हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क
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│ दिल्ली जेल नियम 2018 - नियम 1208 (viii) │
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│SLP हेतु पैरोल अधिकार │ │ पसंद का वकील चुनने का │
│ │ │ अधिकार │
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│ हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम │ │ लीगल एड की मौजूदगी के आधार │
│ कोर्ट में चुनौती देने के लिए│ │ पर निजी वकील चुनने का अधिकार│
│ पैरोल मिलना वैधानिक अधिकार।│ │ छीना नहीं जा सकता। │
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1. “पसंद के वकील से परामर्श कैदी का मूल्यवान अधिकार”:
न्यायामूर्ति मिनी पुष्कर्णा ने सरकार के तर्क को खारिज करते हुए कहा: “केवल इसलिए कि कानूनी सहायता वकील उपलब्ध है, याचिकाकर्ता को इस न्यायालय के उस फैसले को चुनौती देने के लिए कोई वकील नियुक्त करने के मूल्यवान अधिकार से वंचित करने का कोई आधार नहीं है, जिसने उसकी सजा को बरकरार रखा है।”
2. दिल्ली जेल नियम, 2018 का संदर्भ:
- कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि दिल्ली जेल नियम, 2018 के नियम 1208 (viii) के तहत, यदि किसी कैदी की सजा को उच्च न्यायालय द्वारा बरकरार रखा गया है, तो उसे सुप्रीम कोर्ट में SLP दायर करने के उद्देश्य से पैरोल पाने का स्पष्ट अधिकार है।
3. पूर्व न्यायिक मिसालों (Bijender v. State of NCT of Delhi) पर निर्भरता:
- हाईकोर्ट ने अपने ही पूर्व फैसले का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना एक संवैधानिक/कानूनी अधिकार है। कैदी को अपनी पसंद के वकील के माध्यम से केस तैयार करने और वित्तीय संसाधन जुटाने का पूरा अवसर मिलना चाहिए, और इसे केवल इस आधार पर मना नहीं किया जा सकता कि याचिका जेल से भी भेजी जा सकती थी।
नई दिल्ली: दिल्ली कारागार नियमावली, 2018 (Delhi Prison Rules, 2018) के नियम 1208(viii) (हाईकोर्ट द्वारा दोषसिद्धि की पुष्टि के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका / SLP दायर करने हेतु कैदी को पैरोल का अधिकार), भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और निष्पक्ष विधिक उपचार का अधिकार), अनुच्छेद 22(1) (अपनी पसंद के विधिक व्यवसायी से परामर्श और बचाव का मौलिक अधिकार), तथा जेल में उपलब्ध ‘मुफ्त कानूनी सहायता’ (Free Legal Aid under Article 39A) बनाम ‘अपनी पसंद के निजी वकील’ (Counsel of Choice) के बीच विधिक संतुलन पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं मानवीय विधिक व्यवस्था दी है।
न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा की एकल पीठ ने दिल्ली सरकार (गृह विभाग/जेल प्रशासन) द्वारा एक सजायाफ्ता कैदी की पैरोल अर्जी खारिज करने के प्रशासनिक आदेश को रद्द करते हुए दोषी महेंद्र राठौड़ को रिहाई की तारीख से 30 दिनों की पैरोल प्रदान की। दिल्ली सरकार ने यह तर्क देते हुए पैरोल खारिज कर दी थी कि चूंकि कैदी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से है, इसलिए वह जेल के भीतर उपलब्ध मुफ्त कानूनी सहायता का लाभ उठाकर जेल से ही SLP दाखिल कर सकता है और इसके लिए उसे बाहर आने की आवश्यकता नहीं है।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने सरकार के इस रुख को खारिज करते हुए स्पष्ट व्यवस्था दी कि मुफ्त विधिक सहायता एक कल्याणकारी सुविधा है, न कि कैदी के उस मूल्यवान अधिकार पर कोई सांविधिक पाबंदी कि वह अपनी मर्जी के वकील से परामर्श करने और संसाधन जुटाने हेतु पैरोल का लाभ न ले सके।
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक व्यवस्था
1. ‘मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध होना पसंद के वकील के अधिकार को समाप्त नहीं करता’
न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा ने दिल्ली कारागार नियमावली, 2018 के नियम 1208(viii) का विश्लेषण करते हुए दर्ज किया: “केवल इसलिए कि विधिक सहायता वकील (Legal Aid Counsel) उपलब्ध है, यह याचिकाकर्ता को उसकी दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखने वाले इस न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली SLP दायर करने के उद्देश्य से किसी अन्य (पसंद के) वकील को नियुक्त करने के संबंध में उसके मूल्यवान अधिकार से वंचित करने का कोई आधार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर करके विधिक उपचार प्राप्त करने का कैदी का अधिकार एक अत्यंत मूल्यवान अधिकार (Valuable Right) है, जिसे केवल इस आधार पर नकारा नहीं जा सकता कि कानूनी सहायता उपलब्ध है या याचिका जेल से ही दायर की जा सकती है।”
2. अपनी पसंद के वकील से परामर्श का अवसर मिलना अनिवार्य:
- उच्च न्यायालय ने अपने पूर्ववर्ती निर्णय ‘बिजेंद्र बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली राज्य’ (Bijender v. State of NCT of Delhi) पर भरोसा किया।
- अदालत ने दोहराया कि न्यायिक न्यायशास्त्र का यह स्थापित सिद्धांत है कि प्रत्येक सजायाफ्ता व्यक्ति को शीर्ष अदालत के समक्ष अपने बचाव और अपील को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने के लिए अपनी पसंद के अधिवक्ता से व्यक्तिगत रूप से मिलने, चर्चा करने और विधिक रणनीति तैयार करने का पूरा अवसर दिया जाना चाहिए।
3. वित्तीय संसाधन जुटाने और वकीलों से परामर्श का व्यावहारिक आधार:
- अदालत ने स्वीकार किया कि सुप्रीम कोर्ट में SLP दाखिल करने के लिए केवल वकालतनामे पर हस्ताक्षर करना पर्याप्त नहीं होता; उसके लिए केस रिकॉर्ड संकलित करने, वरिष्ठ वकीलों से ब्रीफिंग करने और आवश्यक वित्तीय संसाधनों (Financial Resources) की व्यवस्था करने की आवश्यकता होती है।
- जेल की सलाखों के पीछे से यह सब सुगमता से संभव नहीं है, इसलिए नियम 1208(viii) के तहत कैदी को अस्थायी रूप से समाज में जाने का अवसर देना कानून की मंशा के पूर्णतः अनुकूल है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम
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│ महेंद्र राठौड़ पैरोल मामला: प्रक्रियात्मक सफर │
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【मूल सजा: 7 वर्ष का कठोर कारावास】
• IPC की धारा 376 (बलात्कार) में 7 वर्ष;
धारा 506 (धमकी) में 3 वर्ष की सजा।
• दोनों सजाएं साथ-साथ (Concurrently)।▼【5 अगस्त 2026: हाईकोर्ट ने अपील खारिज की】• दिल्ली हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि केविरुद्ध दायर आपराधिक अपील खारिज की।• दोषी ने सुप्रीम कोर्ट में SLP का निर्णय लिया।▼【जेल प्रशासन का अस्वीकृति आदेश】• दिल्ली सरकार ने पैरोल अर्जी खारिजकी; कहा: जेल में मुफ्त विधिक सहायता
उपलब्ध है, बाहर जाने की जरूरत नहीं।
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【दिल्ली हाईकोर्ट में रिट याचिका】
• कैदी का तर्क: संसाधन जुटाने व पसंद के वकील हेतु पैरोल हक है।
• सरकार का तर्क: जेल से ही याचिका संभव है।▼【अक्टूबर 2026: हाईकोर्ट द्वारा 30 दिन की पैरोल】• कोर्ट ने माना: मुफ्त सहायता पसंद का वकीलचुनने के बहुमूल्य अधिकार को नहीं छीन सकती।
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं विधिक बिंदु |
| कैदी एवं सजा का विवरण | महेंद्र राठौड़ (Mahender Rathore) — भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार) के तहत 7 वर्ष का सश्रम कारावास और धारा 506 (आपराधिक धमकी) के तहत 3 वर्ष का सश्रम कारावास (दोनों सजाएं साथ-साथ चलने का निर्देश)। |
| अपील का इतिहास | दिल्ली उच्च न्यायालय ने 5 अगस्त 2026 को दिए अपने फैसले में दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ उसकी आपराधिक अपील खारिज कर दी थी। |
| पैरोल मांगने का आधार | दोषी ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भारत के संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल करने, परिवार से वित्तीय संसाधन जुटाने और दिल्ली में अपनी पसंद के वकीलों से परामर्श करने हेतु पैरोल का आवेदन किया। |
| दिल्ली सरकार का आक्षेप | दिल्ली सरकार के जेल विभाग ने पैरोल आवेदन यह कहकर खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से है, इसलिए वह तिहाड़ जेल में उपलब्ध ‘मुफ्त कानूनी सहायता’ (DLSA लीगल एड) ले सकता है; अतः व्यक्तिगत रूप से बाहर आने की कोई अनिवार्यता नहीं है। |
| हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय | प्रशासनिक अस्वीकृति आदेश निरस्त; याचिकाकर्ता को रिहाई की तिथि से 30 दिनों की पैरोल मंजूर, बशर्ते वह जमानत बांड और अन्य आवश्यक शर्तें पूरी करे। |
विधिक एवं सांविधिक विश्लेषण: दिल्ली कारागार नियमावली, 2018 का ढांचा
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│ पैरोल का विधिक ढांचा: नियम 1208(viii) व अधिकार│
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【नियम 1208(viii): SLP हेतु पैरोल】 【अनुच्छेद 22(1): पसंद का वकील】 【अनुच्छेद 39A: विधिक सहायता की प्रकृति】
• हाईकोर्ट द्वारा सजा की पुष्टि के बाद • किसी भी बंदी को अपनी पसंद के वकील से • राज्य का कर्तव्य है कि वह निर्धनों को
सुप्रीम कोर्ट जाने हेतु पैरोल कैदी का परामर्श और बचाव का अप्रतिबंधित मौलिक वकील दे, किंतु यह कैदी पर जबरन थोपी
सांविधिक आधार है। अधिकार प्राप्त है। जाने वाली बाध्यता नहीं हो सकती।
- दिल्ली कारागार नियमावली, 2018 का नियम 1208(viii):
- कारागार नियमावली उन विशिष्ट आधारों को सूचीबद्ध करती है जिनके तहत कैदी को नियमित पैरोल (Regular Parole) दी जा सकती है।
- नियम 1208(viii) स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करता है कि यदि किसी कैदी की अपील हाईकोर्ट द्वारा खारिज कर दी गई है या उसकी सजा की पुष्टि कर दी गई है, तो सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर करने की तैयारी के लिए पैरोल दी जा सकती है। यह नियम कैदी के संवैधानिक उपचार के अधिकार को सुगम बनाने के लिए बनाया गया है।
- अनुच्छेद 22(1) बनाम अनुच्छेद 39A का विधिक सामंजस्य:
- संविधान का अनुच्छेद 39A राज्य पर यह सकारात्मक दायित्व डालता है कि वह आर्थिक या अन्य अक्षमताओं के कारण किसी नागरिक को न्याय से वंचित न होने दे और मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करे।
- किंतु, इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि राज्य कैदी पर अपनी विधिक सहायता प्रणाली थोप दे और उसे अनुच्छेद 22(1) के तहत अपनी पसंद के निजी वकील को नियुक्त करने के मौलिक अधिकार से वंचित कर दे।
- यदि कोई कैदी अपने परिवार, मित्रों या व्यक्तिगत प्रयासों से संसाधन जुटाकर किसी विशिष्ट निजी वकील के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखना चाहता है, तो राज्य उसे केवल इसलिए नहीं रोक सकता क्योंकि जेल में एक सरकारी लीगल एड वकील मौजूद है।
- सुधारात्मक न्यायशास्त्र (Reformative Jurisprudence):
- पैरोल केवल एक राहत नहीं है, बल्कि यह कैदी के समाज और परिवार के साथ संबंधों को बनाए रखने और उसे अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग करने का अवसर देने का एक सुधारात्मक माध्यम है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: महेंद्र राठौड़ बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली राज्य व अन्य [रिट याचिका (आपराधिक) – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
- संबद्ध विषय: दिल्ली कारागार नियमावली, 2018 के नियम 1208(viii) के तहत सुप्रीम कोर्ट में SLP दायर करने हेतु पैरोल का अधिकार
पक्षकारों का विधिक विवरण:
- याचिकाकर्ता: महेंद्र राठौड़ (सजायाफ्ता कैदी, केंद्रीय कारागार, तिहाड़/मंडोली, नई दिल्ली)
- प्रतिवादी: राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (गृह विभाग/महानिदेशक कारागार)
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- दिल्ली कारागार नियमावली, 2018 (Delhi Prison Rules, 2018) — नियम 1208(viii) (SLP दायर करने हेतु पैरोल की पात्रता) एवं नियम 1210
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता), अनुच्छेद 22(1) (पसंद के वकील से परामर्श का अधिकार), अनुच्छेद 39A (समान न्याय और मुफ्त विधिक सहायता), अनुच्छेद 136 (सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका) एवं अनुच्छेद 226
- भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) — धारा 376 (बलात्कार) एवं धारा 506 (आपराधिक धमकी)
- संबद्ध न्यायिक नजीरें:
- बिजेंद्र बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली राज्य [Bijender v. State of NCT of Delhi (Delhi HC)] — ‘जेल से SLP दाखिल करने की संभावना या मुफ्त कानूनी सहायता की उपलब्धता कैदी को अपनी पसंद के वकील से अपील करने हेतु पैरोल से वंचित करने का वैध आधार नहीं है।’
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- पसंद के विधिक प्रतिनिधित्व की सर्वोच्चता: ‘मुफ्त कानूनी सहायता राज्य का कल्याणकारी दायित्व है, कोई दंडात्मक प्रतिबंध नहीं; एक सजायाफ्ता कैदी को देश की सर्वोच्च अदालत में अपनी स्वतंत्रता की अंतिम लड़ाई अपनी पसंद के वकील के माध्यम से लड़ने के लिए वित्तीय और विधिक संसाधन जुटाने का पूरा अवसर (पैरोल) मिलना चाहिए।’
- अंतिम परिणाम: याचिका स्वीकार; दिल्ली सरकार का अस्वीकृति आदेश निरस्त; याचिकाकर्ता महेंद्र राठौड़ को जेल से रिहाई की तारीख से 30 दिनों की पैरोल पर रिहा करने का निर्देश (सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्धारित जमानत बांड व शर्तों के अधीन)।
Legal Aid: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति मिनी पुष्कर्णा |
| याचिकाकर्ता (कैदी) | महेंदर राठौड़ |
| संबंधित नियम | दिल्ली जेल नियम, 2018 का नियम 1208 (viii) |
| दिल्ली सरकार का तर्क | कैदी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से है और वह जेल में मिलने वाली मुफ्त कानूनी सहायता की मदद से SLP दायर कर सकता है, इसलिए पैरोल की आवश्यकता नहीं है। |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | 1. सुप्रीम कोर्ट में दोषसिद्धि को चुनौती देना कैदी का एक मूल्यवान अधिकार है। 2. मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध होने मात्र से पसंद के वकील की सेवाएं लेने का अधिकार समाप्त नहीं होता। |
| अदालत का अंतिम आदेश | याचिका स्वीकार; कैदी को SLP दायर करने, वित्तीय संसाधन जुटाने और वकील से परामर्श के लिए 30 दिन की पैरोल प्रदान की गई। |

