Sunday, October 18, 2026
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Interlacing of Funds: केवल एक व्यावसायिक लेन-देन के आधार पर आयकर मामले को दूसरे शहर स्थानांतरित नहीं किया जा सकता; केस से जवाब जानें

हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और निर्देश

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│आयकर अधिनियम, 1961 - धारा 127 (केस ट्रांसफर) │
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│ विभाग की विफलता │ │ हाईकोर्ट का निर्देश │
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│ NML ग्रुप और याचिकाकर्ता के │ │ केस ट्रांसफर का आदेश रद्द। │
│ बीच फंडों के जुड़ाव/इंटर-│ │ दिल्ली अथॉरिटी जब्त सामग्री │
│ लेसिंग्स का कोई सबूत नहीं।│ │ कोलकाता AO को 4 हफ्ते में दे।│
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  1. “मस्तिष्क का उपयोग न करना व मनमाना निर्णय”:न्यायामूर्ति स्मिता दास दे ने अपने फैसले में कहा:“उत्तरदाता अधिकारी (आयकर विभाग) यह साबित करने में विफल रहे हैं कि याचिकाकर्ता और NML ग्रुप के बीच फंडों के परस्पर जुड़ाव (Interlacing of Funds) या व्यावसायिक गतिविधियों का कोई संबंध था। अधिकारियों द्वारा लिया गया ऐसा निर्णय टिकाऊ नहीं है, क्योंकि यह मनमाने ढंग से, अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर और बिना उचित विचार-विमर्श (Without Application of Mind) के लिया गया है, इसलिए इसे रद्द किया जाता है।”
  2. अदालत द्वारा जारी प्रक्रियात्मक निर्देश:
    • सामग्री का हस्तांतरण: दिल्ली स्थित आयकर प्राधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे छापेमारी के दौरान जब्त सभी संबंधित साक्ष्य, सामग्री और जांच रिपोर्ट 4 सप्ताह के भीतर कोलकाता के निर्धारण अधिकारी (Assessing Officer) को भेजें।
    • कोलकाता AO की स्वतंत्रता: कोलकाता का अधिकारी कानून के अनुसार इस लेनदेन की स्वतंत्र रूप से जांच करने के लिए स्वतंत्र होगा।
    • वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) की सुविधा: याचिकाकर्ता को जांच में सहयोग करने और दिल्ली अधिकारियों के समक्ष आवश्यकता पड़ने पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के माध्यम से पेश होने का निर्देश दिया गया। कोर्ट ने आदेश दिया कि दिल्ली में भौतिक रूप से उपस्थित न होने के लिए याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए।

कोलकाता: आयकर अधिनियम, 1961 (Income Tax Act, 1961) की धारा 127 (कर निर्धारण मामलों के स्थानांतरण की केंद्रीय शक्ति – Transfer of Cases), समन्वित जांच (Coordinated Investigation) के नाम पर क्षेत्राधिकार का मनमाना हस्तांतरण, करदाता और तलाशी समूह के बीच वित्तीय अंतर्संबंध (Interconnection of Business Activities & Interlacing of Funds) का विधिक परीक्षण, प्रशासनिक आदेशों में ‘विवेक का समुचित प्रयोग’ (Application of Mind), तथा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के माध्यम से जांच में सहयोग के आधुनिक विधिक तंत्र पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं मार्गदर्शक फैसला सुनाया है।

न्यायमूर्ति स्मिता दास दे की एकल पीठ ने 13 अक्टूबर 2026 को दिए अपने आदेश में कोलकाता के करदाता लोकनाथ प्रसाद गुप्ता द्वारा दायर रिट याचिका को स्वीकार करते हुए उनके आयकर निर्धारण मामले को कोलकाता से नई दिल्ली स्थानांतरित करने के आदेश को पूरी तरह निरस्त (Quashed and Set Aside) कर दिया। आयकर विभाग ने यह दावा करते हुए केस दिल्ली स्थानांतरित किया था कि गुप्ता का दिसंबर 2023 में तलाशी की जद में आए एनएमएल ग्रुप (NML Group) के साथ कथित लिंक है और संदेहास्पद समायोजन प्रविष्टियों (Accommodation Entries) की समन्वित जांच के लिए केस ट्रांसफर आवश्यक है।

उच्च न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी कि केवल एक पृथक व्यावसायिक लेन-देन (जो बैंकिंग माध्यम से होकर उसी वित्तीय वर्ष में वापस भी हो गया था) किसी करदाता के मामले को दूसरे शहर में स्थानांतरित करने का विधिक औचित्य नहीं बन सकता। अदालत ने दिल्ली प्राधिकारियों को सभी साक्ष्य 4 सप्ताह में कोलकाता के निर्धारण अधिकारी को भेजने और गुप्ता को दिल्ली जाने के बजाय केवल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जांच में शामिल होने की छूट प्रदान की।

उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक व्यवस्था

1. ‘धन के अंतर्गुंफन और व्यावसायिक अंतर्संबंध का कोई ठोस साक्ष्य नहीं; आदेश क्षेत्राधिकार से परे’

न्यायमूर्ति स्मिता दास दे ने धारा 127 के तहत जारी स्थानांतरण आदेश की विधिक वैधता का परीक्षण करते हुए दर्ज किया: “प्रतिवादी प्राधिकारी आपत्तिजनक सामग्रियों से यह प्रदर्शित करने में पूरी तरह असमर्थ रहे हैं कि क्या करदाता की व्यावसायिक गतिविधियों और एनएमएल ग्रुप (जिसके परिसरों पर तलाशी की गई थी) के बीच कोई व्यावसायिक अंतर्संबंध (Interconnection of business activities) या धन का कोई अंतर्गुंफन (Interlacing of funds) मौजूद था। प्रतिवादी प्राधिकारियों द्वारा लिया गया ऐसा निर्णय विधिक रूप से टिकने योग्य नहीं है, क्योंकि यह मनमाने ढंग से, अधिकारिता से परे जाकर (In excess of jurisdiction) और बिना विवेक के समुचित प्रयोग (Without proper application of mind) के लिया गया है, अतः इसे निरस्त और अपास्त किया जाता है।”

2. ‘संदेहास्पद कर चोरी की जांच का अधिकार निर्विवाद, किंतु स्थानांतरण का औचित्य साबित करना अनिवार्य’:

  • अदालत ने स्वीकार किया कि आयकर विभाग के पास कर चोरी की जांच करने और साक्ष्य जुटाने का पूर्ण सांविधिक अधिकार है।
  • किंतु, पीठ ने स्पष्ट किया कि जांच के अधिकार का अर्थ यह नहीं है कि किसी भी करदाता का मामला मनमाने ढंग से दूसरे राज्य में भेज दिया जाए:“विभाग के पास जांच करने का अधिकार अवश्य है, किंतु स्थानांतरण आदेश में ऐसा कोई लिंक स्थापित नहीं किया गया जो गुप्ता के संपूर्ण कर निर्धारण को दिल्ली स्थानांतरित करने का औचित्य सिद्ध कर सके।”

3. दस्तावेजों को कोलकाता ट्रांसफर करने और वीसी (Video Conferencing) का निर्देश:

  • प्रशासनिक सुविधा और करदाता के उत्पीड़न को रोकने के बीच संतुलन बनाते हुए अदालत ने निर्देश दिया:
    1. दिल्ली के आयकर प्राधिकारी 4 सप्ताह के भीतर मामले से संबंधित सभी प्रासंगिक साक्ष्य, जब्त सामग्री और जांच रिपोर्ट कोलकाता के क्षेत्राधिकार वाले निर्धारण अधिकारी (AO) को प्रेषित करेंगे।
    2. कोलकाता के निर्धारण अधिकारी इस लेन-देन की स्वतंत्र रूप से जांच करने और कानून के अनुसार उचित कदम उठाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होंगे।
    3. याचिकाकर्ता दिल्ली प्राधिकारियों के साथ जांच में पूरा सहयोग करेगा, किंतु उसे भौतिक रूप से दिल्ली उपस्थित होने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा; वह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के माध्यम से पेश होगा।
    4. अंतरिम अवधि के दौरान दिल्ली में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित न होने के लिए गुप्ता के खिलाफ कोई भी दंडात्मक या उत्पीड़नकारी कार्रवाई (No Coercive Action) नहीं की जाएगी।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विधिक घटनाक्रम

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│ लोकनाथ प्रसाद गुप्ता आयकर स्थानांतरण विवाद: कालक्रम│
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【नवंबर 2022: ₹2.82 करोड़ का अग्रिम】 【दिसंबर 2023: NML ग्रुप पर सर्च】 【अक्टूबर 2026: हाईकोर्ट का निर्णय】
• गुप्ता ने GMZ कमोडिटीज को बैंकिंग • आयकर विभाग ने NML ग्रुप पर तलाशी ली; • कोर्ट ने स्थानांतरण आदेश रद्द किया;
चैनल से ₹2.82 करोड़ का व्यापारिक अग्रिम दावा किया कि गुप्ता का लेन-देन इस कहा: एकल बैंकिंग लेन-देन केस ट्रांसफर
दिया; सौदा रद्द होने पर राशि उसी वर्ष वापस। ग्रुप की 'अकोमोडेशन एंट्री' से जुड़ा है। का आधार नहीं बन सकता।
│ • दिल्ली से रिकॉर्ड कोलकाता भेजने का आदेश।
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【धारा 127 के तहत केस दिल्ली ट्रांसफर का आदेश】 【करदाता का कोलकाता में स्थापित रिकॉर्ड】
• समन्वित जांच (Coordinated Investigation) की • करदाता वर्षों से कोलकाता में असेस्ड है;
दलील देकर असेसमेंट दिल्ली भेजा गया। सारे खाते, सीए और कानूनी सलाहकार वहीं हैं।
चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं दोनों पक्षों की दलीलें
मूल व्यावसायिक लेन-देननवंबर 2022 में लोकनाथ प्रसाद गुप्ता ने GMZ कमोडिटीज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को ₹2.82 करोड़ का व्यावसायिक अग्रिम (Business Advance) दिया था। यह लेन-देन पूरी तरह बैंकिंग चैनलों (RTGS/Cheque) के माध्यम से हुआ था। जब प्रस्तावित व्यापारिक सौदा अमल में नहीं आया, तो पूरी राशि उसी वित्तीय वर्ष के भीतर करदाता के खाते में वापस आ गई।
आयकर विभाग का आधारदिसंबर 2023 में आयकर विभाग ने एनएमएल ग्रुप (NML Group) के परिसरों पर तलाशी (Search under Section 132) की थी। विभाग का आरोप था कि GMZ कमोडिटीज से हुआ यह लेन-देन NML ग्रुप से जुड़ा है और यह संदेहास्पद ‘अकोमोडेशन एंट्री’ का हिस्सा हो सकता है; अतः समन्वित जांच हेतु केस को दिल्ली सेंट्रल सर्किल में स्थानांतरित करना आवश्यक है।
करदाता के आक्षेपगुप्ता ने तर्क दिया कि वे दशकों से कोलकाता में कर निर्धारण कराते आ रहे हैं। उनके सभी मूल बहीखाते, चार्टर्ड एकाउंटेंट और विधिक सलाहकार कोलकाता में हैं। NML ग्रुप के साथ इस एकल विफल लेन-देन के अलावा उनका कोई व्यापक व्यावसायिक, पारिवारिक या शेयरहोल्डिंग संबंध नहीं है।
हाईकोर्ट का निष्कर्षएकल लेन-देन से ‘व्यावसायिक अंतर्संबंध’ सिद्ध नहीं होता। आदेश रद्द; निर्धारण कोलकाता में ही बना रहेगा।

विधिक एवं सांविधिक विश्लेषण: आयकर अधिनियम की धारा 127 की विधिक सीमाएं

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│ धारा 127: क्षेत्राधिकार स्थानांतरण की वैधानिक कसौटी │
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【विवेक का प्रयोग (Application of Mind)】 【तार्किक नेक्सस (Rational Nexus)】 【करदाता की कठिनाई बनाम राजस्व हित】
• केवल 'समन्वित जांच' लिखना पर्याप्त नहीं; • तलाशी वाले समूह और करदाता के बीच • नियमित करदाता को बिना ठोस साक्ष्य के
आदेश में ठोस कारण दर्ज होने चाहिए। फंड्स का सिंडिकेट या इंटरलॉकिंग सिद्ध हो। दूरस्थ शहर में घसीटना उत्पीड़न माना जाता है।
  • ‘समन्वित जांच’ (Coordinated Investigation) का मंत्र स्वतः पर्याप्त नहीं:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने अजंता इंडस्ट्रीज बनाम सीबीडीटी [(1976) 102 ITR 226 (SC)] के ऐतिहासिक संविधान पीठ फैसले में स्थापित किया है कि धारा 127 के तहत केस ट्रांसफर करने का आदेश एक अर्ध-न्यायिक आदेश (Quasi-Judicial Order) है, जिसमें कारणों का अभिलिखित होना (Recording of Reasons) अनिवार्य शर्त है।
    • केवल एक स्टीरियोटाइप वाक्यांश जैसे “प्रभावी और समन्वित जांच के लिए” लिख देने से आदेश वैध नहीं हो जाता, जब तक कि करदाता के कारोबार और तलाशी समूह के बीच कोई सीधा सांठगांठ (Nexus) रिकॉर्ड पर न दिखाया जाए।
  • ‘धन का अंतर्गुंफन’ (Interlacing of Funds) का विधिक सिद्धांत:
    • धारा 127 के तहत किसी तीसरे पक्ष को मुख्य सर्च ग्रुप के साथ अटैच करने के लिए कानून यह अपेक्षा करता है कि दोनों के बीच धन का चक्राकार प्रवाह (Round-tripping), बेनामी होल्डिंग्स, या साझा प्रबंधन साबित हो।
    • यदि कोई व्यापारी नियमित व्यापार के तहत किसी कंपनी को अग्रिम देता है और वह राशि बैंकिंग चैनल से वापस आ जाती है, तो इसे ‘इंटरलॉसिंग ऑफ फंड्स’ नहीं कहा जा सकता।
  • डिजिटल युग में Faceless Assessment और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग:
    • वित्त अधिनियम 2020 के बाद आयकर व्यवस्था ‘फेसलेस’ हो चुकी है। भौतिक रूप से फाइलों को एक शहर से दूसरे शहर ले जाने की आवश्यकता तभी होती है जब भारी मात्रा में भौतिक नकदी या बेनामी संपत्तियां एक ही सिंडिकेट द्वारा नियंत्रित हों।
    • उच्च न्यायालय का वीसी के माध्यम से जांच में शामिल होने का निर्देश आधुनिक प्रक्रियात्मक न्याय के अनुकूल है, जिससे करदाता को अनावश्यक यात्रा और वित्तीय उत्पीड़न से बचाया जा सके।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: लोकनाथ प्रसाद गुप्ता बनाम आयकर प्राधिकारी व अन्य [रिट याचिका (WPA) – कलकत्ता उच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति स्मिता दास दे (एकल पीठ)
  • निर्णय की तिथि: 13 अक्टूबर 2026
  • संबद्ध विषय: आयकर अधिनियम की धारा 127 के तहत कर निर्धारण केस का कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरण

विधिक पक्षकार:

  • याचिकाकर्ता: लोकनाथ प्रसाद गुप्ता (कोलकाता आधारित करदाता)
  • प्रतिवादी: प्रधान आयकर आयुक्त / आयकर जांच शाखा (कोलकाता एवं नई दिल्ली)
  • प्रासंगिक कानून एवं सांविधिक प्रावधान:
    • आयकर अधिनियम, 1961 — धारा 127 (केसों का स्थानांतरण), धारा 132 (सर्च एवं जब्ती), धारा 143(3) (नियमित कर निर्धारण) एवं धारा 147/148
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 226 (मनमाने प्रशासनिक आदेशों के विरुद्ध रिट क्षेत्राधिकार)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • स्थानांतरण आदेश की वैधता की कसौटी: ‘तलाशी की जद में आए समूह से केवल एक बैंकिंग व्यावसायिक अग्रिम का लेन-देन होना किसी करदाता के पूरे केस को दूसरे शहर स्थानांतरित करने का विधिक आधार नहीं बन सकता; धारा 127 का प्रयोग मनमाने ढंग से या बिना ठोस अंतर्संबंध के नहीं किया जा सकता।’
  • अंतिम परिणाम: स्थानांतरण आदेश पूरी तरह रद्द; कर निर्धारण मामला कोलकाता के मूल निर्धारण अधिकारी के पास ही रहेगा; दिल्ली प्राधिकारियों को 4 सप्ताह में सामग्री कोलकाता भेजने का निर्देश; करदाता को केवल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जांच में उपस्थित होने की अनुमति और अंतरिम अवधि में किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से पूर्ण सुरक्षा।

Interlacing of Funds:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकलकत्ता उच्च न्यायालय (Calcutta High Court)
न्यायाधीशन्यायमूर्ति स्मिता दास दे
याचिकाकर्तालोकनाथ प्रसाद गुप्ता (कोलकाता के करदाता)
संबंधित कानूनआयकर अधिनियम, 1961 की धारा 127 (Power to Transfer Cases)
विवादित लेनदेन₹2.82 करोड़ का एडवांस, जो बैंकिंग चैनलों के माध्यम से दिया गया और उसी वित्तीय वर्ष में वापस आ गया।
मुख्य कानूनी सिद्धांत1. फंड्स के परस्पर जुड़ाव या व्यावसायिक गतिविधियों के ठोस साक्ष्य के बिना धारा 127 के तहत केस ट्रांसफर मनमाना और अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
2. करदाता को भौतिक रूप से बुलाने के बजाय वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के माध्यम से जांच में शामिल किया जा सकता है।
अदालत का अंतिम आदेशकेस ट्रांसफर का आदेश रद्द; केस कोलकाता के निर्धारण अधिकारी (Assessing Officer) के पास ही रहेगा। दिल्ली अथॉरिटी साक्ष्य कोलकाता भेजेगी।
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