Tuesday, September 8, 2026
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Judicial Safety: दिल्ली में जज को जान से मारने की धमकी मिल रही…तो आम लोगों का क्या, SC ने क्या कहा, जानिए

Judicial Safety: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के एक सेवारत न्यायिक अधिकारी (Judicial Officer) की सुरक्षा को लेकर एक बड़ा और संवेदनशील आदेश जारी किया है।

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने दिल्ली पुलिस और गुजरात पुलिस को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि याचिकाकर्ता जज और उनके परिवार को तत्काल पुख्ता सुरक्षा प्रदान की जाए। यह मामला किसी आम नागरिक का नहीं, बल्कि खुद न्याय प्रणाली का हिस्सा रहे एक जज का है, जिन्हें बचपन में अगवा किया गया था और अब वही अपराधी उन्हें धमकियां दे रहे हैं।

मामला: 2008 का अपहरण और वर्तमान खतरा

  • अतीत: याचिकाकर्ता जज को साल 2008 में तब अगवा किया गया था जब वे नाबालिग थे।
  • दोषी: इस मामले में शामिल अपराधियों को उम्रकैद की सजा हुई थी।
  • ताजा स्थिति: अब वही दोषी और उनके सहयोगी जेल से बाहर आने की कोशिश कर रहे हैं और जज को धमकियां दे रहे हैं। ये अपराधी कई अन्य गंभीर मामलों में भी शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्देश

  • अदालत ने सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई राज्यों की पुलिस और जेल प्रशासन को निर्देश दिए।
  • दिल्ली पुलिस: याचिकाकर्ता जज (जो दिल्ली में तैनात हैं) की सुरक्षा का आकलन करें और उन्हें पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराएं।
  • गुजरात पुलिस: याचिकाकर्ता के भाई, जो गुजरात में न्यायिक अधिकारी हैं, उनकी सुरक्षा का भी जायजा लें और उन्हें सुरक्षा दें।
  • हरियाणा प्रशासन: जज का परिवार कुरुक्षेत्र (हरियाणा) में रहता है। कोर्ट ने वहां के अधिकारियों को परिवार की सुरक्षा की व्यक्तिगत जिम्मेदारी सौंपी है।

पैरोल और रिहाई पर ‘बैन’

  • सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों को मिल सकने वाली राहत पर भी नकेल कस दी है।
  • बिना अनुमति रिहाई नहीं: दोषियों को तब तक पैरोल (Parole) या सजा माफी (Remission) नहीं दी जाएगी जब तक संबंधित हाई कोर्ट इसकी अनुमति न दे।
  • दो हफ्ते का ‘बफर’: यदि पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट उन्हें कोई राहत देता भी है, तो वह आदेश दो सप्ताह तक प्रभावी नहीं होगा, ताकि जज (याचिकाकर्ता) ऊपरी अदालत में अपील कर सकें।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
याचिकाकर्तादिल्ली में तैनात एक सेवारत जज।
प्रतिवादीदिल्ली, गुजरात और हरियाणा पुलिस/प्रशासन।
कोर्ट का रुखअपराधियों के पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए सुरक्षा देना “अत्यंत आवश्यक” है।
पिछला आदेशदिसंबर 2025 में भी SC ने दोषियों की रिहाई पर रोक लगाई थी।

जब ‘न्याय’ देने वाला ही असुरक्षित हो

यह मामला बेहद गंभीर है क्योंकि यह सीधे तौर पर न्यायपालिका के मनोबल से जुड़ा है। यदि कानून की रक्षा करने वाले जज ही अपराधियों के खौफ में जिएंगे, तो निष्पक्ष न्याय संभव नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश के जरिए स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने अधिकारियों की गरिमा और जान की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।

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