Judicial Entry: कर्नाटक हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने न्यायिक सेवा में एंट्री के लिए वकालत के जमीनी अनुभव (Bar Practice) को अनिवार्य बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है।
रजिस्ट्रार जनरल द्वारा दायर अपील पर सुनवाई
हाईकोर्ट के जस्टिस सचिन शंकर मगादुम और जस्टिस राजेश राय के. की अवकाश पीठ (Vacation Bench) ने हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा दायर अपील पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम आदेश पारित किया। हाई कोर्ट ने सिंगल-जज के उस पुराने आदेश पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी है, जिसमें अदालत के ही स्टाफ (Judicial/Court Staff) को बिना आवश्यक वकालत अनुभव के भी सिविल जज (Civil Judge – Junior Division) की भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने की अनुमति दी गई थी।
क्या है नया नियम और पूरा विवाद? (The 2026 Amendment)
- इस पूरे विवाद की जड़ में भर्ती नियमों में किया गया एक हालिया बदलाव है।
- नया संशोधन (Rules 2025): 12 मार्च 2026 को ‘कर्नाटक न्यायिक सेवा भर्ती (संशोधन) नियम 2025’ को अधिसूचित (Notify) किया गया था। इस नए संशोधन के तहत सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद पर सीधी भर्ती के लिए कम से कम 3 साल की निरंतर वकालत (Continuous Bar Practice) को एक अनिवार्य योग्यता (Essential Eligibility) बना दिया गया है।
- सुप्रीम कोर्ट का निर्देश: यह संशोधन सुप्रीम कोर्ट के ‘ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया 2025’ मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों के अनुपालन में लाया गया है।
- स्टाफ को झटका: नए नियमों में इन-सर्विस अदालती कर्मचारियों (हाई कोर्ट या जिला न्यायपालिका के स्टाफ) को इस 3 साल के अनुभव से कोई छूट नहीं दी गई है। केवल ‘लॉ क्लर्क’ और ‘रिसर्च असिस्टेंट्स’ को ही एक सीमित अपवाद (Exception) के तहत राहत दी गई है।
सिंगल-जज के आदेश पर डिवीजन बेंच ने क्यों लगाई रोक?
योगेश बी. और 15 अन्य अदालती कर्मचारियों ने नए नियमों की वैधता को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी। 29 अप्रैल 2026 को एक सिंगल-जज बेंच ने अंतरिम व्यवस्था के तौर पर इन कर्मचारियों को आवेदन करने और प्रारंभिक (Prelims), मुख्य परीक्षा (Mains) व वाइवा (Viva) में बैठने की अनुमति दे दी थी।
डिवीजन बेंच ने इस अनुमति पर रोक लगाते हुए तर्क दिए
- सचेत विधायी निर्णय (Conscious Legislative Response): कोर्ट ने प्रथम दृष्टया (Prima facie) पाया कि नियम 4 में किया गया संशोधन सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत सोच-समझकर किया गया है, ताकि न्यायिक सेवा में आने वाले लोगों के पास कोर्ट रूम का व्यावहारिक अनुभव हो।
- नियमों में कोई छूट नहीं: संशोधित ढांचा (Amended Framework) वर्तमान में काम कर रहे अदालती कर्मचारियों के लिए किसी अपवाद की अनुमति नहीं देता है।
- भर्ती प्रक्रिया पर असर: जो उम्मीदवार संशोधित योग्यता मानदंडों को पूरा नहीं करते हैं, उन्हें परीक्षा में बैठने की अनुमति देने से पूरी चल रही भर्ती प्रक्रिया पर सीधा और विपरीत असर पड़ेगा। ‘संतुलन का पलड़ा’ (Balance of Convenience) इसी पक्ष में है कि भर्ती पूरी तरह से नए संशोधित नियमों के अनुसार ही हो।
दोनों पक्षों की कानूनी दलीलें (The Legal Arguments)
- हाई कोर्ट प्रशासन (रजिस्ट्रार जनरल) का पक्ष: हाई कोर्ट की तरफ से पेश सीनियर एडवोकेट प्रभुलिंग के. नवदगी और एडवोकेट कृतिका राघवन ने दलील दी कि जब वैधानिक नियम (Statutory Rules) सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत बदले जा चुके हैं, तो अयोग्य उम्मीदवारों को अंतरिम राहत देकर परीक्षा में शामिल होने की अनुमति देना कानूनी रूप से सही नहीं था।
- याचिकाकर्ता (अदालती कर्मचारी) का पक्ष: कर्मचारियों के वकीलों ने तर्क दिया कि यदि आवेदन की अंतिम तारीख निकल गई और बाद में कोर्ट ने उनके पक्ष में अंतिम फैसला सुनाया, तो उनका भारी नुकसान (Severe Prejudice) हो जाएगा। इसलिए उन्हें परीक्षा में बैठने दिया जाना चाहिए। उन्होंने इस रोक को हटाने की मांग की थी।
- हाई कोर्ट का अंतिम रुख: डिवीजन बेंच ने कर्मचारियों को कोई राहत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि चूंकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक समीक्षा याचिका (Review Petition) भी लंबित है, इसलिए जब तक देश की शीर्ष अदालत इस मुद्दे पर और अधिक स्पष्टता (Clarity) नहीं देती, तब तक हाई कोर्ट के लिए अपने इस स्टे ऑर्डर को हटाना या बदलना उचित नहीं होगा। कोर्ट ने कर्मचारियों को सुप्रीम कोर्ट से स्पष्टता मांगने की स्वतंत्रता (Liberty) दी है।
फैसले का मुख्य सारांश (Key Takeaways)
| मुख्य बिंदु | कर्नाटक हाई कोर्ट की वर्तमान स्थिति |
| अनिवार्य योग्यता | सिविल जज बनने के लिए 3 साल का वकालत अनुभव अनिवार्य है। |
| अदालती स्टाफ की स्थिति | इन-सर्विस स्टाफ को परीक्षा में बैठने से रोक दिया गया है (जब तक सुप्रीम कोर्ट से राहत न मिले)। |
| संशोधन की स्थिति | भर्ती पूरी तरह से मार्च 2026 में अधिसूचित नए नियमों के आधार पर ही आगे बढ़ेगी। |
निष्कर्ष (Analysis Summary)
यह फैसला भारतीय न्यायपालिका में निचले स्तर पर जजों की गुणवत्ता और उनके व्यावहारिक अनुभव को सुधारने की दिशा में चल रहे प्रयासों को मजबूत करता है। सुप्रीम कोर्ट और अब कर्नाटक हाई कोर्ट का स्पष्ट मानना है कि सिर्फ थ्योरी या अदालती फाइलों को संभालने का प्रशासनिक अनुभव (Court Staff Experience) काफी नहीं है; एक जज की कुर्सी पर बैठने से पहले बार (Bar) में वकीलों के रूप में जिरह करने का व्यावहारिक अनुभव होना बेहद जरूरी है।

