मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी आधार
- “घटिया राजनीति और ख़राब परवरिश” पर कड़ा प्रहार:जस्टिस भरत चक्रवर्ती ने बच्चों के इस्तेमाल पर बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा:“मासूम बच्चों को राजनीतिक गतिविधियों में घसीटना अत्यंत घटिया रुचि और ख़राब परवरिश (Poor Parenting) को दर्शाता है। बच्चों से ऐसी रील्स बनवाना सस्ता और राजनीतिक रूप से प्रेरित कदम है।”
- संसद और देश के लिए बहस का विषय:हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्या बच्चों के इस्तेमाल को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाए या इसे चुनाव रद्द करने का कानूनी आधार बनाया जाए—यह एक बड़ा विषय है जिस पर संसद (Parliament) और देश को कानून बनाने हेतु विचार करना होगा।
- अनुचित प्रभाव (Undue Influence) से अलग:अदालत ने माना कि बच्चों की मासूम जिद या भावनात्मक दबाव से वयस्क मतदाताओं की स्वतंत्र इच्छा (Free Will) पूरी तरह खत्म नहीं होती। बड़े लोग बच्चों से ऐसी रील्स बनवाते हैं, लेकिन वोट देने का अंतिम फैसला वयस्क मतदाता का ही होता है।
- चुनाव आयोग के दिशानिर्देश और RP Act:अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग के सर्कुलर वैधानिक प्रकृति के हो सकते हैं, लेकिन जब तक जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123 में कोई स्पष्ट संशोधन नहीं होता, तब तक आयोग के निर्देशों का उल्लंघन अपने आप में चुनाव रद्द करने का स्वतंत्र आधार नहीं बन सकता।
चेन्नई: लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951 – RP Act) की धारा 123(2) के तहत ‘अनुचित प्रभाव’ (Undue Influence) के रूप में भ्रष्ट आचरण (Corrupt Practice), धारा 100(1)(b) व (d) के तहत चुनाव शून्य घोषित करने के वैधानिक आधार, भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) के दिशा-निर्देशों के उल्लंघन का विधिक प्रभाव, सोशल मीडिया रील्स और बच्चों के माध्यम से मतदाताओं (माता-पिता) पर डाले गए भावनात्मक प्रभाव की विधिक सीमा, तथा राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव प्रचार में नाबालिग बच्चों के उपयोग पर संसद की विधायी भूमिका पर मद्रास उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति डी. भरत चक्रवर्ती की एकल पीठ ने द्रमुक (DMK) उम्मीदवार के. शिवकुमार द्वारा दायर चुनाव याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही अस्वीकार्य (Rejected at the Threshold) मानते हुए खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता ने सेलम उत्तर (Salem North) विधानसभा क्षेत्र से तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) के उम्मीदवार आर. राजेंद्रन की 14,034 मतों से हुई जीत को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि TVK प्रमुख जोसेफ विजय (वर्तमान मुख्यमंत्री) के भाषणों और सोशल मीडिया पर बच्चों की रील्स के जरिए माता-पिता पर TVK को वोट देने का अनुचित दबाव बनाया गया, जो चुनाव आचार संहिता और चुनाव कानून का उल्लंघन है। अदालत ने इस आचरण की सामाजिक व नैतिक रूप से कड़ी आलोचना की, परंतु कानूनन इसे चुनाव रद्द करने का आधार मानने से इनकार कर दिया।
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक व्यवस्था
1. ‘बच्चों का इस्तेमाल खराब रुचि और खराब परवरिश का परिचायक, रील्स बनाना राजनीतिक रूप से घटिया’
न्यायमूर्ति भरत चक्रवर्ती ने चुनावी अभियानों में मासूम बच्चों को झोंकने और सोशल मीडिया पर उनकी रील्स बनाने की कड़ी निंदा करते हुए कहा: *”मासूम बच्चों को इसमें शामिल करने का यह पूरा कृत्य खराब रुचि (Bad taste) में है, और उनसे जो कार्य करवाए गए वे खराब परवरिश (Poor parenting) को दर्शाते हैं; इस पर रील्स बनाना ओछा (Cheap) और राजनीतिक रूप से प्रेरित कृत्य है। यह राष्ट्र और संसद के विचार करने के लिए एक बड़ा विमर्श (Larger debate for Parliament) है कि क्या इस तरह की प्रथाओं पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जाए या इसे चुनाव रद्द करने का एक स्वतंत्र कानूनी आधार बनाया जाए। कानून बनाना विधायिका का काम है, अदालत अपने स्तर पर नए आधार नहीं जोड़ सकती।”*
2. भावनात्मक दबाव ‘अनुचित प्रभाव’ (Undue Influence) नहीं:
- अदालत ने हिंदू परंपराओं और तमिल संस्कृति का संदर्भ देते हुए स्वीकार किया कि परिवारों में बच्चों को भगवान का रूप माना जाता है और माता-पिता पर उनकी बातों का गहरा भावनात्मक प्रभाव होता है।
- परंतु, अदालत ने सामान्य पारिवारिक अनुनय-विनय और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत ‘अनुचित प्रभाव’ के बीच स्पष्ट कानूनी भेद किया:“याचिकाकर्ता के आरोपों को यदि सत्य भी मान लिया जाए, तब भी बच्चों के माध्यम से डाला गया भावनात्मक दबाव (Emotional pressure) वयस्क मतदाताओं की स्वतंत्र इच्छाशक्ति को पंगु बनाने या छीनने (Overpowering the free will) के बराबर नहीं हो सकता। वयस्क मतदाता अपने विवेक से निर्णय लेने में सक्षम होते हैं।”
3. ECI के परिपत्र का उल्लंघन चुनाव रद्द करने का आधार नहीं:
- अदालत ने माना कि निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव प्रचार में बच्चों के उपयोग पर रोक लगाने वाले परिपत्र का वैधानिक चरित्र अवश्य है।
- परंतु, RP Act, 1951 की धारा 100 में चुनाव रद्द करने के आधारों की एक सीमित और बंद सूची (Exhaustive List) दी गई है। आयोग के किसी प्रशासनिक परिपत्र या दिशा-निर्देश का उल्लंघन स्वतः चुनाव को शून्य घोषित करने का स्वतंत्र विधिक आधार नहीं बन सकता।
4. पार्टी प्रमुख के भाषण और प्रत्याशी की जवाबदेही का अभाव:
- याचिकाकर्ता ने 21 अप्रैल 2026 को टीवीके प्रमुख जोसेफ विजय के उस भाषण का हवाला दिया था जिसमें उन्होंने बच्चों से कहा था कि वे किंडर जॉय (Kinder Joy) जैसी चॉकलेट मांगने की तरह अपने माता-पिता से पार्टी को वोट देने की जिद करें।
- अदालत ने निर्धारित किया कि पार्टी प्रमुख के किसी सामान्य सार्वजनिक भाषण को तब तक किसी विशिष्ट उम्मीदवार का भ्रष्ट आचरण नहीं माना जा सकता, जब तक कि उम्मीदवार या उसके चुनाव एजेंट की सीधी संलिप्तता या सहमति (Privity/Consent) स्थापित न हो।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं याचिकाकर्ता के आरोप
| विवरण / पक्ष | तथ्यात्मक स्थिति एवं दलीलें |
| विधानसभा क्षेत्र | सेलम उत्तर (Salem North), 2026 तमिलनाडु विधानसभा चुनाव। |
| परिणाम | TVK उम्मीदवार आर. राजेंद्रन विजयी रहे; DMK प्रत्याशी के. शिवकुमार 14,034 मतों से पराजित हुए। |
| चुनाव याचिका (Election Petition) | शिवकुमार द्वारा RP Act, 1951 की धारा 80, 81 व 100 के तहत राजेंद्रन का निर्वाचन रद्द करने की मांग। |
| विवादित सोशल मीडिया वीडियो | याचिका में आरोप लगाया गया कि प्रचार के दौरान सोशल मीडिया पर ऐसी रील्स प्रसारित की गईं जहां बच्चे अपने परिजनों को TVK को वोट न देने पर गोबर फेंकने, आत्महत्या करने और एक मामले में पिता के भोजन में जहर मिलाने तक की धमकी देते दिखे। |
| वयस्कों की भूमिका पर कोर्ट की टिप्पणी | अदालत ने स्पष्ट किया कि इन वीडियो के लिए बच्चे नहीं, बल्कि उनके माता-पिता और वयस्क जिम्मेदार हैं जिन्होंने बच्चों को नेता की छवि दिखाई, उनसे ये अभिनय करवाए, रील्स बनाईं और वायरल कीं। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: RP Act, 1951 के तहत ‘अनुचित प्रभाव’
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│ चुनाव याचिका: धारा 123(2) अनुचित प्रभाव की कसौटी │
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【धारा 123(2): अनुचित प्रभाव की परिभाषा】 【धारा 100: चुनाव शून्य करने के आधार】 【विधायिका का अनन्य क्षेत्राधिकार】
• किसी चुनावी अधिकार के स्वतंत्र प्रयोग • केवल साबित भ्रष्ट आचरण, नामांकन की • ECI दिशानिर्देशों का उल्लंघन आचार
में 'सीधा या परोक्ष हस्तक्षेप या प्रयास'। अवैध स्वीकृति या परिणाम पर तात्विक प्रभाव संहिता का मामला है; नया आधार बनाना
• भय, चोट या सामाजिक बहिष्कार की धमकी। होने पर ही चुनाव रद्द हो सकता है। संसद का कार्यक्षेत्र है, न्यायपालिका का नहीं।
- ‘अनुचित प्रभाव’ (Undue Influence) का उच्च विधिक मानक:
- सुप्रीम कोर्ट ने बाबूराव पटेल (1968) और शिव किरपाल सिंह (1970) के ऐतिहासिक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि केवल मतदाताओं को प्रेरित करना या उनसे भावनात्मक अपील करना अनुचित प्रभाव नहीं है। अनुचित प्रभाव तब होता है जब मतदाता के मन में ऐसा भय, आतंक या धमकी उत्पन्न कर दी जाए कि वह अपनी स्वतंत्र चुनावी इच्छा का प्रयोग ही न कर सके।
- बच्चों द्वारा चॉकलेट मांगने या घरेलू जिद करने जैसी भावनात्मक अपीलों को वयस्क मतदाताओं के विवेक को नष्ट करने वाला विधिक बल नहीं माना जा सकता।
- चुनाव याचिकाओं में सख्त प्रक्रियात्मक नियम (Order VII Rule 11 CPC सहपठित धारा 86 RP Act):
- एक चुनाव याचिका केवल सामान्य आरोपों पर नहीं चल सकती; उसमें वादहेतुक (Cause of Action) का पूर्ण और सटीक प्रकटीकरण आवश्यक है। चूंकि याचिका के तथ्य किसी भ्रष्ट आचरण का विधिक अपराध नहीं बनाते थे, इसलिए अदालत ने इसे ट्रायल में ले जाने के बजाय दहलीज पर ही खारिज कर दिया।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- केस संदर्भ: के. शिवकुमार बनाम आर. राजेंद्रन [चुनाव याचिका – मद्रास उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति डी. भरत चक्रवर्ती (एकल पीठ)
- आदेश की तिथि: 15 अक्टूबर 2026 (निर्णय सार्वजनिक: 16 अक्टूबर 2026)
- संबद्ध चुनाव: सेलम उत्तर विधानसभा क्षेत्र (तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026)
विधिक प्रतिनिधित्व:
- प्रत्यर्थी / विजयी विधायक (आर. राजेंद्रन) की ओर से: अधिवक्ता जी. मुरुगेंद्रन
- याचिकाकर्ता (के. शिवकुमार) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता एन.आर. इलांगो (अधिवक्ता ए.एस. अश्विन प्रसन्ना द्वारा निर्देशित)
- रिटर्निंग ऑफिसर की ओर से: अधिवक्ता निरंजन राजगोपालन
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (RP Act, 1951) — धारा 100 (चुनाव शून्य करने के आधार), धारा 123(2) (अनुचित प्रभाव के रूप में भ्रष्ट आचरण) एवं धारा 86 (याचिकाओं की सुनवाई)
- भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) चुनाव आचार संहिता एवं एडवाइजरी (चुनावी अभियानों में बच्चों के उपयोग पर निषेध)
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) — आदेश VII नियम 11 (वादहेतुक के अभाव में याचिका का खारिज होना)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- भावनात्मक अनुनय बनाम चुनावी अनुचित प्रभाव: ‘चुनावी प्रचार में बच्चों का उपयोग और रील्स बनाना नैतिक रूप से कितना भी अनुचित या खराब परवरिश का प्रतीक क्यों न हो, जब तक मतदाता की स्वतंत्र इच्छा पर बलपूर्वक या भयादोहन से आघात न हो, यह RP Act के तहत चुनाव रद्द करने का विधिक आधार नहीं बन सकता; कानून में ऐसा कोई प्रावधान जोड़ना संसद के अधिकार क्षेत्र में है।’
- अंतिम परिणाम: DMK पराजित उम्मीदवार की चुनाव याचिका प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज; TVK विधायक आर. राजेंद्रन का निर्वाचन वैध ठहराया गया।
Use of Child: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति डी. भरत चक्रवर्ती |
| मामले की पृष्ठभूमि | तमिलनाडु विधानसभा चुनाव (सेलम नॉर्थ निर्वाचन क्षेत्र) में TVK के उम्मीदवार आर. राजेंद्रन की 14,034 मतों से जीत को DMK उम्मीदवार शिवकुमार द्वारा चुनौती। |
| मुख्य आरोप | टीवीके अध्यक्ष जोसेफ विजय और पार्टी द्वारा बच्चों का चुनाव प्रचार में इस्तेमाल; सोशल मीडिया पर इमोशनल ब्लैकमेल रील्स बनाकर वोट हासिल करने को अनुचित प्रभाव (Undue Influence) बताना। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | चुनाव याचिका खारिज; बच्चों का इस्तेमाल अनैतिक हो सकता है, लेकिन यह कानूनी रूप से चुनाव रद्द करने का आधार (Corrupt Practice) नहीं बनता। |

