की। |
| समारोह पर तात्कालिक प्रभाव | मुख्य न्यायाधीश, राज्यपाल और स्वयं चुनाव समिति द्वारा दूरी बनाए जाने के कारण शपथ ग्रहण समारोह पूरी तरह फीका और संवैधानिक प्रतिष्ठा से वंचित रहा, जिससे बार के शीर्ष नेतृत्व पर कड़ा नैतिक और कानूनी दबाव बन गया है। |
विधिक एवं संस्थागत विश्लेषण: ‘अदालती गरिमा, आपराधिक अवमानना और बार काउंसिल नियम’
- ‘एक्स-कैप्टन हरीश उप्पल बनाम भारत संघ’ [(2003) 2 SCC 45] का विधिक सिद्धांत:
- सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने स्पष्ट व्यवस्था दी थी कि अधिवक्ताओं को अदालती कार्यवाही का बहिष्कार करने या हड़ताल पर जाने का कोई मौलिक या कानूनी अधिकार नहीं है।
- वकील न्याय व्यवस्था के अधिकारी (Officers of the Court) होते हैं। यदि किसी न्यायाधीश के आचरण से कोई शिकायत है, तो उसका समाधान मुख्य न्यायाधीश के समक्ष गोपनीय प्रत्यावेदन देकर निकाला जा सकता है; न कि अदालत कक्ष का बहिष्कार करके या तोड़फोड़ करके। कोर्ट रूम में हिंसा करना बार के पेशेवर विशेषाधिकार का आपराधिक दुरुपयोग है।
- आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) का स्वरूप:
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c) के अनुसार, कोई भी ऐसा कृत्य जो:
- किसी न्यायालय के प्राधिकार को कलंकित करता है या उसे कम करता है, अथवा
- किसी न्यायिक कार्यवाही के उचित अनुक्रम में पूर्वाग्रह पैदा करता है या बाधा डालता है, अथवा
- किसी अन्य रीति से न्याय प्रशासन में बाधा डालता है या रुकावट डालता है,
- वह सीधे तौर पर आपराधिक अवमानना का गठन करता है। कोर्ट रूम के भीतर फर्नीचर तोड़ना और न्यायिक कर्मचारियों व सरकारी वकीलों पर हमला करना ‘स्कैंडलाइजिंग द कोर्ट’ (Scandalising the Court) और न्याय प्रशासन के भौतिक अवरोध का सबसे संगीन उदाहरण है।
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c) के अनुसार, कोई भी ऐसा कृत्य जो:
- मुख्य न्यायाधीश और संवैधानिक पदों का सांकेतिक संदेश:
- मुख्य न्यायाधीश किसी उच्च न्यायालय के संस्थागत प्रमुख (Master of the Roster and Administrative Head) होते हैं।
- जब मुख्य न्यायाधीश स्वयं बार के कार्यक्रम में जाने से इनकार करते हैं, तो यह न्यायिक इतिहास में एक अत्यंत दुर्लभ और कड़ा संदेश होता है कि “न्यायालय अपनी संस्थागत गरिमा और अपने न्यायाधीशों व कर्मचारियों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करेगा”। राज्यपाल, जो राज्य के संवैधानिक प्रमुख हैं, का भी कार्यक्रम से अनुपस्थित रहना यह दर्शाता है कि राज्य का कोई भी अंग ऐसी अनुशासनहीनता और गुंडागर्दी को प्रश्रय नहीं देगा।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- संस्थान: इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रयागराज (प्रशासनिक व न्यायिक अवमानना क्षेत्राधिकार)
- विवाद संदर्भ: इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन (HCBA) शपथ ग्रहण विवाद सहपठित कोर्ट रूम तोड़फोड़ आपराधिक अवमानना संदर्भ [2026]
- संबंधित पीठ: न्यायमूर्ति अजय भानोत (Justice Ajay Bhanot) एवं न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत (Justice Divesh Chandra Samant) (खंडपीठ)
- प्रशासनिक प्रमुख: मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली (Chief Justice Arun Bhansali)
- संवैधानिक अतिथि: राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल (Governor Shiv Pratap Shukla)
- घटना की तिथि: अक्टूबर–नवंबर 2026
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 215 (अभिलेख न्यायालय के रूप में अवमानना हेतु दंडित करने की उच्च न्यायालय की शक्ति)
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) — धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना) एवं धारा 12 (दंड के प्रावधान)
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) — धारा 35 (व्यावसायिक कदाचार हेतु अनुशासनात्मक कार्रवाई)
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया नियम (BCI Rules) — भाग VI, अध्याय II (अदालत के प्रति अधिवक्ता का कर्तव्य व शिष्टाचार)
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) — लोक सेवक को कर्तव्य निर्वहन से रोकना, हमला, दंगा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान (PDPP Act)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- न्यायिक शुचिता, बार-बेंच संतुलन और संस्थागत अनुशासन का विधिक मानक: ‘अदालत कक्ष न्याय का पवित्र मंदिर हैं और न्यायाधीशों, न्यायिक कर्मचारियों व वकीलों की सुरक्षा कानून के शासन (Rule of Law) की पहली शर्त है; किसी न्यायाधीश के कथित आचरण के विरुद्ध असंतोष व्यक्त करने के नाम पर कोर्ट रूम में तोड़फोड़ करना, फर्नीचर नष्ट करना और कर्मचारियों से मारपीट करना न केवल घोर व्यावसायिक कदाचार है, बल्कि यह सीधे तौर पर आपराधिक अवमानना और संज्ञेय अपराध है; बार एसोसिएशनों को यह अधिकार नहीं है कि वे अपनी न्यायिक बिरादरी पर दबाव बनाने हेतु बहिष्कार या हिंसा का सहारा लें; तथा जब बार का नेतृत्व इस प्रकार की गैर-कानूनी गतिविधियों पर लगाम लगाने के बजाय उसे बढ़ावा देता है, तो मुख्य न्यायाधीश और संवैधानिक प्रमुखों द्वारा उनके आधिकारिक आयोजनों से दूरी बनाना संस्थागत गरिमा की रक्षा हेतु एक वैध, आवश्यक और कड़ा न्यायिक संदेश है।’
- वर्तमान स्थिति व आगामी परिणाम: मुख्य न्यायाधीश और राज्यपाल के बहिष्कार के बाद बार एसोसिएशन के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने का भारी दबाव है; वहीं दूसरी ओर, न्यायमूर्ति अजय भानोत की अदालत द्वारा अनुशंसित आपराधिक अवमानना याचिका और सीसीटीवी (CCTV) फुटेज के आधार पर तोड़फोड़ में शामिल अधिवक्ताओं के खिलाफ दर्ज होने वाली आपराधिक प्राथमिकियों पर उच्च न्यायालय की विशेष अवमानना पीठ द्वारा जल्द ही सुनवाई किए जाने की संभावना है, जिसके तहत दोषी वकीलों की वकालत का लाइसेंस निलंबित होने का गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
Bar Member Oath: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित संस्थान | इलाहाबाद उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन (Allahabad High Court Bar Association) |
| अनुपस्थित गरिमामय अतिथि | 1. न्यायमूर्ति अरुण भंसाली (मुख्य न्यायाधीश, इलाहाबाद उच्च न्यायालय) 2. शिव प्रताप शुक्ला (राज्यपाल, तेलंगाना) |
| नवनिर्वाचित बार पदाधिकारी | सी. पी. उपाध्याय (CP Upadhyay, अध्यक्ष) एवं संतोष कुमार मिश्रा (Santosh Kumar Mishra, महासचिव) |
| मूल विवाद/कारण | न्यायमूर्ति अजय भानोत की अदालत में वकीलों द्वारा तोड़फोड़, अमर्यादित व्यवहार और अवमानना संबंधी अदालती कार्यवाहियाँ। |
| न्यायिक रुख | हाईकोर्ट की पीठ द्वारा हुड़दंगी वकीलों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की सिफारिश और अवमानना (Contempt Proceedings) की शुरुआत। |

