मुख्य संकेतक (Key Indicators)
- सिनेमा श्रमिकों के लिए उपकर (Cess for Cine Workers): राज्य सरकार ने फिल्म उद्योग और सांस्कृतिक गतिविधियों में लगे श्रमिकों के कल्याण के लिए कोष जुटाने के उद्देश्य से सिनेमा टिकटों के मूल्य पर 2% उपकर लगाने का प्रावधान किया है।
- अदालत का सुझाव और सरकार का आश्वासन: उच्च न्यायालय ने कहा कि कानून की वैधता को चुनौती दी गई है और इसके तहत हर महीने रिपोर्ट दाखिल करनी होती है। इसलिए अगली सुनवाई तक दंडात्मक कार्रवाई से बचा जाना चाहिए। अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) भानु प्रकाश ने राज्य की ओर से बयान दिया कि अदालत द्वारा अंतिम निर्णय या अगली सुनवाई तक कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
- याचिकाकर्ताओं के तर्क:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि अधिनियम में यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है कि उपकर का भुगतान प्रदर्शकों को करना अनिवार्य है।
- रजिस्ट्रेशन या अनुपालन (Compliance) के लिए अभी तक कोई निर्धारित प्रारूप या फॉर्म भी जारी नहीं किया गया है।
- नोटिस वापस लेने की घोषणा: एएजी ने कोर्ट को सूचित किया कि उपकर संग्रह के संबंध में सिनेमा ऑपरेटरों को पूर्व में जारी किए गए सभी प्रशासनिक नोटिस राज्य सरकार द्वारा वापस लिए जा रहे हैं।
- कानून पर रोक लगाने से इनकार: राज्य के अनुरोध पर, हाईकोर्ट ने कानून पर औपचारिक रोक (Interim Stay) तो नहीं लगाई, लेकिन सरकार के इस आश्वासन को अपने आधिकारिक आदेश में दर्ज कर लिया कि किसी ऑपरेटर पर दबाव नहीं बनाया जाएगा।
बेंगलुरु: कर्नाटक सरकार द्वारा सिनेमा टिकटों के मूल्य पर हाल ही में लागू किए गए 2 प्रतिशत अतिरिक्त उपकर (Cess), फिल्म व सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं के कल्याण कानून की संवैधानिक वैधता और सिनेमाघर संचालकों के विधिक अधिकारों पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण अंतरिम सुरक्षात्मक रुख अपनाया है।
न्यायमूर्ति एच.टी. नरेंद्र प्रसाद की एकल पीठ ‘कर्नाटक सिने और सांस्कृतिक कार्यकर्ता (कल्याण) अधिनियम, 2024’ (Karnataka Cine and Cultural Activists (Welfare) Act, 2024), वर्ष 2026 में इसमें किए गए संशोधनों तथा सिनेमा टिकटों के राजस्व पर उपकर की वसूली के लिए बनाए गए नियमों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। यह नया वैधानिक उपकर आज यानी 30 सितंबर 2026 से ही पूरे राज्य में लागू होने वाला था। उच्च न्यायालय में याचिकाओं की प्रारंभिक सुनवाई के दौरान कर्नाटक राज्य सरकार ने औपचारिक वचनबद्धता (Undertaking) दी है कि वह 2% सेस न वसूलने पर सिनेमा संचालकों (Exhibitors & Multiplex Operators) के खिलाफ फिलहाल कोई भी दंडात्मक कार्रवाई (Coercive Action) नहीं करेगी।
उच्च न्यायालय की टिप्पणी एवं राज्य सरकार की अंडरटेकिंग
1. ‘जब तक कानून की वैधता पर सुनवाई नहीं होती, कोई दंडात्मक कार्रवाई न हो’ सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति एच.टी. नरेंद्र प्रसाद ने नोट किया कि अधिनियम की धारा 9 के तहत सिनेमा संचालकों को एकत्रित उपकर का मासिक अनुपालन (Monthly Compliance) और विवरणी प्रस्तुत करना आवश्यक है। कानून आज ही प्रभावी हो रहा था, जिससे सिनेमा संचालकों पर तत्काल अनुपालन का भारी दबाव था।
अदालत ने राज्य सरकार के अधिवक्ता से स्पष्ट कहा:“अधिनियम की संवैधानिक वैधता को सीधे चुनौती दी गई है। इसलिए जब तक अगली सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक आप याचिकाकर्ताओं (सिनेमा संचालकों) के खिलाफ कोई भी दंडात्मक कदम (Coercive Steps) न उठाएं।”
2. अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) का आश्वासन: ‘नोटिस वापस, 4-5 दिन में दाखिल करेंगे आपत्ति’
- राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) भानु प्रकाश ने अदालत को आश्वासन दिया कि राज्य सरकार सिनेमा संचालकों के खिलाफ कोई जब्रिया कार्रवाई नहीं करेगी।
- एएजी ने अदालत को सूचित किया कि उपकर वसूली को लेकर याचिकाकर्ताओं को पहले जारी किए गए सभी नोटिस राज्य सरकार द्वारा वापस (Withdrawn) लिए जा रहे हैं।
- उन्होंने पीठ से आग्रह किया:“हमें आपत्ति (Objections) दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया जाए। तब तक हम याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं करेंगे। कृपया कानून के संचालन पर औपचारिक स्थगन (Stay) आदेश पारित न करें; हम जल्द ही जवाब दाखिल करेंगे और मामले का अंतिम निपटारा किया जा सकता है।”
अदालत ने राज्य सरकार के इस औपचारिक वचन को न्यायिक रिकॉर्ड पर दर्ज करते हुए कानून पर औपचारिक स्टे देने से परहेज किया, परंतु अंतरिम रूप से सिनेमा संचालकों को पूर्ण दंडात्मक संरक्षण प्रदान कर दिया।
याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए मुख्य विधिक आधार
यह संयुक्त याचिका मल्टीप्लेक्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (MAI), पीवीआर आईनॉक्स लिमिटेड (PVR INOX Limited), पीवीआर आईनॉक्स के शेयरधारक प्रतीक चौहान और प्रसिद्ध सिनेमाघर विनायक चित्रमंदिरा द्वारा दायर की गई है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता उदय होल्ला और अधिवक्ता के.वी. धनंजय ने निम्नलिखित प्रमुख विधिक आपत्तियां प्रस्तुत कीं:
- स्पष्ट देनदारी का अभाव:
- विनायक चित्रमंदिरा की ओर से पेश अधिवक्ता के.वी. धनंजय ने दलील दी कि ‘कर्नाटक सिने और सांस्कृतिक कार्यकर्ता (कल्याण) अधिनियम, 2024’ स्पष्ट और प्रत्यक्ष रूप से यह निर्धारित नहीं करता कि उपकर का भुगतान करने के लिए सिनेमाघर संचालक सीधे तौर पर कानूनी रूप से उत्तरदायी हैं।
- प्रक्रियात्मक शून्यता और फॉर्मों का अभाव:
- याचिकाकर्ताओं ने बताया कि यद्यपि यह कानून आज (30 सितंबर 2026) से लागू हो रहा है और अगले माह से रिटर्न फाइल करने की बाध्यता होगी, परंतु सरकार ने अभी तक इस अधिनियम के तहत सिनेमाघरों के अनिवार्य पंजीकरण (Registration) के लिए कोई निर्धारित प्रारूप (Prescribed Form) तक अधिसूचित नहीं किया है।
- सिनेमा उद्योग पर दोहरा वित्तीय बोझ:
- जीएसटी (GST) व्यवस्था के तहत पहले से ही सिनेमा टिकटों पर 12% और 18% की दर से अप्रत्यक्ष कर वसूला जा रहा है। टिकट की मूल कीमत पर अतिरिक्त 2% सेस लगाना राज्य की विधायी शक्तियों के अतिक्रमण और कारोबार की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(g)) के प्रतिकूल होने का तर्क दिया गया।
क्या है कर्नाटक सिने कार्यकर्ता (कल्याण) उपकर कानून?
- अधिनियम का उद्देश्य:
- कर्नाटक राज्य सरकार ने कन्नड़ और स्थानीय फिल्म उद्योग से जुड़े तकनीशियनों, जूनियर कलाकारों, स्पॉट बॉय और सांस्कृतिक कर्मियों के सामाजिक सुरक्षा, पेंशन, चिकित्सा लाभ और समग्र कल्याण हेतु एक कल्याणकारी कोष (Welfare Fund) बनाने के लिए इस कानून को पारित किया था।
- उपकर की दर:
- राज्य भर में बिकने वाले प्रत्येक सिनेमा टिकट के राजस्व पर 2 प्रतिशत का कल्याणकारी उपकर (Cess) लगाने का प्रावधान किया गया था।
- विवादित धारा 9:
- इसके तहत सिनेमा थियेटरों और मल्टीप्लेक्सों को बेचे गए टिकटों से इस 2% सेस को एकत्र कर हर महीने एक निश्चित तिथि तक राज्य सरकार के संबंधित कल्याण बोर्ड में जमा कराना अनिवार्य किया गया था।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: मल्टीप्लेक्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया व अन्य बनाम कर्नाटक राज्य व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – कर्नाटक उच्च न्यायालय, मुख्य पीठ Bengaluru]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता उदय होल्ला, अधिवक्ता के.वी. धनंजय व अन्य
- राज्य सरकार की ओर से: अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) भानु प्रकाश
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- कर्नाटक सिने और सांस्कृतिक कार्यकर्ता (कल्याण) अधिनियम, 2024 (यथासंशोधित 2026)
- अधिनियम की धारा 9 (उपकर की मासिक वसूली, विवरणी और अनुपालन)
- कर्नाटक सिने और सांस्कृतिक कार्यकर्ता उपकर नियमावली, 2026
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)
- अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यापार और व्यवसाय के संचालन की स्वतंत्रता)
- अनुच्छेद 265 (विधि के प्राधिकार के बिना कोई कर या उपकर न लगाया जाना)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- दीवान चंद सत्यपाल बनाम भारत संघ (सुप्रीम कोर्ट) — ‘कल्याणकारी उपकर (Welfare Cess) का करदाता पर प्रत्यक्ष संबंध और वसूली के वैधानिक तंत्र में अस्पष्टता नहीं होनी चाहिए।’
- पीठ: न्यायमूर्ति एच.टी. नरेंद्र प्रसाद (कर्नाटक उच्च न्यायालय)
- अदालत का अंतरिम निर्देश: राज्य सरकार के इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया गया कि अगली सुनवाई तक उपकर न वसूलने पर सिनेमा संचालकों के खिलाफ कोई दंडात्मक कदम नहीं उठाया जाएगा; सरकार द्वारा पूर्व में जारी नोटिस वापस; मामले की अगली विस्तृत सुनवाई 26 अक्टूबर 2026 को नियत।
Cess Charge: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति एच.टी. नरेंद्र प्रसाद |
| याचिकाकर्ता | मल्टीप्लेक्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (MAI), PVR INOX लिमिटेड और विनायक चित्रमंदिरा |
| विवादित कानून | कर्नाटक सिनेमा एवं सांस्कृतिक कार्यकर्ता (कल्याण) अधिनियम, 2024 और इसमें 2026 के संशोधन |
| मुख्य मुद्दा | सिनेमा टिकट की बिक्री पर सिनेमा कर्मचारियों के कल्याण के लिए 2% उपकर लगाने की वैधता |
| अदालत का फैसला | राज्य सरकार का आश्वासन दर्ज किया; 26 अक्टूबर 2026 तक सिनेमा ऑपरेटरों पर कोई कार्रवाई नहीं होगी। |

