अदालत की मुख्य टिप्पणियां और चिंताएं
- “कागजी अधिकार से दूरदराज की बालिकाओं का भला नहीं होगा”:सुप्रीम कोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा:“हमने मासिक धर्म स्वच्छता को अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार का अभिन्न हिस्सा घोषित किया है। लेकिन अगर हमारे फैसले में कही गई बातें केवल कागजों पर ही रह जाएंगी, तो केंद्र और राज्य इस मौलिक अधिकार को लागू कैसे करेंगे? हमने जो कुछ भी किया है, वह उन दूरदराज के ग्रामीण इलाकों की युवा बालिकाओं के हित में किया है, जो केवल मासिक धर्म स्वच्छता सुविधाओं के अभाव में अपनी शिक्षा बीच में ही छोड़ देती हैं।”
- सांख्यिकी और ‘Yes/No’ जवाबों पर नाराजगी:अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने पीठ को बताया कि केंद्र ने सभी राज्यों से जानकारी मांगी थी, लेकिन राज्यों ने विस्तृत रिपोर्ट नहीं दी। कोर्ट ने कहा कि केवल कागजी आंकड़े या ‘हाँ/ना’ में जवाब देने से काम नहीं चलेगा। राज्यों को यह स्पष्ट बताना होगा कि कहाँ क्या कमियाँ हैं, वे क्यों हैं और उन्हें दूर करने में कितना समय लगेगा।
- प्रश्नावली (Questionnaire) के जरिए जानकारी मांगने के आदेश:शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को एक विस्तृत प्रश्नावली तैयार कर सभी राज्यों व UTs को भेजने का निर्देश दिया है, जिसमें स्कूलों में शौचालयों, सेनेटरी नैपकिन, पैड डिस्पोजल और पर्यावरण-अनुकूल (Eco-friendly) उत्पादों के इस्तेमाल से जुड़े बिंदु शामिल होंगे।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुख्य अनिवार्य मानक (Mandatory Standards)
30 जनवरी और 1 सितंबर के आदेशों के तहत सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी सरकारी व निजी स्कूलों के लिए निम्नलिखित दिशानिर्देश अनिवार्य किए हैं:
- लिंग-पृथक शौचालय: सभी स्कूलों में पानी और साबुन की सुविधा वाले साफ, सुरक्षित और क्रियाशील शौचालय।
- MHM कॉर्नर: आपात स्थिति के लिए स्कूलों में स्पेयर यूनिफॉर्म, इनरवेयर और फ्री सेनेटरी नैपकिन से लैस Menstrual Hygiene Management Corners का निर्माण।
- दिव्यांग अनुकूलता: दिव्यांग बच्चों के लिए सुलभ शौचालय और ढके हुए कचरा पात्र (Covered Bins)।
- निजी स्कूलों पर असर: मानकों का पालन न करने पर निजी स्कूलों की मान्यता रद्द की जा सकती है।
नई दिल्ली: भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत मासिक धर्म स्वच्छता एवं स्वास्थ्य (Menstrual Hygiene & Health) को मौलिक अधिकार का अभिन्न अंग घोषित किए जाने के बाद, उसके जमीनी क्रियान्वयन (Ground-Level Implementation), सरकारी और निजी स्कूलों में छात्राओं के लिए स्वच्छ व सुरक्षित बुनियादी ढांचे के अनिवार्य मानकों, राज्यों द्वारा केंद्र सरकार को अनुपालन रिपोर्ट न भेजने की प्रशासनिक उदासीनता, तथा न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत राज्यों के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों (मुख्य सचिवों) की व्यक्तिगत जवाबदेही पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की खंडपीठ ने डॉ. जया ठाकुर द्वारा दायर जनहित याचिका (Writ Petition (Civil) No. 1000/2022) में 30 जनवरी 2026 के ऐतिहासिक फैसले के अनुपालन की समीक्षा करते हुए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) के गैर-जिम्मेदाराना रवैये पर तीव्र असंतोष व्यक्त किया। अदालत ने पाया कि केंद्र सरकार द्वारा बार-बार विवरण मांगे जाने के बावजूद राज्य सरकारें कोई जानकारी प्रस्तुत नहीं कर रही हैं। पीठ ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अनुपालन का “एक अंतिम अवसर” (One Last Opportunity) देते हुए चेतावनी दी कि अगली सुनवाई तक जवाब न आने पर संबंधित राज्यों के मुख्य सचिवों को व्यक्तिगत रूप से अवमानना नोटिस (Contempt Notice) जारी किए जाएंगे। मामले की अगली सुनवाई 14 दिसंबर 2026 को दोपहर 2:30 बजे निर्धारित की गई है।
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं तल्ख टिप्पणियां
1. ‘अगर फैसला केवल कागजों पर रहा, तो इस मौलिक अधिकार को लागू कैसे करेंगे?’
खंडपीठ ने जमीनी स्तर पर नीतियों के क्रियान्वयन में हो रही विफलता पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा: “हमें पूरा विश्वास है कि केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने मासिक धर्म स्वच्छता को एक मौलिक अधिकार घोषित करने वाले हमारे फैसले के महत्व को भली-भांति समझ लिया है। दूसरे शब्दों में कहें तो, हमने मासिक धर्म स्वच्छता और स्वास्थ्य को संविधान के अनुच्छेद 21 का एक अनिवार्य पहलू घोषित किया है। किंतु यदि हमने फैसले में जो कुछ कहा है, वह केवल कागजों पर ही सीमित रहने वाला है, तो केंद्र, राज्य और केंद्र शासित प्रदेश इस मौलिक अधिकार को जमीन पर कैसे लागू करने जा रहे हैं?“
2. दूर-दराज के क्षेत्रों में स्कूल छोड़ रही छात्राओं के प्रति न्यायिक संवेदनशीलता:
पीठ ने छात्राओं के ड्रॉप-आउट संकट को रेखांकित करते हुए दर्ज किया: *”हमने जो कुछ भी किया है, वह उन युवा बच्चियों के हित में किया है जो मासिक धर्म स्वच्छता के बुनियादी साधनों के अभाव के कारण अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ रही हैं। यह संकट विशेष रूप से देश के सुदूर और ग्रामीण अंचलों में अत्यंत विकट है। जब केंद्र सरकार आवश्यक जानकारी मांगती है, तो हम यह समझने में पूरी तरह असमर्थ हैं कि राज्य और केंद्र शासित प्रदेश इसका कोई जवाब क्यों नहीं देते?”*
3. मुख्य सचिवों को अवमानना नोटिस की सीधी चेतावनी:
अदालत ने राज्यों की सांविधिक जवाबदेही तय करते हुए कड़ा निर्देश पारित किया: “अगली सुनवाई की तिथि पर, यदि हमें केंद्र सरकार से यह सुनने को मिलता है कि कुछ राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों ने जवाब नहीं दिया है, तो हम संबंधित राज्य(यों) के मुख्य सचिव (Chief Secretary) को अवमानना का नोटिस जारी करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। यह अंतिम अवसर दिया जा रहा है।”
30 जनवरी 2026 का मूल निर्णय और 1 सितंबर की समीक्षा बैठक
सर्वोच्च न्यायालय ने 30 जनवरी 2026 को दिए गए अपने विस्तृत फैसले में केंद्र सरकार की ‘स्कूल जाने वाली छात्राओं के लिए मासिक धर्म स्वच्छता नीति’ (Menstrual Hygiene Policy for School-going Girls) को देश भर के सभी सरकारी, स्थानीय निकाय और निजी स्कूलों (कक्षा 6 से 12 तक) में अनिवार्य रूप से लागू करने का ऐतिहासिक निर्देश दिया था:
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│ सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित अनिवार्य स्कूल मानक │
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【अलग व क्रियाशील शौचालय】 【दिव्यांग-सुलभ शौचालय】 【निःशुल्क सैनिटरी पैड】 【MHM कॉर्नर / साबुन】 【सुरक्षित कचरा निस्तारण】
• छात्राओं हेतु नल के चालू • दिव्यांग (CWD) छात्राओं • वेंडिंग मशीनों या • स्कूलों में प्राथमिक • ढक्कन वाले डस्टबिन और
पानी से युक्त अलग शौचालय। के अनुकूल विशेष टॉयलेट। स्टॉक से मुफ्त सैनिटरी उपचार व मेंस्ट्रुअल पर्यावरण-अनुकूल भस्मक
पैड का नियमित वितरण। हाइजीन कॉर्नर की स्थापना। (Eco-friendly Incinerators)।
| चरण / समीक्षा | शीर्ष अदालत के निर्देश एवं दर्ज की गई कमियां |
| 30 जनवरी 2026 (मूल फैसला) | मासिक धर्म स्वास्थ्य को अनुच्छेद 21 के तहत दैहिक स्वायत्तता (Bodily Autonomy) और गरिमापूर्ण जीवन का हिस्सा घोषित किया गया। स्कूलों में बुनियादी ढांचे के अनिवार्य मानक तय किए गए। |
| 1 सितंबर 2026 (प्रथम समीक्षा) | • अदालत ने राज्यों द्वारा औपचारिक “हां/ना” (Yes/No) या केवल भ्रामक आंकड़े पेश करने पर कड़ी फटकार लगाई थी। • केंद्र के हलफनामे में खुलासा हुआ कि देश भर में 39,439 छात्राओं के शौचालय अभी भी गैर-कार्यात्मक हैं (जिनमें से 4,745 का अंतर बना हुआ है)। • अदालत ने जिला शिक्षा अधिकारियों (DEO) को औचक निरीक्षण करने और धीरे-धीरे पर्यावरण-अनुकूल मेंस्ट्रुअल उत्पादों (Eco-friendly menstrual products) की ओर बढ़ने का निर्देश दिया था। |
| 15 अक्टूबर 2026 (अंतिम चेतावनी) | अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि केंद्र ने सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों से लिखित जानकारी मांगी थी, परंतु अधिकांश राज्यों ने अभी तक कोई विवरण नहीं भेजा है। इस पर अदालत ने मुख्य सचिवों को अवमानना की अंतिम चेतावनी जारी की। |
केंद्र सरकार को प्रश्नावली (Questionnaire) तैयार करने का आदेश
राज्यों की टालमटोल पर रोक लगाने के लिए अदालत ने केंद्र सरकार को एक संरचित प्रश्नावली तैयार करने का निर्देश दिया है:
- विशिष्ट कमियों का विवरण: राज्यों को केवल सामान्य आंकड़े देने के बजाय यह स्पष्ट रूप से बताना होगा कि उनके राज्य के किन-किन स्कूलों में कौन-सी सुविधाएं (जैसे रनिंग वॉटर, टॉयलेट, इंसीनरेटर) अभी भी उपलब्ध नहीं हैं।
- कारण और समय-सीमा: कमियां क्यों बनी हुई हैं और उन कमियों को पूरी तरह दूर करने में राज्य प्रशासन को कितना समय लगेगा, इसका सटीक समयबद्ध रोडमैप देना होगा।
- प्रश्नावली के आधार पर संकलन: केंद्र सरकार सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से यह लिखित विवरण संकलित कर 14 दिसंबर 2026 की सुनवाई से पूर्व अदालत के समक्ष प्रस्तुत करेगी।
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- संविधान का अनुच्छेद 21 और शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 21A):
- सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि सुरक्षित और स्वच्छ मासिक धर्म प्रबंधन के अभाव में छात्राओं को संक्रमण (जैसे बैक्टीरियल वेजिनोसिस) और प्रजनन संबंधी जटिलताओं का सामना करना पड़ता है।
- शौचालय और सैनिटरी पैड न मिलने के कारण मासिक धर्म के दिनों में छात्राओं की अनुपस्थिति (Absenteeism) और पढ़ाई छोड़ना संविधान के अनुच्छेद 21A (निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा) तथा अनुच्छेद 14 (लैंगिक समानता) के उद्देश्य को सीधे विफल करता है।
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 12 (मुख्य सचिव की व्यक्तिगत देयता):
- संवैधानिक पीठों की स्थापित नजीर के अनुसार, जब सर्वोच्च न्यायालय पूरे राज्य के लिए कोई सकारात्मक नीतिगत निर्देश (Mandamus) जारी करता है, तो राज्य का मुख्य सचिव उसका अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होता है।
- यदि प्रशासनिक तंत्र केंद्र सरकार और न्यायालय के निर्देशों की अनदेखी करता है, तो अदालत सीधे मुख्य सचिव के विरुद्ध अवमानना कार्यवाही शुरू कर सकती है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत संघ व अन्य [रिट याचिका (सिविल) संख्या 1000 / 2022 – सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 15 अक्टूबर 2026
- अगली सुनवाई की तिथि: 14 दिसंबर 2026 (दोपहर 2:30 बजे)
विधिक प्रतिनिधित्व:
- केंद्र सरकार (भारत संघ) की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी
- याचिकाकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता व प्रतिनिधि (डॉ. जया ठाकुर की विधिक टीम)
- प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (स्वास्थ्य, गरिमा और मासिक धर्म स्वच्छता का मौलिक अधिकार), अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार), अनुच्छेद 14 (लैंगिक समानता) एवं अनुच्छेद 32
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 — धारा 2(b) एवं धारा 12 (मुख्य सचिवों के विरुद्ध अवमानना का दायरा)
- बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act) — धारा 19 सहपठित अनुसूची (स्कूलों में बालिकाओं के लिए पृथक शौचालय)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- न्यायिक निर्णयों की क्रियान्वयन शक्ति (Enforceability of Socio-Economic Rights): ‘मासिक धर्म स्वच्छता केवल एक स्वास्थ्य निर्देश नहीं बल्कि अनुच्छेद 21 के तहत छात्राओं का मौलिक अधिकार है; राज्य सरकारें सूचना न देकर इस अधिकार को कागजों तक सीमित नहीं रख सकतीं और चूककर्ता राज्यों के मुख्य सचिव व्यक्तिगत अवमानना के लिए दायी होंगे।’
- अंतिम परिणाम: राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का एक अंतिम अवसर प्रदान किया गया; केंद्र सरकार को सभी राज्यों से प्रश्नावली के माध्यम से लिखित रिपोर्ट जुटाने का निर्देश; विफलता की स्थिति में 14 दिसंबर 2026 को संबंधित मुख्य सचिवों के विरुद्ध अवमानना नोटिस जारी करने की सीधी न्यायिक चेतावनी।
Menstrual Hygiene: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति आर. महादेवन |
| ऐतिहासिक फैसला | 30 जनवरी 2026 को मासिक धर्म स्वास्थ्य/स्वच्छता को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया गया। |
| मुख्य मुद्दा | 30 जनवरी और 1 सितंबर के अदालती आदेशों के बावजूद राज्यों द्वारा केंद्र सरकार को कार्यान्वयन रिपोर्ट न सौंपना। |
| अदालत की चेतावनी | 1. मुख्य सचिवों को अवमानना नोटिस जारी करने की चेतावनी। 2. केंद्र सरकार को प्रश्नावली तैयार कर राज्यों से स्पष्ट लिखित जवाब मांगने का निर्देश। |
| अगली सुनवाई तिथि | 14 दिसंबर 2026 |

