Wednesday, July 22, 2026
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Family Dispute: अपनी ही बेटियों पर घिनौने आरोप लगाना शर्मनाक…सेक्स रैकेट के दावे को बताया झूठा, IIT कानपुर की फॉरेंसिक रिपोर्ट ने खोली पोल

Family Dispute: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने शिवराम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में एक पिता द्वारा अपनी ही पत्नी और बेटियों के खिलाफ लगाए गए ‘सेक्स रैकेट’ के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने शिवराम द्वारा दायर एक क्रिमिनल रिट पिटीशन को खारिज कर दिया। कोर्ट ने माना कि यह मामला किसी अपराध का नहीं, बल्कि परिवार के बीच बुरी तरह टूटे हुए रिश्तों का है। अदालत ने इन आरोपों को न केवल “निराधार” बताया, बल्कि इन्हें परिवार को बदनाम करने का एक “घृणित तरीका” (Abominable way) करार दिया।

मामला क्या था? (The Background)

  • याचिकाकर्ता का दावा: याचिकाकर्ता (शिवराम) ने खुद कोर्ट में पेश होकर अपनी पत्नी और बेटियों पर शहर में एक ‘सेक्स रैकेट’ चलाने का गंभीर आरोप लगाया था।
  • मध्यस्थता की विफलता: कोर्ट ने पहले इस मामले को हाई कोर्ट के मीडिएशन सेंटर (Mediation Centre) भेजा था, ताकि पारिवारिक विवाद सुलझ सके। लेकिन, मध्यस्थता विफल रही क्योंकि सुलह की कोई गुंजाइश नहीं बची थी।

IIT कानपुर की फॉरेंसिक रिपोर्ट ने क्या कहा?

  • याचिकाकर्ता ने अपने दावों को सच साबित करने के लिए कुछ डिजिटल सबूत (वीडियो और तस्वीरें) पेश किए थे। कोर्ट ने इनकी सत्यता जांचने के लिए IIT कानपुर के C3iHub (साइबर सुरक्षा केंद्र) को फॉरेंसिक जांच का जिम्मा सौंपा।
  • पहचान का मिलान नहीं: फॉरेंसिक रिपोर्ट में साफ कहा गया कि वीडियो में दिख रहे व्यक्तियों और याचिकाकर्ता के परिवार के सदस्यों के बीच कोई समानता नहीं है।
  • पुराना डेटा: रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि मीडिया फाइलें 10-12 साल पुरानी थीं और उन्हें गलत पहचान के साथ जोड़कर पेश किया गया था।

हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “खुद को समाज सुधारक न समझें”

  • अदालत ने याचिकाकर्ता के आचरण पर कड़ी नाराजगी जताई।
  • झूठ का पुलिंदा: बेंच ने कहा, “ये जंगली आरोप सरासर झूठ का पुलिंदा हैं।”
  • अनैतिक तरीका: कोर्ट ने टिप्पणी की कि पारिवारिक विवाद को अदालत के सामने रखने के लिए ‘सेक्स रैकेट’ जैसे आरोप लगाना सबसे घटिया तरीका है।
  • फर्जी नायक: कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता खुद को समाज की अनैतिकताओं के खिलाफ एक ‘योद्धा’ (Crusader) समझ रहा है, जबकि उसके पास कोई सबूत नहीं है।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुहाई कोर्ट का निष्कर्ष
आरोपों की प्रकृतिनिराधार, अपमानजनक और ‘स्कैंडलस’ (Scandalous)।
डिजिटल सबूतIIT कानपुर द्वारा फर्जी और भ्रामक पाए गए।
कोर्ट का रुखयाचिका खारिज; परिवार को बदनाम करने की कोशिश की निंदा।
नतीजायह पूरी तरह से एक घरेलू कलह का मामला है जिसे आपराधिक रंग देने की कोशिश की गई।

डिजिटल सबूतों का दुरुपयोग

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि किसी की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के लिए फर्जी डिजिटल सबूतों का इस्तेमाल भारी पड़ सकता है। कोर्ट ने वैज्ञानिक साक्ष्यों (Scientific Evidence) के आधार पर यह सुनिश्चित किया कि किसी निर्दोष परिवार को ‘सोशल स्टिग्मा’ (सामाजिक कलंक) का सामना न करना पड़े।

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