Thursday, October 15, 2026
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SOP for Witnesses: सहूलियत के लिए कुछ खास खबरी या जानकारों को बनाते हैं गवाह…स्टॉक गवाहों की चालाकी पर यह बन रहा नियम, पढ़ें

SOP for Witnesses: सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक न्याय प्रणाली में ‘स्टॉक गवाहों’ (Stock Witnesses) की गंभीर समस्या से निपटने के लिए गठित अपनी उच्च स्तरीय समिति का विस्तार कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने पिछले महीने गठित 7-सदस्यीय समिति में तीन और वकीलों (सोनिया माथुर सहित) को जोड़कर इसका विस्तार किया है। इस समिति को एक महीने के भीतर अपनी सिफारिशें सौंपनी हैं। अदालत ने इस प्रथा को कानून के शासन (Rule of Law) के लिए “कलंक” बताया है, जहाँ पुलिस अपनी जाँच की खानापूर्ति करने के लिए बार-बार एक ही व्यक्ति को गवाह के रूप में पेश करती है।

क्या होते हैं ‘स्टॉक गवाह’? (What are Stock Witnesses?)

  • परिभाषा: ये ऐसे व्यक्ति होते हैं जो पुलिस और जाँच एजेंसियों के लिए हर मामले में “हाजिर” रहते हैं। पुलिस अपनी कहानी की पुष्टि (Corroboration) करने के लिए इन्हें बार-बार अलग-अलग मामलों में स्वतंत्र गवाह (Independent Witness) के रूप में पेश करती है।
  • जरूरत कहाँ पड़ती है? वरिष्ठ वकील रेबेका जॉन के अनुसार, NDPS (नशीले पदार्थ) और भ्रष्टाचार (Trap Cases) के मामलों में इनकी भूमिका बढ़ जाती है, जहाँ जब्ती, तलाशी या रिश्वत के लेनदेन के वक्त गवाहों का होना अनिवार्य है।
  • परिणाम: चूँकि ये गवाह असल में मौके पर मौजूद नहीं होते, इसलिए वे अक्सर अदालत में मुकर जाते हैं (Hostile Witness), जिससे असली अपराधी छूट जाते हैं और न्याय प्रणाली पर भरोसा कम होता है।

इंदौर के मामले ने खोली पोल (The Indore Connection)

  • यह पूरा मामला इंदौर के वकील असद अली वारसी द्वारा दायर एक आवेदन से शुरू हुआ। उन्होंने अदालत को चौंकाने वाले तथ्य बताए।
  • रिकॉर्ड: इंदौर के एक ही पुलिस स्टेशन में नवंबर 2023 से नवंबर 2024 के बीच दर्ज सैकड़ों FIR में एक ही व्यक्ति को बार-बार गवाह बनाया गया था।
  • अदालत की सख्ती: सुप्रीम कोर्ट ने इसे “जाँच की निष्पक्षता की जड़ पर प्रहार” बताया। कोर्ट ने कहा कि कई बार गवाहों को दबाव में या महज औपचारिकता पूरी करने के लिए FIR में शामिल किया जाता है।

कमिटी की संरचना (The High-Level Committee)

  • सुप्रीम कोर्ट ने इस समस्या के समाधान के लिए एक मानक प्रक्रिया (SOP) तैयार करने का काम इस कमिटी को सौंपा है।
  • अध्यक्ष: जस्टिस विवेक अग्रवाल (मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के मौजूदा जज)।
  • प्रमुख सदस्य: एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज और एस. डी. संजय; वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ दवे, संजय हेगड़े, सोनिया माथुर और एस. नागामुथु।
  • पुलिस प्रतिनिधित्व: हरिनारायणाचारी मिश्र (IG, स्टेट क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो, भोपाल)।

कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां (Key Judicial Observations)

विषयसुप्रीम कोर्ट का रुख
जाँच का तरीकाFIR और चार्जशीट में गवाहों को शामिल करना केवल “औपचारिकता” बनकर रह गया है।
अनुच्छेद 21गलत तरीके से गवाह पेश करना निष्पक्ष जाँच और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हनन है।
सुधार की आवश्यकताजाँच और ट्रायल में जनता का विश्वास बहाल करने के लिए एक ‘स्टैंडर्ड प्रोसीजर’ जरूरी है।
डेडलाइनकमिटी को अपनी रिपोर्ट एक महीने के भीतर देनी होगी।

निष्कर्ष: निष्पक्ष न्याय की ओर कदम

अक्सर देखा जाता है कि पुलिस अपनी सहूलियत के लिए कुछ खास ‘खबरी’ या जानकारों को ही हर पंचनामे में गवाह बना लेती है। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम इस “चूहे-बिल्ली के खेल” को खत्म करेगा। यदि समिति एक सख्त SOP (Standard Operating Procedure) बनाने में सफल रहती है, तो पुलिस को हर मामले में वास्तविक और स्थानीय गवाहों को जोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जिससे जाँच में पारदर्शिता आएगी।

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