मुख्य विवाद और सुप्रीम कोर्ट की आपत्तियाँ
- भंडारी इंजीनियर्स बनाम दिल्ली केमिकल्स फैसला:
- पूर्व में Bhandari Engineers & Builders मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के सिंगल जज ने फैसला सुनाया था कि डिक्री-देनदार (Judgment-Debtor) को अपनी संपत्ति और आय का अनिवार्य खुलासा करना होगा, जिससे निष्पादन याचिकाओं का तेज़ी से निपटारा हो सके।
- हालांकि, 2021 में Delhi Chemicals and Pharmaceutical Works Pvt Ltd मामले में डिविजन बेंच ने इस फैसले को पलट दिया और कहा कि यह नियम सभी मनी डिक्री (Money Decrees) पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता।
- अदालतों के हाथ बाँधने पर जस्टिस पारदीवाला का सवाल:न्यायालय मित्र ने अदालत को बताया कि इस डिविजन बेंच के फैसले के कारण पिछले छह महीनों में दिल्ली हाईकोर्ट में करीब 17,000 नई निष्पादन याचिकाएं लंबित हो गई हैं, क्योंकि निष्पादन अदालतें सीपीसी धारा 151 (CPC Section 151 – अंतर्निहित शक्तियां) का प्रयोग नहीं कर पा रही हैं।इस पर जस्टिस पारदीवाला ने मौखिक टिप्पणी की:“क्या इस डिविजन बेंच के फैसले को चुनौती दी गई है? दो निजी पक्षों के बीच मुकदमेबाज़ी में आए इस फैसले की वजह से धारा 151 की शक्तियों का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। यदि यह टिप्पणी निष्पादित करने वाली अदालतों के रास्ते में आ रही है, तो हमें कुछ करना होगा।”
- गुजरात और केरल हाईकोर्ट के काम की सराहना:सुप्रीम कोर्ट ने देश भर की अदालतों में लंबित निष्पादन मामलों के आंकड़ों की समीक्षा करते हुए गुजरात उच्च न्यायालय और केरल उच्च न्यायालय के प्रयासों की सराहना की, जिन्होंने पिछले 6 महीनों में निष्पादन याचिकाओं के निपटारे में उल्लेखनीय प्रगति की है।
कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट में संशोधन की सिफारिश
- कमर्शियल कोर्ट्स रूल्स (Commercial Courts Rules):सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर दोहराया कि केंद्र सरकार को कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015 में संशोधन करना चाहिए ताकि व्यावसायिक मुकदमों में निष्पादन की प्रक्रिया कमर्शियल कोर्ट रूल्स के अनुसार हो (जो 2021 से अधिसूचित नहीं हुए हैं)।
- अगली सुनवाई: मामले को अगले बुधवार के लिए सूचीबद्ध करते हुए पीठ ने कहा कि वह कुछ ऐसे अवलोकन दर्ज करेगी जिससे केंद्र सरकार को आवश्यक संशोधन लाने में आसानी हो।
नई दिल्ली: सिविल मुकदमों में वर्षों के संघर्ष के बाद प्राप्त अंतिम डिक्री (Civil / Money Decrees) को तामील कराने और निष्पादित (Execution) करने में डिक्री-धारकों (Decree Holders) को आने वाली अंतहीन दिक्कतों, देश भर की जिला अदालतों में लंबित 8.8 लाख निष्पादन याचिकाओं, तथा दिल्ली उच्च न्यायालय की खंडपीठ के एक निर्णय द्वारा देनदारों (Judgment-Debtors) की संपत्ति प्रकटीकरण पर लगाई गई कानूनी अड़चनों पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर संज्ञान लिया है।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने देश भर में लंबित निष्पादन याचिकाओं के त्वरित निस्तारण से जुड़ी अखिल भारतीय कार्यवाही पर 7 अक्टूबर 2026 को सुनवाई करते हुए यह अवलोकन किया। पीठ ने जहां पिछले छह महीनों में बड़ी संख्या में निष्पादन मामलों के निपटारे पर संतोष व्यक्त किया—विशेषकर गुजरात उच्च न्यायालय और उसके बाद केरल उच्च न्यायालय के उत्कृष्ट प्रदर्शन की सराहना की—वहीं दिल्ली में पिछले छह महीनों में 17,000 नई निष्पादन अर्जियां लंबित होने पर चिंता जताई। शीर्ष अदालत ने मौखिक रूप से स्पष्ट किया है कि वह दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ के उस फैसले के विरुद्ध आवश्यक कदम उठाएगी जो अदालतों द्वारा निष्पादन अर्जियों के शीघ्र निपटारे के रास्ते में आ रहा है।
शीर्ष अदालत के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ का फैसला निष्पादक अदालतों के हाथ बांध रहा है’
सुनवाई के दौरान जब न्यायालय मित्र (Amicus Curiae) वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अपनी रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष पिछले 6 महीनों में लगभग 17,000 नई निष्पादन याचिकाएं लंबित हो गई हैं, तो इसका मुख्य कारण दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा वर्ष 2021 में दिया गया फैसला (दिल्ली केमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल वर्क्स प्रा. लि.) बना।
इस पर न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला ने सवाल किया: “क्या आपने उस खंडपीठ (DB) के निर्णय को रिकॉर्ड पर रखा है या नहीं? क्या यह खंडपीठ का फैसला बाधा उत्पन्न कर रहा है? यह निर्णय दो निजी पक्षों के बीच मुकदमे में दिया गया था और अब तक किसी ने इस पर सवाल नहीं उठाया? इस खंडपीठ के फैसले के कारण, अदालतें सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 151 के तहत अंतर्निहित शक्तियों (Inherent Powers) का उपयोग नहीं कर पा रही हैं। यदि यह अवलोकन निष्पादक अदालतों के रास्ते में आ रहा है, तो हमें निश्चित रूप से इसके संबंध में कुछ करना होगा।”
2. ‘भंडारी इंजीनियर्स’ (Bhandari Engineers) बनाम ‘दिल्ली केमिकल्स’ (2021) का विधिक टकराव:
- भंडारी इंजीनियर्स का ऐतिहासिक फैसला (एकल पीठ): दिल्ली हाईकोर्ट के एकल पीठ ने भंडारी इंजीनियर्स एंड बिल्डर्स प्रा. लि. मामले में अनिवार्य दिशा-निर्देश जारी किए थे कि मनी डिक्री के निष्पादन में देनदार (Judgment-Debtor) को अपनी संपत्ति, आय, देनदारियों और बैंक खातों का विस्तृत हलफनामा दाखिल करना होगा ताकि डिक्री का त्वरित क्रियान्वयन हो सके।
- खंडपीठ (DB) द्वारा संशोधन और रोक: वर्ष 2021 में दिल्ली केमिकल्स मामले में दो-जजों की खंडपीठ ने एकल पीठ के इस सिद्धांत को यह कहकर खारिज कर दिया कि यह “अच्छा कानून नहीं है” (Not good law) और इसे सभी अदालतों व सभी मनी डिक्रियों पर सामान्य रूप से लागू नहीं किया जा सकता।
- सुप्रीम कोर्ट का रुख: न्यायमूर्ति पारदीवाला ने स्पष्ट किया कि शीर्ष अदालत खंडपीठ के केवल उसी विशिष्ट पैराग्राफ पर विचार करेगी जिसने एकल पीठ के दिशा-निर्देशों को निष्पादक अदालतों के लिए निष्प्रभावी बना दिया था।
निष्पादन आंकड़ों पर पीठ की समीक्षा: गुजरात और केरल अव्वल
पीठ ने न्यायालय मित्र और उनके कनिष्ठ सहयोगी (Junior Advocate) द्वारा तैयार की गई आंकड़ों की विस्तृत रिपोर्ट का अवलोकन किया:
- गुजरात हाईकोर्ट का शानदार प्रदर्शन: अदालत ने दर्ज किया कि गुजरात उच्च न्यायालय ने अपने क्षेत्राधिकार के अधीनस्थ जिला अदालतों में लंबित निष्पादन याचिकाओं के निपटारे में देश भर में सबसे उत्कृष्ट कार्य किया है।
- केरल हाईकोर्ट की प्रशंसा: गुजरात के बाद केरल उच्च न्यायालय ने निष्पादन याचिकाओं के निपटारे में दूसरा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दर्ज किया।
- पीठ ने युवा कनिष्ठ अधिवक्ता द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट और शोध की मुक्तकंठ से सराहना करते हुए उनसे भविष्य में भी अदालत को इसी प्रकार सहयोग प्रदान करने का आग्रह किया।
कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015 में संशोधन और अनअधिसूचित नियमों पर चिंता
पीठ ने वाणिज्यिक विवादों के त्वरित निष्पादन के लिए केंद्र सरकार के विधायी हस्तक्षेप की आवश्यकता को पुनः दोहराया:
- अदालत ने कहा कि केंद्र सरकार को वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 (Commercial Courts Act, 2015) में एक स्पष्ट संशोधन लाना चाहिए।
- संशोधन में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि वाणिज्यिक मुकदमों (Commercial Suits) में डिक्री का निष्पादन ‘कमर्शियल कोर्ट रूल्स’ के अनुसार होगा।
- पीठ ने रेखांकित किया कि ये नियम वर्ष 2021 से अब तक अनअधिसूचित (Unnotified) पड़े हुए हैं, जिससे वाणिज्यिक डिक्रियों का क्रियान्वयन सामान्य सिविल मामलों की तरह ही धीमा बना हुआ है।
- अदालत ने मामले को अगले बुधवार के लिए सूचीबद्ध करते हुए कहा कि वह ऐसे विस्तृत अवलोकन दर्ज करेगी जिससे केंद्र सरकार को आवश्यक संशोधन लाने में सुगमता होगी।
मामले की पृष्ठभूमि: 8.8 लाख निष्पादन याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट का मार्च 2025 का आदेश
- 6 मार्च 2025 का ऐतिहासिक आदेश:
- सुप्रीम कोर्ट ने देश भर की जिला अदालतों में 8.8 लाख से अधिक निष्पादन याचिकाओं के वर्षों से लंबित रहने पर गंभीर चिंता जताते हुए सभी उच्च न्यायालयों से विस्तृत डेटा तलब किया था।
- अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन को एमिकस क्यूरी नियुक्त करते हुए इन याचिकाओं के निपटारे के लिए छह महीने की समय-सीमा (Deadline) तय की थी।
- “डिक्री पाने के बाद शुरू होती है असली लड़ाई”:
- राहुल एस. शाह बनाम जिनेंद्र कुमार गांधी (2021, सुप्रीम कोर्ट) में शीर्ष अदालत ने व्यथा व्यक्त की थी कि भारत में एक वादी की असली परीक्षा मुकदमे में जीत के बाद शुरू होती है, जब उसे अपनी वैध डिक्री का फल पाने के लिए निष्पादन अदालतों के दशकों चक्कर काटने पड़ते हैं।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) का आदेश XXI (Order 21):
- आदेश 21 भारतीय सिविल कानून का सबसे विस्तृत और जटिल भाग है, जो डिक्री के निष्पादन की प्रक्रिया (संपत्ति की कुर्की, नीलामी, गिरफ्तारी आदि) को नियंत्रित करता है।
- नियम 41 देनदार की संपत्ति की मौखिक व दस्तावेजी जांच का प्रावधान करता है, परंतु स्पष्ट और सख्त हलफनामे के प्रारूप के अभाव में देनदार अपनी संपत्तियों को छिपाने में सफल हो जाते हैं।
- CPC की धारा 151 (अदालत की अंतर्निहित शक्तियां – Inherent Powers):
- अदालत को न्याय के उद्देश्य की पूर्ति और न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए कोई भी आवश्यक आदेश पारित करने की अंतर्निहित शक्ति प्राप्त है।
- दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ के संकीर्ण दृष्टिकोण के कारण निचली अदालतें देनदारों से पूर्ण संपत्ति प्रकटीकरण कराने में हिचकिचा रही थीं, जिसे सुप्रीम कोर्ट दुरुस्त करने जा रहा है।
- वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015:
- इस कानून का उद्देश्य व्यापारिक और वाणिज्यिक विवादों का समयबद्ध निस्तारण था। परंतु निष्पादन के नियमों के अधिसूचित न होने से इस विशेष कानून का मूल उद्देश्य विफल हो रहा है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: इन रे: जिला न्यायालयों में सिविल निष्पादन याचिकाओं का त्वरित निस्तारण [सर्वोच्च न्यायालय – विविध कार्यवाही]
- पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 7 अक्टूबर 2026
- अगली सुनवाई: आगामी बुधवार (अक्टूबर 2026)
- विधिक सहभागिता:
- न्यायालय मित्र (Amicus Curiae): वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन (एवं उनके कनिष्ठ सहयोगी)
- परीक्षणाधीन ऐतिहासिक निर्णय:
- भंडारी इंजीनियर्स एंड बिल्डर्स प्रा. लि. बनाम महरिया बिल्डर्स प्रा. लि. (दिल्ली हाईकोर्ट, एकल पीठ) — देनदारों द्वारा संपत्ति प्रकटीकरण का व्यापक प्रारूप।
- दिल्ली केमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल वर्क्स प्रा. लि. (2021, दिल्ली हाईकोर्ट, खंडपीठ) — एकल पीठ के दिशा-निर्देशों को निष्प्रभावी करने वाला निर्णय।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) का आदेश XXI एवं धारा 151 (अंतर्निहित शक्तियां)
- वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 (Commercial Courts Act, 2015)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 142 (पूर्ण न्याय का अधिकार)
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- राहुल एस. शाह बनाम जिनेंद्र कुमार गांधी (2021, 3-जज पीठ, सुप्रीम कोर्ट) — ‘निष्पादन याचिकाओं का 6 महीने के भीतर निस्तारण सुनिश्चित करने हेतु देश की सभी अदालतों के लिए बाध्यकारी दिशानिर्देश।’
- वर्तमान स्थिति: मामला आंशिक सुना गया (Part-heard); सुप्रीम कोर्ट दिल्ली हाईकोर्ट के 2021 के खंडपीठ आदेश के प्रतिकूल प्रभाव को दूर करने और केंद्र सरकार को कमर्शियल कोर्ट्स नियमों को लागू करने हेतु अगले बुधवार को दिशा-निर्देश पारित करेगा।
Money Decrees:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (जस्टिस जे. बी. पारदीवाला एवं जस्टिस के. विनोद चंद्रन) |
| न्यायालय मित्र (Amicus Curiae) | वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन |
| विवाद का कारण | दिल्ली हाईकोर्ट का Delhi Chemicals & Pharmaceutical Works (2021) फैसला, जिसने पहले के मार्गदर्शक दिशानिर्देशों को बदल दिया था |
| सकारात्मक प्रगति | गुजरात और केरल उच्च न्यायालयों ने निष्पादन याचिकाओं के निपटारे में बेहतरीन प्रदर्शन किया |

