Thursday, October 15, 2026
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Civic Sense: आप विदेश में नियम मानते हैं, तो भारत में क्यों नहीं?…इस तरह भारतीयों को दी ‘सिविक सेंस’ की नसीहत

Civic Sense: बॉम्बे हाई कोर्ट ने सड़क हादसों में जान गंवाने वाले नागरिकों के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए भारतीयों को ‘सिविक सेंस’ (Civic Sense) और अनुशासन अपनाने की नसीहत दी है।

हाईकोर्ट के जस्टिस जितेंद्र जैन की बेंच ने ठाणे में एक बस दुर्घटना में मारे गए व्यक्ति के परिवार को मुआवजा बढ़ाते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि अब समय आ गया है जब नागरिकों को बिना किसी दबाव के खुद जिम्मेदार बनना होगा। अदालत ने कहा कि विकसित देशों में नियमों का पालन करने वाले भारतीय अपने देश लौटते ही नियमों की धज्जियां क्यों उड़ाने लगते हैं?

पैदल यात्री और सिग्नल जंपिंग (Pedestrian Negligence)

  • अदालत ने पैदल चलने वालों के व्यवहार पर टिप्पणी की।
  • लापरवाही का दाम: अक्सर देखा जाता है कि लोग सिग्नल की परवाह किए बिना सड़क पार करते हैं। भले ही सड़क खाली हो, लेकिन अगर सिग्नल पैदल पार करने की अनुमति नहीं देता, तो रुकना चाहिए।
  • अधिकार बनाम कर्तव्य: कोर्ट ने जोर दिया कि “अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं”। यदि आप सुरक्षित सड़क का अधिकार चाहते हैं, तो नियमों का पालन करना आपका कर्तव्य है।

टू-व्हीलर सवारों को ‘सख्त चेतावनी’

  • कोर्ट ने ट्रैफिक पुलिस से सिग्नल तोड़ने वाले दोपहिया वाहन चालकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की मांग की।
  • खतरनाक ड्राइविंग: जस्टिस जैन ने नोट किया कि कार चालकों में सुधार हुआ है, लेकिन टू-व्हीलर सवार अभी भी रेड सिग्नल जंप करते हैं, जिससे न केवल उनकी बल्कि अन्य निर्दोष लोगों की जान को भी खतरा होता है।

बच्चों के लिए ‘बुरा उदाहरण’ न बनें

  • अदालत ने माता-पिता और बुजुर्गों को उनकी नैतिक जिम्मेदारी याद दिलाई।
  • देखकर सीखते हैं बच्चे: जब बड़े बच्चों के सामने नियम तोड़ते हैं, तो वे समाज के लिए खतरनाक उदाहरण पेश कर रहे होते हैं। बच्चों के मन में कानून के प्रति सम्मान पैदा करना बड़ों की नैतिक जिम्मेदारी है।
  • विकसित देशों से सीखें: भारतीयों में यह प्रवृत्ति देखी गई है कि वे विदेश (Developed Countries) जाते ही बहुत अनुशासित हो जाते हैं, लेकिन भारत लौटते ही वही पुराना ढर्रा अपना लेते हैं। यह सोच बदलनी होगी।

मुआवजे में वृद्धि (Case & Compensation)

  • यह मामला 2012 का है, जब ठाणे में पार्किंसंस रोग से पीड़ित एक व्यक्ति को म्युनिसिपल बस ने टक्कर मार दी थी।
  • MACT का फैसला: ट्रिब्यूनल ने बस ड्राइवर और मृतक, दोनों को 50-50% जिम्मेदार माना था और ₹13.23 लाख का मुआवजा तय किया था।
  • हाई कोर्ट का फैसला: हाई कोर्ट ने 50% लापरवाही के फैसले को बरकरार रखा, लेकिन मृतक की मासिक आय को बढ़ाकर माना और ‘पीड़ा और कष्ट’ के लिए अतिरिक्त राशि जोड़ी।
  • नतीजा: कुल मुआवजा ₹15.15 लाख कर दिया गया (₹1.92 लाख की बढ़ोतरी)।

निष्कर्ष: जिम्मेदारी ही सुरक्षा है

बॉम्बे हाई कोर्ट का यह फैसला कानून से ज्यादा एक सामाजिक संदेश है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक देश के नागरिकों में आंतरिक अनुशासन (Self-discipline) नहीं आएगा, तब तक केवल पुलिस या कानून के जरिए सड़क हादसों को कम नहीं किया जा सकता।

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