Friday, October 16, 2026
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boAt Trademark: क्यों कहा एक ही दांव बार-बार नहीं चल सकते…प्रसिद्ध ऑडियो और वियरेबल्स ब्रांड कंपनी boAt के ट्रेडमार्क का केस जरूर पढ़ें

boAt Trademark: प्रसिद्ध ऑडियो और वियरेबल्स ब्रांड boAt (इमेजिन मार्केटिंग प्राइवेट लिमिटेड) को अपने प्रतिद्वंद्वी ब्रांड BOULT (एक्सोटिक माइल) के खिलाफ चल रही ट्रेडमार्क की कानूनी जंग में दिल्ली हाईकोर्ट से करारा झटका लगा है।

हाईकोर्ट की जस्टिस ज्योति सिंह की एकल पीठ ने बोट (boAt) द्वारा बौल्ट (BOULT) के वर्डमार्क (Wordmark – नाम के इस्तेमाल) पर रोक लगाने की दूसरी अंतरिम अर्जी को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने साफ किया कि ‘boAt’ और ‘BOULT’ के नामों में ध्वनि साम्यता (Phonetic Similarity) का जो तर्क कंपनी अब दे रही है, वह वह पहले ही अपनी पहली अर्जी में दे चुकी थी और उस समय कोर्ट ने नाम पर कोई रोक नहीं लगाई थी।

किसी चूक या भूल का बहाना बनाकर 6 साल बाद नई अर्जी लाने पर सवाल

अदालत ने कहा, “कानून का यह स्थापित सिद्धांत है कि एक ही तथ्यों (Facts) और आधारों पर बार-बार अंतरिम रोक (Interim Injunction) लगाने की अर्जी दाखिल नहीं की जा सकती। जब तक कि परिस्थितियां पूरी तरह बदल न गई हों (Changed Circumstances) या कोई अत्यधिक कठिनाई (Undue Hardship) न आ खड़ी हुई हो, तब तक कोर्ट पुरानी खारिज हो चुकी राहत को दोबारा नहीं दे सकता। अदालत के पुराने फैसले में किसी चूक या भूल का बहाना बनाकर 6 साल बाद नई अर्जी लाना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग (Abuse of Process) है।

मामला क्या है?: ‘boAt’ बनाम ‘BOULT’ का पुराना विवाद

यह पूरा मामला दोनों ब्रांड्स के बीच साल 2019 से चल रहे एक कमर्शियल सूट (व्यापारिक मुकदमे) से जुड़ा है।

शुरुआती आदेश (2019-2020): बोट (boAt) ने कोर्ट में केस किया था कि बौल्ट (BOULT) का नाम और उसके लोगो/डिवाइस मार्क्स उसके ब्रांड से मिलते-जुलते हैं। शुरुआत में बोट को एकतरफा अंतरिम राहत मिली थी, लेकिन 21 जनवरी 2020 को सिंगल जज ने अंतिम आदेश देते हुए बौल्ट (BOULT) को केवल कुछ खास ‘डिवाइस मार्क्स’ (लोगो/डिजाइन) और उनकी टैगलाइन “Unplug Yourself” का इस्तेमाल करने से रोका था। कोर्ट ने ‘BOULT’ नाम (Wordmark) के इस्तेमाल पर कोई रोक नहीं लगाई थी।

डिवीजन बेंच का रुख: इस फैसले को बौल्ट ने दो जजों की डिवीजन बेंच में चुनौती दी। डिवीजन बेंच ने लोगो पर लगी रोक को बरकरार रखा लेकिन टैगलाइन वाली रोक हटा दी। इस दौरान बौल्ट (BOULT) ने कोर्ट को बताया कि वह पुराने विवादित लोगो को हटा रहा है और अब नए नाम ‘GOBOULT’ पर शिफ्ट हो चुका है।

6 साल बाद ‘boAt’ की नई पैंतरेबाज़ी: अपील खत्म होने के बाद, बोट (boAt) ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के ऑर्डर 39 रूल 1 और 2 के तहत सिंगल जज के सामने एक और (दूसरी) अर्जी लगा दी। बोट का दावा था कि 2020 के आदेश में जज साहब गलती से (Inadvertently) ‘BOULT’ वर्डमार्क पर रोक लगाना भूल गए थे, जिसकी क्लैरिटी उन्हें अब डिवीजन बेंच के आदेश से मिली है।

हाई कोर्ट का कड़ा रुख: ‘6 साल तक कुंभकर्णी नींद में क्यों थे?’

जस्टिस ज्योति सिंह ने बोट (boAt) की तरफ से पेश सीनियर एडवोकेट जयंत मेहता और बौल्ट (BOULT) के सीनियर एडवोकेट अखिल सिबल की दलीलें सुनने के बाद बोट की अर्जी को पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां इस प्रकार थीं।

परिस्थितियों में कोई बदलाव नहीं (No Changed Circumstances)

बोट ने तर्क दिया था कि डिवीजन बेंच के फैसले के बाद स्थिति बदली है। कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा, परिस्थितियों में बदलाव का मतलब कोई नया तथ्य, नया डेवलपमेंट या कोई अतिरिक्त घटना होना होता है। पुराने फैसले में किसी कथित ‘ओमिशन’ (भूल या चूक) को आधार बनाकर आप दूसरी अर्जी नहीं ला सकते। साल 2020 का फैसला बिल्कुल साफ था कि ‘BOULT’ वर्डमार्क पर कोई रोक नहीं है। अगर बोट को लगता था कि वहां कोई चूक हुई है, तो उन्होंने उसी समय रिव्यू (समीक्षा), मॉडिफिकेशन या क्रॉस-अपील क्यों नहीं दाखिल की? 6 साल तक इंतजार करना और फिर वही राहत मांगना फैक्ट और लॉ दोनों के खिलाफ है।

प्रक्रिया का दुरुपयोग और लुका-छिपी का खेल

कोर्ट ने नोट किया कि इस दूसरी अर्जी को दाखिल करने से ठीक पहले बोट ने एक ‘स्पष्टीकरण आवेदन’ (Clarification Application) भी दायर किया था, जिसे बाद में उन्होंने बिना किसी शर्त के वापस (Withdraw) ले लिया था। कोर्ट ने कहा कि उसी राहत को अब घुमावदार तरीके से (Circuitously) दोबारा मांगना अदालत के समय की बर्बादी और कानून का मज़ाक उड़ाना है।

इंटरनेट पर बची-खुची लिस्टिंग्स का बहाना नहीं चलेगा

बोट ने कुछ ई-कॉमर्स वेबसाइट्स के स्क्रीनशॉट दिखाकर दावा किया कि ‘BOULT’ नाम का इस्तेमाल अभी भी हो रहा है और इससे उन्हें नुकसान (Undue Hardship) हो रहा है। बौल्ट (BOULT) ने कोर्ट में स्पष्ट किया कि वे इस नाम को बंद कर चुके हैं और जो स्क्रीनशॉट हैं, वे पुरानी या आर्काइव्ड लिस्टिंग्स हैं। बौल्ट ने यह भी कहा कि अगर इंटरनेट पर ऐसी कोई बची-खुची लिस्टिंग है, तो वे उसे खुद हटाने में मदद करेंगे।

केस शीट: boAt बनाम BOULT ट्रेडमार्क विवाद (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली
माननीय न्यायाधीशजस्टिस ज्योति सिंह (एकल पीठ)
वादी (Plaintiff)इमेजिन मार्केटिंग प्राइवेट लिमिटेड (boAt)
प्रतिवादी (Defendant)एक्सोटिक माइल (BOULT / GOBOULT)
प्रासंगिक कानूनसीपीसी (Order XXXIX Rules 1 & 2) और राकेश मदान बनाम आरएफसी (2009) नजीर
विवाद का मुख्य बिंदुक्या पहली बार राहत न मिलने पर उसी तथ्य पर दूसरी बार स्टे (Injunction) मांगा जा सकता है?
अदालत का अंतिम निर्णयboAt की दूसरी अर्जी खारिज; बौल्ट के वर्डमार्क पर कोई नया स्टे नहीं।
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