Thursday, October 29, 2026
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Handwriting Verdict: बिना बताए हैंडराइटिंग का मिलान नहीं कर सकते जज…यूं रद्द किया 2011 का तलाक का फैसला

Handwriting Verdict: दिल्ली हाई कोर्ट ने साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) की धारा 73 की व्याख्या करते हुए एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है।

हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेणु भटनागर की बेंच ने रोहिणी फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए तलाक के आदेश को ‘प्रक्रियात्मक रूप से गलत’ बताते हुए रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जज को विशेषज्ञ की भूमिका निभाने से पहले पक्षों को विश्वास में लेना अनिवार्य है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक जज को दोनों पक्षों को सूचित किए बिना या उन्हें जवाब देने का अवसर दिए बिना खुद से हैंडराइटिंग (हस्तलेखन) के नमूनों की तुलना नहीं करनी चाहिए।

मामला क्या था? (The Dispute)

  • तलाक का आधार: पति ने ‘क्रूरता’ (Cruelty) का आरोप लगाते हुए एक हस्तलिखित पर्ची (Handwritten slip) पेश की थी। दावा था कि इसमें पत्नी ने कुछ मांगें लिखी थीं।
  • फैमिली कोर्ट की कार्रवाई: जज ने पत्नी को हैंडराइटिंग के नमूने देने को कहा। जब पत्नी ने हिचकिचाहट दिखाई, तो कोर्ट ने उसके खिलाफ ‘प्रतिकूल निष्कर्ष’ (Adverse Inference) निकाला। जज ने खुद ही नमूनों का मिलान किया और माना कि पर्ची पत्नी ने ही लिखी थी।

हाई कोर्ट की आपत्तियां: नेचुरल जस्टिस के खिलाफ

  • हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के नजरिए को “गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण” पाया।
  • पारदर्शिता की कमी: कोर्ट ने कहा कि पक्षों को यह जानकारी नहीं दी गई थी कि उनके नमूनों का उपयोग जज खुद मिलान के लिए करेंगे।
  • धारा 73 का सीमित उपयोग: साक्ष्य अधिनियम की धारा 73 जजों को तुलना करने की शक्ति तो देती है, लेकिन इसका उपयोग बहुत सावधानी से (Sparingly) किया जाना चाहिए।
  • विशेषज्ञ की सलाह: कोर्ट ने नोट किया कि जज ने किसी हैंडराइटिंग एक्सपर्ट (Handwriting Expert) की मदद नहीं ली और न ही पक्षों को ऐसा करने का मौका दिया।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुहाई कोर्ट का निष्कर्ष
प्रक्रियात्मक निष्पक्षतापक्षों को पता होना चाहिए कि उनके हैंडराइटिंग सैंपल का उपयोग किस लिए हो रहा है।
गलत धारणाकेवल नमूने देने में हिचकिचाहट को ‘दोष’ नहीं माना जा सकता, अगर इरादा स्पष्ट न किया गया हो।
नतीजा2011 में क्रूरता के आधार पर दिया गया तलाक का डिक्री रद्द।
सबूत का बोझकोर्ट ने पाया कि क्रूरता के अन्य आरोप भी बिना सबूत के थे।

कानून की बात: धारा 73 क्या कहती है?

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 73 अदालत को यह अधिकार देती है कि वह किसी व्यक्ति के हस्ताक्षर या लेखनी की तुलना किसी अन्य स्वीकृत या प्रमाणित नमूने से कर सके। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि जज को खुद ‘एक्सपर्ट’ बनने से बचना चाहिए क्योंकि लिखावट में सूक्ष्म अंतर केवल एक प्रशिक्षित विशेषज्ञ ही समझ सकता है।

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