Saturday, July 11, 2026
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Hefty Settlements: तलाक के बाद रेप का आरोप, समझ में आ रहा कि मकसद सिर्फ भारी वसूली हैं…जेठ-देवर पर जबरन दुष्कर्म का केस, पढ़ें मामला

Hefty Settlements: वैवाहिक कलह के मामलों में ससुराल पक्ष को डराने और ब्लैकमेल करने के लिए कानून के हथियार की तरह इस्तेमाल किए जाने पर दिल्ली हाईकोर्ट ने बेहद चिंताजनक और तल्ख टिप्पणी की है।

महिलाएं अपने वैवाहिक विवादों में ससुराल पक्ष को जबरन आरोपी बना रहे

हाईकोर्ट के जस्टिस गिरीश कठपालिया की एकल पीठ ने एक महिला द्वारा अपने जेठ और देवर (Brothers-in-law) पर लगाए गए गैंगरेप और क्रूरता के आरोपों को प्रथम दृष्टया बदले की भावना से प्रेरित पाया। हाई कोर्ट ने इस मामले को विधिक प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग मानते हुए निचली अदालत (Trial Court) में चल रही कार्यवाही पर तुरंत रोक (Stay) लगा दी है। अदालत ने कहा, देश में अब एक ऐसा खतरनाक चलन (Trend) सेट हो रहा है, जहां महिलाएं अपने वैवाहिक विवादों में ससुराल पक्ष को भारी-भरकम रकम (Hefty Settlements) चुकाने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से बलात्कार, छेड़छाड़ और गंभीर यौन दुराचार जैसे संगीन आरोप लगा रही हैं। दहेज उत्पीड़न (धारा 498A) के मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सीधे और बिना वारंट गिरफ्तारी पर लगाई गई रोक के बाद, कानून को बाइपास करने और ससुराल वालों को सीधे जेल भिजवाने के लिए इन गंभीर धाराओं का दुरुपयोग किया जा रहा है।

मामला क्या है?: पति ने मांगा तलाक, पत्नी ने 7 साल पुराने ‘रेप’ की कहानी गढ़ दी

यह पूरा कानूनी मामला पति-पत्नी के आपसी विवाद से शुरू हुआ, जो बाद में पूरे परिवार के लिए दुःस्वप्न बन गया।

तलाक और एफआईआर की टाइमलाइन: पति ने सितंबर 2023 में अपनी पत्नी से अलग होने के लिए कोर्ट में तलाक (Divorce) की अर्जी दाखिल की थी। इसके ठीक सात महीने बाद, अप्रैल 2024 में पत्नी ने जवाबी कार्रवाई करते हुए पुलिस में अपने ससुराल वालों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई।

बयानों में सबसे बड़ा झोल: याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट ऋषि मल्होत्रा ने कोर्ट को बताया कि जब अप्रैल 2024 में शुरुआती एफआईआर दर्ज हुई, तो उसमें जेठ या देवर पर बलात्कार का कोई जिक्र नहीं था। लेकिन इसके दो महीने बाद, जब कोर्ट के सामने मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 164 (CrPC) के तहत महिला के बयान दर्ज हुए, तो उसने अचानक पहली बार आरोप लगाया कि साल 2017 में उसके जेठ और देवर ने उसके साथ रेप किया था।

7 साल की लंबी खामोशी: आरोपियों के वकीलों (ऋषि मल्होत्रा, अनुसुइया और शिवांश मैनी) ने तर्क दिया कि यदि महिला के साथ 2017 में इतनी जघन्य वारदात हुई थी, तो वह 7 साल तक चुप क्यों रही? इस चुप्पी और देरी का एफआईआर में कोई तार्किक कारण या स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। साफ है कि यह कहानी सिर्फ बदला लेने के लिए बनाई गई।

अर्नेश कुमार जजमेंट का असर: कानून से बचने के लिए नई पैंतरेबाज़ी

जस्टिस गिरीश कठपालिया ने इस मामले की तह में जाते हुए इसके पीछे के मुख्य कानूनी कारण को रेखांकित किया।

498A की धार कुंद हुई, तो 376 का सहारा लिया

हाई कोर्ट ने नोट किया कि साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य’ मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। उस फैसले के बाद पुलिस दहेज उत्पीड़न (Section 498A IPC) के मामलों में सीधे ससुराल वालों को गिरफ्तार नहीं कर सकती थी, बल्कि उसे पहले जांच और नोटिस की प्रक्रिया अपनानी पड़ती थी। अदालत ने पाया कि चूंकि अब दहेज के केस में आसानी से जेल नहीं भेजा जा सकता, इसलिए शिकायतकर्ता महिलाओं ने सीधे रेप (Section 376) और छेड़छाड़ (Section 354A) जैसी गैर-जमानती धाराएं लगवाना शुरू कर दिया है, ताकि पूरे परिवार को घुटनों पर लाया जा सके और मनमाफिक मोटी रकम वसूली जा सके।”

मुकदमे की कार्यवाही पर रोक

अदालत ने राज्य सरकार की ओर से पेश एडिशनल पब्लिक प्रोसिक्यूटर हेमंत मेहला की दलीलों को सुनने के बाद माना कि इस मामले में आरोपियों को अंतरिम राहत मिलना बेहद जरूरी है। यदि ट्रायल जारी रहा, तो बिना कसूर के ही इन-लॉज का जीवन बर्बाद हो जाएगा। कोर्ट ने अगली सुनवाई 17 नवंबर, 2026 तय करते हुए तब तक के लिए केस पर रोक लगा दी है।

केस शीट: दिल्ली हाई कोर्ट विधिक समीक्षा (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और टिप्पणी
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली
माननीय न्यायाधीशजस्टिस गिरीश कठपालिया (एकल पीठ)
आरोपियों के वरिष्ठ अधिवक्तासीनियर एडवोकेट ऋषि मल्होत्रा
शामिल प्रमुख धाराएंधारा 376 (बलात्कार) और धारा 498A (दहेज क्रूरता)
ऐतिहासिक नज़ीर का संदर्भअर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (SC, 2014)
अदालत का अंतरिम आदेशजेठ-देवर के खिलाफ निचली अदालत की कार्यवाही पर रोक (Stay); अगली सुनवाई नवंबर 2026 में।
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