Thursday, October 1, 2026
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FIR Validation: एफआईआर रद्द करने की शक्ति बेहद सीमित मामलों में ही प्रयोग हो… इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त

FIR Validation: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा, एफआईआर रद्द करने की शक्ति बेहद सीमित मामलों में ही प्रयोग हो।

एफआईआर को चुनौती देनेवाले मामले पर सुनवाई

न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत शुक्ला की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए एक याचिका खारिज कर दी, जिसमें एक एफआईआर को यह कहते हुए चुनौती दी गई थी कि यह पहली एफआईआर के समान तथ्यों और आरोपों पर आधारित दूसरी एफआईआर है, जिसे दुर्भावनापूर्ण इरादे से मूल घटना के पांच वर्ष बाद दर्ज किया गया।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सूचना देने वाले शुभम अग्निहोत्री द्वारा उसी थाने में पहले दर्ज कराई गई एफआईआर की जांच हो चुकी है और उसमें उनके खिलाफ कोई अपराध नहीं पाया गया। अदालत ने कहा, किसी एफआईआर या आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की शक्ति (पावर ऑफ क्वैशिंग) बेहद संयम और सतर्कता के साथ केवल दुर्लभ मामलों में ही प्रयोग की जानी चाहिए, जब शिकायत में कोई संज्ञेय अपराध स्पष्ट रूप से सामने न आता हो या जांच जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग साबित होता हो।

सुप्रीम कोर्ट के केस का दिया गया हवाला

कोर्ट ने हालांकि यह कहते हुए हस्तक्षेप से इनकार कर दिया कि दूसरी एफआईआर पर रोक तभी लागू होती है, जब दोनों एफआईआर एक ही घटना या लेनदेन से संबंधित हों। कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि यदि नई एफआईआर नए तथ्यों या अलग अपराधों का खुलासा करती है, तो उसका दर्ज होना कानूनन निषिद्ध नहीं है। पारुल बुधराजा और तीन अन्य की याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के टी.टी. एंटोनी बनाम स्टेट ऑफ केरल (2001) के फैसले में भी यह स्पष्ट किया गया है कि एक ही घटना या लेनदेन पर दूसरी एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती, लेकिन यदि नए तथ्यों, व्यापक साजिश या अलग घटना का पता चलता है, तो नई एफआईआर पर रोक लागू नहीं होती।

‘रूल ऑफ सैमनेस’ (समानता का नियम) पर काम की नसीहत

कोर्ट ने कहा, ‘रूल ऑफ सैमनेस’ (समानता का नियम) को व्यावहारिक तरीके से लागू किया जाना चाहिए। यदि दूसरी एफआईआर का उद्देश्य और दायरा पहली से अलग है, तो उस पर रोक नहीं लगाई जा सकती। मामले में चार आरोपियों ने 2019 की एक निवेश योजना से जुड़ी धोखाधड़ी की जांच से बचने के लिए जाली दस्तावेजों, फर्जी हस्ताक्षरों और नकली नोटरी सील का उपयोग करने के आरोपों से खुद को बचाने के लिए याचिका दायर की थी।

मजिस्ट्रेट के आदेश पर नई एफआईआर दर्ज की गई थी

वर्तमान मामले में 2024 में धारा 156(3) सीआरपीसी के तहत मजिस्ट्रेट के आदेश पर नई एफआईआर दर्ज की गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह 2021 की एफआईआर के समान तथ्यों पर आधारित दूसरी एफआईआर है।
वहीं, शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि नई एफआईआर बाद में की गई जालसाजी और दस्तावेजों के दुरुपयोग से जुड़ी अलग घटना पर आधारित है, इसलिए इसे रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता।

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