Tuesday, September 8, 2026
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Embryo Transfer: उम्र सीमा पार होने पर मां बनने की इजाजत…तकनीकी नियमों की आड़ में नहीं छीन सकते माता-पिता बनने का हक, यह केस पढ़िए

Embryo Transfer: दिल्ली हाई कोर्ट ने मातृत्व (Motherhood) और रीप्रोडक्टिव राइट्स (प्रजनन अधिकारों) को लेकर एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

कानून के नियमों को लकीर का फकीर बनकर लागू नहीं कर सकते

हाईकोर्ट के जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव की सिंगल बेंच ने साफ किया कि जब बात माता-पिता बनने और परिवार शुरू करने के संवैधानिक अधिकार की हो, तो कानून के नियमों को लकीर का फकीर (Pedantic/Technical) बनकर लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने 50 साल और दो महीने की एक महिला को उसके ही फ्रीज किए गए भ्रूण (Frozen/Cryopreserved Embryos) को वापस हासिल करने और आईवीएफ (IVF) प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी है।

असिस्टेंट रीप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) एक्ट का मकसद रुकावटें डालना नहीं: हाई कोर्ट

अदालत ने असिस्टेड रीप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (रेगुलेशन) एक्ट, 2021 की सीमाओं और मानवीय संवेदनाओं के बीच संतुलन बनाते हुए 25 मई को अपने फैसले में कहा, याचिकाकर्ताओं के रीप्रोडक्टिव राइट्स, उनकी प्राइवेसी और संतानोत्पत्ति का फैसला सीधे तौर पर उनके संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है। जब महिला के अंडे (Eggs) निकाले गए थे, तब वह कानूनन तय उम्र सीमा के भीतर थी। ART एक्ट का मकसद कानूनी रूप से शुरू किए गए इलाज की प्रक्रियाओं में ‘असाध्य दीवारें’ (Insurmountable Barriers) खड़ी करना नहीं है। महज कुछ महीने उम्र ज्यादा होने के आधार पर बचे हुए 5 भ्रूणों के इस्तेमाल से रोकना न्यायसंगत नहीं होगा।

क्या था पूरा मामला? (बेटे को खोने के बाद शुरू किया था सफर)

मामला: यह मामला एक ऐसे माता-पिता से जुड़ा है जिन्होंने मई 2025 में अपने जवान बेटे को खो दिया था। इस गहरे सदमे से उबरने और दोबारा माता-पिता बनने के लिए कपल ने एक निजी अस्पताल में आईवीएफ (IVF) ट्रीटमेंट शुरू किया।

कानूनी उम्र के भीतर इलाज: जब अस्पताल ने महिला के भ्रूण को फ्रीज (Cryopreserve) किया, तब महिला की उम्र 49 साल, 11 महीने और 14 दिन थी। यानी वह कानूनन तय 50 साल की उम्र सीमा के भीतर थी।

अस्पताल का इनकार: आईवीएफ का पहला प्रयास (Embryo Transfer) असफल रहा। इसके बाद जब कपल ने बचे हुए 5 भ्रूणों का इस्तेमाल करने को कहा, तो अस्पताल ने मना कर दिया। अस्पताल का तर्क था कि अब महिला की उम्र 50 साल और 2 महीने हो चुकी है, जो कि कानूनन तय अधिकतम उम्र सीमा को पार कर चुकी है। इसके बाद पीड़ित कपल ने हाई कोर्ट का रुख किया।

क्या कहता है ART एक्ट का नियम?

असिस्टेड रीप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) एक्ट के तहत भारत में आईवीएफ या अन्य सहायक तकनीकों के जरिए माता-पिता बनने की एक सख्त उम्र सीमा तय है, इसमें महिला के लिए 21 वर्ष से अधिक और 50 वर्ष से कम और पुरुष के लिए 21 वर्ष से अधिक और 55 वर्ष से कम।

हाई कोर्ट का रुख: नया भ्रूण नहीं बना रहे, पुराने का ही इस्तेमाल कर रहे हैं

जस्टिस कौरव ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता कोई नया भ्रूण (Fresh Embryos) बनाने या नए अंडे निकालने की अनुमति नहीं मांग रहे हैं। वे केवल उन भ्रूणों का इस्तेमाल करना चाहते हैं जो तब कानूनी रूप से सुरक्षित किए गए थे जब वे दोनों पूरी तरह पात्र थे। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई मेडिकल ओपिनियन (डॉक्टरों की राय) नहीं है जो यह साबित करे कि इस उम्र में बचे हुए फ्रीज भ्रूण का इस्तेमाल करने से महिला की जान को कोई तत्काल या असाधारण खतरा है। इसलिए, कोर्ट ने सभी आवश्यक चिकित्सा सुरक्षा उपायों (Medical Safeguards) के साथ कपल को फ्रोजन एम्ब्रियो ट्रांसफर (FET) प्रक्रिया पूरी करने की इजाजत दे दी।

विश्लेषण: आईवीएफ (IVF) कराने वालों के लिए इस फैसले के मायने

इम्पैक्ट एरियाहाई कोर्ट का स्टैंड और इसका असर
रीप्रोडक्टिव ऑटोनॉमी (Reproductive Autonomy)कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि खुद की संतान पैदा करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 (Right to Life) के तहत एक मौलिक अधिकार है, जिसे सरकारी नियमों की तकनीकी कमियों से दबाया नहीं जा सकता।
IVF सेंटर्स और अस्पतालों के लिए राहतइस फैसले के बाद अस्पतालों और डॉक्टरों को एक कानूनी स्पष्टता मिलेगी। अगर इलाज के दौरान मरीज की उम्र सीमा पार हो जाती है, तो वे पेंडिंग भ्रूणों के इस्तेमाल के लिए मरीजों को परेशान नहीं करेंगे।
मानवीय दृष्टिकोण को प्राथमिकताकोर्ट ने पीड़ित माता-पिता के मानसिक दर्द (बेटे को खोने का गम) को समझा। यह फैसला साबित करता है कि न्यायपालिका केवल कागजी नियमों पर नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं (Humanitarian Ground) पर भी चलती है।

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला उन अनगिनत जोड़ों के लिए एक बड़ी उम्मीद है जो बढ़ती उम्र और कानूनी पेचीदगियों के कारण माता-पिता बनने के सुख से वंचित हो जाते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कानून इंसान को जिंदगी देने और खुशियां बांटने के लिए बने हैं, उनके रास्ते में रोड़ा अटकाने के लिए नहीं।

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