Thursday, October 15, 2026
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Court Ruling: भड़काऊ बयानों पर ट्रायल जरूरी…,गैंगस्टर अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की हत्या के समय दिए बयान, भड़के कोर्ट की टिप्पणी

Court Ruling: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रदेश अध्यक्ष नूर अहमद अजहरी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव की बेंच ने नूर अहमद अजहरी की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि मामले के प्रारंभिक चरण में आरोपों को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने माना कि यह मामला आगे की कानूनी कार्यवाही और ट्रायल के लिए पर्याप्त है। यह मामला एक वायरल वीडियो से जुड़ा है जिसमें अजहरी ने कथित तौर पर कहा था कि भाजपा शासित राज्य मुसलमानों को डराने की कोशिश कर रहे हैं और उन्होंने “संविधान को पैरों तले कुचल दिया” है।

मामला क्या था? (The Disputed Video)

  • घटनाक्रम: अप्रैल 2023 में गैंगस्टर अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की हत्या के बाद एक वीडियो वायरल हुआ था।
  • कथित टिप्पणी: वीडियो में अजहरी ने कथित तौर पर दावा किया कि भाजपा शासित राज्यों की सरकारें मुसलमानों को डरा रही हैं और यह हत्याएं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में एक साजिश का हिस्सा थीं।
  • संविधान पर बयान: उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा का संविधान में कोई विश्वास नहीं है और उन्होंने इसे “मिट्टी में मिला दिया” है।
  • पुलिस की कार्रवाई: पीलीभीत के पूरनपुर थाने में 2023 में FIR दर्ज की गई थी। पुलिस का आरोप था कि इन बयानों से सांप्रदायिक भावनाएं भड़क सकती हैं और सार्वजनिक शांति भंग हो सकती है।
  • शुरुआत में FIR में 153A और 295A लगाई गई थी, लेकिन जांच के बाद पुलिस ने IPC की धारा 505(2) के तहत चार्जशीट दाखिल की।

हाई कोर्ट का कानूनी रुख (Legal Stand of HC)

  • अदालत ने याचिका खारिज करते हुए कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।
  • प्रथम दृष्टया मामला (Prima Facie Case): FIR के अवलोकन से ऐसा लगता है कि आरोपी पर एक विशेष समुदाय के बीच धार्मिक उत्तेजना और सांप्रदायिक भावनाएं फैलाने का आरोप है, जिससे लोगों के बीच शत्रुता पैदा हो सकती है।
  • मजिस्ट्रेट की भूमिका: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समन जारी करते समय मैजिस्ट्रेट को केवल यह देखना होता है कि “कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार” हैं या नहीं, न कि यह कि सबूत सजा दिलाने के लिए पर्याप्त हैं या नहीं।
  • ट्रायल अनिवार्य: इन आरोपों की सच्चाई और मंशा का फैसला केवल ट्रायल (मुकदमे) के दौरान ही किया जा सकता है, इसे शुरुआती दौर में रद्द नहीं किया जा सकता।

दोनों पक्षों की दलीलें

  • याचिकाकर्ता (नूर अहमद अजहरी) का पक्ष: उन्होंने तर्क दिया कि वे केवल एक सार्वजनिक चर्चा में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। उनकी मंशा नफरत फैलाने की नहीं थी और पुलिस जांच निष्पक्ष नहीं रही है।
  • राज्य सरकार का पक्ष: सरकार ने दलील दी कि अजहरी के दावे तथ्यात्मक मुद्दे उठाते हैं जिनकी जांच केवल ट्रायल के दौरान ही हो सकती है। उनके बयान उकसाने वाले थे जिससे दंगे या अशांति फैलने की संभावना थी।

कानूनी धाराएं (Key Sections Involved)

धाराविवरण
Section 505(2)विभिन्न समुदायों के बीच शत्रुता, घृणा या वैमनस्य को बढ़ावा देने वाले बयान देना।

निष्कर्ष: अभिव्यक्ति की आजादी बनाम लोक व्यवस्था

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech) असीमित नहीं है। यदि किसी सार्वजनिक बयान से सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने या सरकार के प्रति नफरत फैलाकर दंगे भड़काने की संभावना दिखती है, तो अदालतें प्राथमिक स्तर पर राहत देने के बजाय मामले को ट्रायल के लिए भेजना उचित मानती हैं।

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