Friday, October 9, 2026
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Freebies culture: हर किसी को फ्री बिजली देना तुष्टिकरण…रोजगार पर सरकार ध्यान दें

Freebies culture: सुप्रीम कोर्ट ने देश में बढ़ती ‘मुफ्त रेवड़ी’ (Freebies) की संस्कृति पर कड़ा प्रहार किया है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि अब समय आ गया है कि ऐसी नीतियों पर फिर से विचार किया जाए जो देश के आर्थिक विकास में बाधा डाल रही हैं। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पांचोली की पीठ ने तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन (Tangedco) की उस याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की, जिसमें उपभोक्ताओं की आर्थिक स्थिति देखे बिना सभी को मुफ्त बिजली देने का प्रस्ताव दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियां

  • विकास बनाम मुफ्तखोरी: अदालत ने कहा, “देश के अधिकांश राज्य राजस्व घाटे (Revenue Deficit) में चल रहे हैं, इसके बावजूद वे विकास को नजरअंदाज कर ऐसी मुफ्त चीजें बांट रहे हैं। इससे देश का आर्थिक विकास बाधित होता है।”
  • गरीब और अमीर में फर्क जरूरी: CJI ने सवाल उठाया, “यह समझ में आता है कि कल्याणकारी उपाय के तहत आप उन लोगों की मदद करें जो बिल भरने में अक्षम हैं। लेकिन जो भुगतान कर सकते हैं और जो नहीं कर सकते, उनके बीच बिना अंतर किए मुफ्त बांटना क्या ‘तुष्टिकरण की नीति’ नहीं है?”
  • वर्क कल्चर पर खतरा: कोर्ट ने चेतावनी देते हुए कहा, “अगर आप सुबह से शाम तक मुफ्त खाना, फिर मुफ्त साइकिल और फिर मुफ्त बिजली देना शुरू कर देंगे, तो काम कौन करेगा? इससे देश के वर्क कल्चर (कार्य संस्कृति) का क्या होगा?”

सिर्फ वेतन देना और मुफ्त बांटना ही सरकार का काम नहीं

बेंच ने तल्ख लहजे में कहा कि राज्य सरकारें विकास परियोजनाओं पर खर्च करने के बजाय दो ही काम कर रही हैं—कर्मचारियों को वेतन देना और मुफ्त की चीजें बांटना। कोर्ट ने सुझाव दिया कि राज्यों को लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने पर काम करना चाहिए।

क्या है कानूनी मामला?

तमिलनाडु की DMK सरकार के स्वामित्व वाली बिजली कंपनी ने ‘बिजली संशोधन नियम, 2024’ के एक नियम को चुनौती दी है। कंपनी ने बिजली की दरें तय होने के बाद अचानक मुफ्त बिजली देने का प्रस्ताव रखा, जिस पर कोर्ट ने हैरानी जताई। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

मुख्य निष्कर्ष

अदालत ने स्पष्ट किया कि वह गरीबों की मदद (Hand-holding) के खिलाफ नहीं है, लेकिन बिना किसी मापदंड के ‘खैरात’ बांटने की नीति देश की अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक है।

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