MOB LYNCHING: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा, मॉब लिंचिंग या भीड़ हिंसा की हर घटना अलग होती है और इन पर जनहित याचिका (PIL) के जरिए निगरानी नहीं की जा सकती।
मॉब लिंचिंग रोकने के लिए दिए निर्देशों के पालन की मांग की
कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले राज्य और केंद्र सरकारों पर बाध्यकारी हैं, इसलिए पीड़ित पक्ष को पहले सरकार से संपर्क करना चाहिए, न कि सीधे कोर्ट आना चाहिए। यह टिप्पणी हाईकोर्ट की जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस अवनीश सक्सेना की बेंच ने जमीयत उलेमा-ए-हिंद की ओर से दायर एक PIL पर सुनवाई करते हुए की। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले (तहसीन पूनावाला बनाम भारत सरकार) में मॉब लिंचिंग रोकने के लिए दिए गए दिशा-निर्देशों के पालन की मांग की गई थी।
अलीगढ़ की घटना का हवाला देकर SIT की मांग
PIL में उत्तर प्रदेश में हुई कुछ मॉब लिंचिंग की घटनाओं का जिक्र किया गया था, जिनमें मई में अलीगढ़ में हुई घटना भी शामिल थी। याचिकाकर्ता ने अलीगढ़ की घटना की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) गठित करने की मांग की थी, जिसकी अगुवाई इंस्पेक्टर जनरल रैंक का अधिकारी करे। साथ ही, हर जिले में मॉब लिंचिंग से निपटने के लिए नोडल अफसर नियुक्त करने संबंधी सर्कुलर और नोटिफिकेशन की जानकारी और इन मामलों की स्थिति रिपोर्ट भी मांगी गई थी।
राज्य सरकार ने याचिका की वैधता पर सवाल उठाया
राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने PIL की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसमें व्यक्तिगत घटनाओं की निगरानी की मांग की गई है, जो जनहित याचिका के दायरे में नहीं आती। 15 जुलाई को दिए फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि याचिका में मांगी गई राहतें सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप जरूर हैं, लेकिन हर घटना पर निगरानी के लिए PIL का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रभावित पक्षों को पहले सरकार से संपर्क करने की स्वतंत्रता है।

