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Justice for Silenced Voice: मूक-बधिर होने से गवाही कमजोर नहीं होती…Plastic Doll से इस केस में गवाही को माना वैध, पढ़ें पूरा मामला

Justice for Silenced Voice: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दुष्कर्म के एक मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को बरकरार रखा है।

हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने आरोपी की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने पीड़िता के मूक-बधिर होने के कारण उसकी गवाही पर सवाल उठाए थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि मूक-बधिर (Deaf & Mute) पीड़िता की गवाही विश्वसनीय है और संकेतों के माध्यम से स्पष्ट है, तो यह दोषसिद्धि (Conviction) का एकमात्र आधार बन सकती है।

गवाही का अनोखा तरीका (Demonstrative Technique)

  • ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) ने पीड़िता की बात को पूरी स्पष्टता से समझने के लिए संवेदनशीलता दिखाई।
  • प्लास्टिक गुड़िया का उपयोग: कोर्ट ने पीड़िता को एक प्लास्टिक की गुड़िया (Plastic Doll) दी, जिसके माध्यम से उसने शारीरिक हमले की प्रकृति और घटनाक्रम को प्रदर्शित किया।
  • ट्रेन्ड इंटरप्रेटर (Interpreter): पीड़िता के संकेतों को समझने के लिए एक प्रशिक्षित दुभाषिया (पद्मा जगत) की मदद ली गई, जिन्होंने पीड़िता के इशारों का कानूनी अनुवाद किया।
  • अदालत की संतुष्टि: गवाही दर्ज करने से पहले, जज ने खुद को संतुष्ट किया कि पीड़िता सवाल समझ रही है और सही प्रतिक्रिया दे रही है।

“इशारे भी मौखिक साक्ष्य हैं” (Signs as Substantive Evidence)

  • कानूनी मान्यता: भारतीय साक्ष्य अधिनियम (अब BNS) के तहत, जो गवाह बोल नहीं सकता, वह खुले कोर्ट में संकेतों या इशारों के माध्यम से गवाही दे सकता है। इसे ‘मौखिक साक्ष्य’ (Oral Evidence) ही माना जाता है।
  • सक्षमता: केवल मूक-बधिर होना किसी को ‘अयोग्य गवाह’ नहीं बनाता। पीड़िता आरोपी को पहचानने, घटना का क्रम बताने और इशारों से पूरी बात समझाने में पूरी तरह सक्षम पाई गई।

वैज्ञानिक और अन्य सबूतों से पुष्टि (Corroboration)

  • अदालत ने पाया कि पीड़िता की गवाही केवल इशारों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसे अन्य साक्ष्यों से भी बल मिला।
  • फोरेंसिक रिपोर्ट (FSL): मेडिकल जांच में पीड़िता की स्लाइड्स और आरोपी के कपड़ों पर शुक्राणु (Seminal stains) पाए गए, जो अपराध की पुष्टि करते थे।
  • तत्काल खुलासा: माता-पिता के घर लौटते ही पीड़िता ने तुरंत इशारों से आरोपी (जो उनका रिश्तेदार था) की पहचान की और घटना की जानकारी दी।
  • आरोपी की चुप्पी: धारा 313 (CrPC/BNSS) के तहत बयान दर्ज कराते समय आरोपी इन गंभीर सबूतों का कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं दे पाया।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

विषयअदालत का निष्कर्ष
पीड़िता की स्थितिजन्म से मूक और बधिर, लेकिन मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ।
अदालत का दृष्टिकोणट्रायल कोर्ट ने ‘अत्यधिक सावधानी और संवेदनशीलता’ बरती।
बचाव पक्ष का तर्क“पीड़िता गवाही देने के योग्य नहीं है” – इस तर्क को कोर्ट ने खारिज कर दिया।
नतीजाअपील खारिज; आरोपी की जेल की सजा बरकरार।

निष्कर्ष: न्याय के लिए भाषा की बाधा नहीं

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का यह फैसला यह सुनिश्चित करता है कि शारीरिक अक्षमता न्याय के आड़े नहीं आनी चाहिए। ‘प्लास्टिक गुड़िया’ और ‘इंटरप्रेटर’ का उपयोग यह दर्शाता है कि आधुनिक न्यायपालिका सत्य तक पहुँचने के लिए केवल पारंपरिक तरीकों पर निर्भर नहीं है। यह उन लोगों के लिए एक बड़ा सहारा है जो बोल या सुन नहीं सकते, लेकिन न्याय के हकदार हैं।

HIGH COURT OF CHHATTISGARH AT BILASPUR
Hon’ble Shri Justice Ramesh Sinha, Chief Justice
Hon’ble Shri Justice Ravindra Kumar Agrawal , Judge
CRA No. 786 of 2023
Neelam Kumar Deshmukh S/o Shailendra Deshmukh
versus
State Of Chhattisgarh Through Police Station Arjunda, District : Balod,
Chhattisgarh

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