Sunday, October 18, 2026
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Child Use Internet: बच्चों को इंटरनेट से दूर नहीं कर सकते; यह उनका मौलिक अधिकार, सुरक्षा के नाम पर पूरी तरह बेदखल करना ‘पीड़ित को ही समस्या मान लेने’ जैसा है…

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

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│ डिजिटल अधिकार एवं बाल सुरक्षा (SC) │
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│ अनुच्छेद 19(1)(a) + 21 │ │ पूर्ण प्रतिबंध की असफलता │
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│ इंटरनेट विचारों के आदान- │ │ इंटरनेट बंद करने से बच्चे │
│ प्रदान, शिक्षा और विशेष │ │ असुरक्षित व असंगठित प्लेटफॉर्म्स │
│ आवश्यकताओं के लिए आवश्यक। │ │ पर जाने को मजबूर होते हैं। │
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  1. “बच्चों को मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता”:पीठ ने ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा:“हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत इंटरनेट तक पहुंच और उसका उपयोग हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। हमारे बच्चे भी उम्र की परवाह किए बिना इन्हीं अधिकारों का आनंद लेते हैं। उन्हें इससे पूरी तरह वंचित करना उतना ही बेतुका होगा जितना यह कहना कि एक निश्चित उम्र से कम के बच्चों के पास सुरक्षित करने लायक चेतना या व्यक्त करने लायक बोलने की आजादी नहीं होती। बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं; बच्चे दोनों के हकदार हैं।”
  2. दूरस्थ क्षेत्रों और विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों के लिए सहारा:अदालत ने नोट किया कि अनुच्छेद 19(1)(a) में जानकारी प्राप्त करने और उसे साझा करने का अधिकार शामिल है। विशेष रूप से ग्रामीण व दूरदराज के क्षेत्रों के बच्चों के लिए इंटरनेट सीखने का एकमात्र जरिया है, जबकि विशेष आवश्यकताओं (Special Needs) वाले बच्चों के लिए यह समाज से जुड़ने का मुख्य माध्यम है।

पूर्ण प्रतिबंध (Blanket Restriction) के खिलाफ तर्क

  1. पीड़ित को ही समस्या मानने की भूल:अदालत ने माना कि हालांकि इंटरनेट बच्चों के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं है, लेकिन मध्यस्थों (Intermediaries/Social Media Platforms) की विफलता के कारण बच्चों को इंटरनेट से दूर रखना समस्या के मूल को समझे बिना पीड़ित को ही दोषी ठहराने जैसा है।
  2. सुरक्षा जोखिम और डर का माहौल:अदालत ने कहा कि कानून बनाकर इंटरनेट रोकने से बच्चे रुकते नहीं हैं, बल्कि वे असीमित और अधिक खतरनाक/असुरक्षित वेबसाइटों की ओर चले जाते हैं। इसके अलावा, प्रतिबंधों के डर से अगर कोई बच्चा ऑनलाइन शोषण या धमकी का शिकार होता है, तो वह डांट के डर से अपने माता-पिता को इसकी जानकारी देने से हिचकिचाएगा।
  3. उम्र सत्यापन से निजता का खतरा:उम्र-आधारित सख्त प्रतिबंध लगाने के लिए हर यूजर की उम्र की पहचान और संवेदनशील डेटा का निरंतर संग्रह करना पड़ेगा, जिससे नागरिकों पर निगरानी (Surveillance) और डेटा के दुरुपयोग का गंभीर खतरा पैदा होगा।

आनुपातिक सुरक्षा उपाय (Proportionate Safeguards) और निर्देश

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने पूर्ण प्रतिबंध को खारिज कर दिया, लेकिन उसने माना कि बच्चों को हानिकारक सामग्री से बचाने के लिए उचित नियमन अनिवार्य है:

  • माता-पिता की सहमति और ‘चाइल्ड मोड’: कोर्ट ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया कि सोशल मीडिया अकाउंट्स के लिए माता-पिता की सहमति, मार्गदर्शन और समर्पित ‘Child Mode’ लागू किया जाए, जिसमें खातों को डिफ़ॉल्ट रूप से प्राइवेट रखना, अनजान वयस्कों के मैसेज ब्लॉक करना और विज्ञापनों को नियंत्रित करना शामिल हो।
  • एडल्ट कंटेंट पर रोक: सरकार को स्पष्ट छूट दी गई है कि वह बच्चों के लिए हानिकारक या वयस्क सामग्री (Adult Content) वाली वेबसाइटों तक उनकी पहुंच को प्रतिबंधित कर सकती है।
  • राष्ट्रीय डेटाबेस (CSEAM Removal): कोर्ट ने बाल यौन शोषण सामग्री (CSEAM) को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से पूरी तरह हटाने और पहचान करने के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय डेटाबेस (National Database) बनाने के निर्देश जारी किए।

नई दिल्ली: भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) सहपठित अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा जानने/सूचना प्राप्त करने का अधिकार), डिजिटल पहुंच के मौलिक अधिकार (Right to Digital Access & Internet Usage), ऑनलाइन बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्री (CSEAM) की रोकथाम, सोशल मीडिया बिचौलियों (Intermediaries) की विधिक जवाबदेही, बच्चों के इंटरनेट उपयोग पर ‘पूर्ण प्रतिबंध’ (Blanket Ban) बनाम ‘आनुपातिक सुरक्षा उपाय’ (Proportionate Safeguards), तथा व्यापक राष्ट्रीय डेटाबेस (National Database) के गठन पर सुप्रीम कोर्ट ने एक युगांतरकारी संवैधानिक निर्णय सुनाया है।

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और अन्य ऑनलाइन सेवाओं से CSEAM की पहचान करने और उसे हटाने के तंत्र को मजबूत करने के लिए व्यापक दिशानिर्देश जारी करते हुए यह ऐतिहासिक विधिक घोषणा की कि इंटरनेट तक पहुंच और उसका उपयोग करना बच्चों सहित प्रत्येक नागरिक का एक स्वतंत्र मौलिक अधिकार है। अदालत ने साफ किया कि सुरक्षा के नाम पर बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह बेदखल करना समस्या के समाधान के बजाय ‘पीड़ित को ही समस्या मान लेने’ जैसा है।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं संवैधानिक टिप्पणियां

1. ‘बच्चों को इंटरनेट से वंचित करना उनकी चेतना और अभिव्यक्ति को नकारने जैसा होगा’

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने अपने ऐतिहासिक फैसले में व्यवस्था दी: “हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि इंटरनेट तक पहुंच और उसका उपयोग करना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के साथ पठित अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक व्यक्ति का एक मौलिक अधिकार (Fundamental Right) है। हमारे बच्चे, चाहे उनकी उम्र कुछ भी हो, समान मौलिक अधिकारों का उपभोग करते हैं, और उन्हें इससे पूरी तरह वंचित करना उतना ही निरर्थक और बेतुका होगा जितना यह कहना कि एक निश्चित उम्र से कम के बच्चों के पास रक्षा करने योग्य कोई अंतरात्मा नहीं होती या व्यक्त करने योग्य कोई वाक् स्वतंत्रता नहीं होती। हमारे बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं; हमारे बच्चे दोनों के समान रूप से हकदार हैं।”

2. इंटरनेट: ‘विचारों का वैश्विक बाजार’ (Marketplace of Ideas):

  • खंडपीठ ने रेखांकित किया कि अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में सूचना और विचारों को जानने, प्राप्त करने और प्रसारित करने का अधिकार (Right to Know and Receive Information) भी शामिल है।
  • अदालत ने दर्ज किया:
    • दूरदराज और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लाखों बच्चों के लिए इंटरनेट ही शिक्षा, रचनात्मकता और ज्ञानार्जन का एकमात्र प्रभावी साधन है।
    • विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (Children with Special Needs) के लिए इंटरनेट अक्सर वह एकमात्र मंच होता है जहां वे अपने जैसे अन्य साथियों के साथ संवाद स्थापित कर सकते हैं और सामाजिक जुड़ाव महसूस करते हैं।

3. पूर्ण प्रतिबंध (Blanket Ban) के विरुद्ध विधिक रुख: ‘पीड़ित को ही समस्या मानना’:

  • पीठ ने स्वीकार किया कि वर्तमान इंटरनेट बच्चों के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं है, किंतु समाधान पूर्ण प्रतिबंध नहीं हो सकता:“बिचौलियों (Intermediaries) की विफलता के कारण बच्चों को इंटरनेट से दूर रखना समस्या के बजाय पीड़ित को ही समस्या मान लेने (Mistaking the victim for the problem) के समान होगा।बच्चों के इंटरनेट एक्सेस पर कोई भी पूर्ण प्रतिबंध ‘सिद्ध असंगति के अप्रमाणित उपाय’ (Unproven measures of proven disproportionality) के अलावा कुछ नहीं है। दुनिया का कोई भी देश यह साबित नहीं कर सका है कि पूर्ण प्रतिबंध से बच्चे अधिक सुरक्षित हुए हैं।”
  • अदालत ने व्यावहारिक खतरों को रेखांकित किया:
    • यदि कानूनी रूप से रोक लगाई जाती है, तो बच्चे इंटरनेट का उपयोग बंद नहीं करते, बल्कि वे अनियमित, गुप्त और अधिक असुरक्षित प्लेटफॉर्म्स/डार्क वेब की ओर चले जाते हैं।
    • पूर्ण प्रतिबंध के डर से ऑनलाइन उत्पीड़न या धमकी का शिकार होने वाले बच्चे अपने माता-पिता या अभिभावकों को इसकी सूचना देने से डरेंगे कि कहीं इंटरनेट उपयोग के लिए उन्हें डांट न पड़े।
    • उम्र-आधारित कठोर प्रतिबंधों के लिए प्रत्येक नागरिक का डेटा और उम्र सत्यापित करनी पड़ेगी, जिससे जन-निगरानी (Mass Surveillance) और संवेदनशील व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग का अत्यधिक जोखिम पैदा होगा।

संवैधानिक न्यायशास्त्र का विकास: 2020 से 2026 तक का सफर

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यह फैसला भारतीय न्यायशास्त्र में डिजिटल अधिकारों के क्रमिक विकास का एक तार्किक और आवश्यक कदम है:

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│डिजिटल अधिकारों का न्यायिक विकास: 2020 - 2026│
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【अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020)】 【प्रज्ञा प्रसून बनाम भारत संघ (2025)】 【वर्तमान ऐतिहासिक निर्णय (2026)】
• इंटरनेट के माध्यम से वाक् स्वतंत्रता • सर्वोच्च न्यायालय ने 'डिजिटल एक्सेस' • इंटरनेट तक पहुंच और उपयोग को
और व्यापार (19(1)(a) व 19(1)(g)) को (Digital Access) को अनुच्छेद 21 के अनुच्छेद 21 व 19(1)(a) के तहत
संवैधानिक संरक्षण मिला; स्वयं इंटरनेट तहत मौलिक अधिकार का दर्जा दिया। बच्चों सहित सभी का स्वतंत्र मौलिक
एक्सेस पर फैसला सुरक्षित रखा गया था। अधिकार घोषित किया गया।
ऐतिहासिक मामलासर्वोच्च न्यायालय का विधिक सिद्धांत
अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ [(2020) 3 SCC 637]सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि इंटरनेट के ‘माध्यम’ से अभिव्यक्ति और व्यापार करना मौलिक अधिकार है। हालांकि, पीठ ने इस पर कोई अंतिम राय नहीं दी थी कि क्या स्वयं इंटरनेट तक पहुंच अपने आप में एक अलग मौलिक अधिकार है।
प्रज्ञा प्रसून बनाम भारत संघ (2025)शीर्ष अदालत ने माना कि डिजिटल सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मानवीय गरिमा और जीवन के अधिकार का हिस्सा है।
वर्तमान निर्णय (अक्टूबर 2026)पूर्ववर्ती सभी नजीरों से आगे बढ़ते हुए, न्यायालय ने दो-टूक शब्दों में घोषित किया कि इंटरनेट तक पहुंचना और उसका उपयोग करना प्रत्येक व्यक्ति (बच्चों सहित) का अनुच्छेद 21 एवं 19(1)(a) के तहत स्वतंत्र मौलिक अधिकार है।

Also Read; Rights For Child: इंटरनेट से बाल यौन शोषण सामग्री को तत्काल हटाने के लिए National Database; उल्लंघन पर अनुकरणीय आर्थिक जुर्माना व राजस्व जब्ती का बने कानून

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा हेतु न्यायालय के आनुपातिक दिशानिर्देश

यद्यपि पूर्ण प्रतिबंध को असंवैधानिक माना गया, किंतु अदालत ने स्पष्ट किया कि इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि बच्चों को बिना सुरक्षा के छोड़ दिया जाए। अदालत ने केंद्र सरकार और प्लेटफॉर्म्स को निम्नलिखित आनुपातिक सुरक्षा उपाय (Proportionate Safeguards) लागू करने की रूपरेखा दी:

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│ ऑनलाइन बाल सुरक्षा: त्रि-स्तरीय आनुपातिक ढांचा │
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【डिफ़ॉल्ट 'चाइल्ड मोड' (Child Mode)】 【माता-पिता की सहमति व निगरानी】 【संवेदनशील/अवैध सामग्री पर रोक】
• बच्चों के खाते डिफ़ॉल्ट रूप से निजी। • प्री-टीन्स (13 वर्ष से कम) हेतु • CSEAM सामग्री की पहचान व निष्कासन
• अज्ञात वयस्कों से संदेश/संपर्क प्रतिबंधित। माता-पिता की आनुपातिक सहमति। हेतु व्यापक राष्ट्रीय डेटाबेस का निर्माण।
• विज्ञापनों और अनुचित सामग्री का स्वतः • माता-पिता के मार्गदर्शन और निगरानी • एडल्ट-कंटेंट वेबसाइट्स पर पूर्ण
कड़ा मॉडरेशन। को मुख्य प्राथमिकता। प्रतिबंध लगाने की केंद्र को पूर्ण छूट।
  1. ‘चाइल्ड मोड’ और प्राइवेसी बाय डिफ़ॉल्ट:
    • सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर नाबालिगों के खाते डिफ़ॉल्ट रूप से प्राइवेट (Private by Default) रखे जाएं।
    • किसी भी अज्ञात वयस्क व्यक्ति द्वारा सीधे संदेश भेजने, संपर्क साधने या प्रोफाइल देखने पर तकनीकी प्रतिबंध हो।
  2. माता-पिता की सहमति और निगरानी (Parental Consent):
    • 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों (Pre-teens) के लिए माता-पिता की सहमति और निगरानी प्रणाली को मजबूत किया जाए, जिसके लिए केंद्र सरकार व्यावहारिक और आनुपातिक नियम बनाए।
  3. हानिकारक श्रेणियों पर प्रतिबंध की शक्ति सुरक्षित:
    • अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके फैसले का यह अर्थ नहीं है कि सरकार एडल्ट सामग्री, पोर्नोग्राफी या जुए जैसी वेबसाइटों पर बच्चों के प्रवेश को नहीं रोक सकती। केंद्र सरकार ऐसी श्रेणियों को पूरी तरह प्रतिबंधित करने के लिए स्वतंत्र है जो स्वाभाविक रूप से हानिकारक हैं।
  4. CSEAM के विरुद्ध राष्ट्रीय डेटाबेस (National Database):
    • इंटरनेट से बाल यौन शोषण सामग्री (CSEAM) को तत्काल हटाने के लिए एक केंद्रीकृत राष्ट्रीय डेटाबेस स्थापित करने का निर्देश दिया गया, ताकि हैश-मैचिंग (Hash-matching) तकनीक के जरिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से ऐसी सामग्री को अपलोड होते ही स्वतः हटाया जा सके।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?

  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ‘जानने का अधिकार’:
    • इंडियन एक्सप्रेस न्यूजपेपर्स (1985) और टाटा प्रेस (1995) के अनुसार, अनुच्छेद 19(1)(a) केवल बोलने वाले के अधिकार की रक्षा नहीं करता, बल्कि सुनने, पढ़ने और जानकारी प्राप्त करने वाले के अधिकार की भी रक्षा करता है। 21वीं सदी में इंटरनेट सूचना प्राप्ति का प्राथमिक माध्यम है; अतः इसे रोकना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को पंगु बनाने जैसा है।
  • अनुच्छेद 21: डिजिटल युग में गरिमापूर्ण जीवन:
    • के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) में निजता को मौलिक अधिकार मानते हुए यह स्वीकार किया गया था कि डिजिटल क्षेत्र नागरिकों के व्यक्तित्व के विकास का अभिन्न अंग है। इंटरनेट से पूर्ण बहिष्कार किसी बच्चे के बौद्धिक, शैक्षणिक और सामाजिक विकास को बाधित करता है, जो अनुच्छेद 21 के तहत मानवीय गरिमा के प्रतिकूल है।
  • आनुपातिकता का परीक्षण (Doctrine of Proportionality):
    • मॉडर्न डेंटल कॉलेज (2016) के 4-चरणीय आनुपातिकता परीक्षण के तहत: (1) वैध उद्देश्य, (2) तार्किक संबंध, (3) न्यूनतम प्रतिबंधात्मक साधन (Least Restrictive Measure), और (4) संतुलन।
    • बच्चों की सुरक्षा के लिए पूर्ण इंटरनेट प्रतिबंध ‘न्यूनतम प्रतिबंधात्मक साधन’ नहीं है। सुरक्षा का उद्देश्य ‘चाइल्ड मोड’, सुरक्षात्मक फिल्टर और माता-पिता के सहयोग से प्राप्त किया जा सकता है, न कि मौलिक अधिकार को ही छीनकर।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: इन री: बाल यौन शोषण व दुर्व्यवहार सामग्री (CSEAM) की ऑनलाइन रोकथाम एवं इंटरनेट अधिकार [सर्वोच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन (खंडपीठ)
  • निर्णय की तिथि: 17 अक्टूबर 2026
  • संबद्ध विषय: अनुच्छेद 21 व 19(1)(a) के तहत इंटरनेट एक्सेस का मौलिक अधिकार और CSEAM रोकथाम दिशानिर्देश
  • प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) एवं अनुच्छेद 142
    • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) — धारा 67B (इलेक्ट्रॉनिक रूप में बच्चों को दर्शाने वाली अश्लील सामग्री के लिए दंड), धारा 79 एवं सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021
    • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) — धारा 15 (बाल पोर्नोग्राफी सामग्री का संग्रहण/प्रसारण)
    • डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (DPDP Act) — धारा 9 (बच्चों के व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण पर विशेष सुरक्षा उपाय)
  • संबद्ध न्यायिक नजीरें:
    • अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ [(2020) 3 SCC 637] — इंटरनेट के जरिए अधिकारों का संरक्षण।
    • प्रज्ञा प्रसून बनाम भारत संघ (2025) — डिजिटल एक्सेस अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार।
    • के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ [(2017) 10 SCC 1] — निजता और आनुपातिकता का सिद्धांत।
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • बाल डिजिटल अधिकार एवं सुरक्षा संतुलन: ‘इंटरनेट का उपयोग और पहुंच बच्चों सहित सभी व्यक्तियों का मौलिक अधिकार है; बच्चों को हानिकारक सामग्री से बचाने का उपाय पूर्ण प्रतिबंध नहीं बल्कि तकनीकी मॉडरेशन, डिफॉल्ट चाइल्ड मोड और माता-पिता की आनुपातिक निगरानी है।’
  • अंतिम निर्देश: बच्चों के इंटरनेट उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध की अवधारणा को असंवैधानिक और अव्यावहारिक घोषित किया गया; केंद्र सरकार को सोशल मीडिया बिचौलियों के लिए आनुपातिक चाइल्ड-मोड सुरक्षा नियम बनाने और CSEAM सामग्री के त्वरित निष्कासन हेतु राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने का अंतिम न्यायिक निर्देश।

Child Use Internet: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठन्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन
संविधान के प्रावधानअनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) एवं अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता)
मुख्य न्यायिक मिसालेंअनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) और प्रज्ञा प्रसून बनाम भारत संघ (2025)
मुख्य कानूनी सिद्धांत1. इंटरनेट तक पहुंच और उपयोग का अधिकार बच्चों का भी मौलिक अधिकार है।
2. बच्चों के इंटरनेट उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध (Blanket Prohibition) अनुपातहीन और अप्रमाणित है।
3. ऑनलाइन सुरक्षा और स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
मुख्य निर्देश1. CSEAM का पता लगाने व हटाने के लिए राष्ट्रीय डेटाबेस का निर्माण।
2. केंद्र सरकार बच्चों के लिए आनुपातिक सुरक्षा उपाय (Parental Consent & Child Mode) बनाए।
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