कानूनी विवाद का इतिहास
- 2002-2003 में शुरू हुआ विवाद:टीवी टुडे नेटवर्क को 2002 में पता चला कि राजकोट (गुजरात) से ‘सौराष्ट्र आज तक’ नाम से एक अखबार प्रकाशित हो रहा है। टीवी टुडे ने अप्रैल 2003 में दिल्ली की निचली अदालत में पासिंग ऑफ का मुकदमा दायर किया।
- निचली अदालत का 2012 का फैसला:ट्रायल कोर्ट ने अखबार को नाम इस्तेमाल करने की इजाजत दी, बशर्ते वह एक प्रमुख अस्वीकरण (Disclaimer) छापे कि उसका टीवी टुडे के ‘आज तक’ से कोई संबंध नहीं है।
- दिल्ली हाईकोर्ट का निर्णय (30 जुलाई 2026):न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा (Justice Mini Pushkarna) की एकल पीठ ने निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने माना कि:
- ‘आज तक’ शब्द ने 1995 से लगातार इस्तेमाल के जरिए एक विशिष्ट पहचान और द्वितीयक अर्थ (Secondary Meaning) हासिल कर लिया है।
- आगे कोई क्षेत्रीय नाम (जैसे ‘सौराष्ट्र’) जोड़ देने या डिस्क्लेमर छाप देने से ग्राहकों के भ्रमित होने का खतरा खत्म नहीं होता।
- हाईकोर्ट ने अखबार पर स्थायी रोक (Permanent Injunction) लगाते हुए नाम बदलने का आदेश दिया था।
नई दिल्ली: ट्रेडमार्क कानून में सुप्रसिद्ध चिह्नों (Well-Known Trademarks) के संरक्षण, क्षेत्रीय उपसर्ग (Regional Prefix) जोड़कर स्थापित ब्रांड के नाम का दुरुपयोग रोकने, सामान्य कानून के तहत ‘पासिंग ऑफ’ (Passing Off) के सिद्धांतों, तथा भ्रामक समानता (Deceptive Similarity) के मामलों में केवल ‘डिस्क्लेमर’ (अस्वीकरण) छापने की अपर्याप्तता पर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) निर्णय सुनाया है।
‘आज तक’ से मिलता-जुलता या भ्रामक रूप से समान नाम तुरंत बंद करे
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने गुजराती समाचार पत्र ‘सौराष्ट्र आज तक’ द्वारा दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज कर दिया। दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने 30 जुलाई के फैसले में समाचार पत्र को निर्देश दिया था कि वह ‘आज तक’ से मिलता-जुलता या भ्रामक रूप से समान नाम तुरंत बंद करे और नया नाम अपनाए। सर्वोच्च न्यायालय ने हाईकोर्ट के निष्कर्षों में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए इसे ‘पासिंग ऑफ’ का स्पष्ट मामला करार दिया, हालांकि समाचार पत्र को अपनी रीब्रांडिंग (Rebranding) प्रक्रिया पूरी करने के लिए 3 महीने की मोहलत प्रदान की। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित और विशिष्ट पहचान प्राप्त मीडिया ब्रांड के नाम के आगे केवल क्षेत्र का नाम जोड़कर भ्रम पैदा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘पासिंग ऑफ का बिल्कुल स्पष्ट मामला’ न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने समाचार पत्र के शीर्ष पर ‘आज तक’ शब्द के उपयोग को देखते हुए मौखिक टिप्पणी की: “यह पासिंग ऑफ (Passing Off) का एक स्पष्ट और खुला मामला है। इसमें किसी तीसरे पक्ष द्वारा टीवी टुडे नेटवर्क की व्यावसायिक प्रतिष्ठा (Goodwill) का अनुचित लाभ उठाने का सीधा प्रयास झलकता है।”
2. सीजेआई सूर्यकांत की चुटीली टिप्पणी: ‘कल ही नाम सौराष्ट्र रात दिन कर लीजिए’
- जब समाचार पत्र के अधिवक्ता ने अदालत से नाम बदलने की प्रशासनिक प्रक्रिया और अखबार के पंजीकरण नियमों का हवाला देते हुए कम से कम 6 महीने का समय मांगा, तो मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने हल्की-फुल्की टिप्पणी करते हुए कहा:“आप ‘सौराष्ट्र आज तक’ को कल ही बदलकर ‘सौराष्ट्र रात दिन’ (Saurashtra Raat Din) कर सकते हैं। इसके लिए छह महीने की क्या आवश्यकता है?”
- हालांकि, व्यावहारिक कठिनाइयों और प्रकाशन से जुड़े औपचारिक बदलावों को ध्यान में रखते हुए पीठ ने अखबार को नए नाम में परिवर्तन के लिए 3 महीने का समय प्रदान किया।
23 साल पुराने विधिक विवाद की पृष्ठभूमि: 2002 से 2026 तक का सफर
- विवाद की शुरुआत (2002–2003):
- ‘आज तक’ समाचार चैनल का संचालन करने वाली कंपनी टीवी टुडे नेटवर्क (TV Today Network) को वर्ष 2002 में पता चला कि गुजरात के राजकोट से ‘सौराष्ट्र आज तक’ शीर्षक से एक गुजराती दैनिक अखबार का वितरण और प्रसार किया जा रहा है।
- टीवी टुडे ने अप्रैल 2003 में दिल्ली की एक अदालत में ‘पासिंग ऑफ’ और ट्रेडमार्क उल्लंघन का मुकदमा दायर किया।
- ट्रायल कोर्ट का 2012 का त्रुटिपूर्ण फैसला:
- फरवरी 2012 में, दिल्ली की एक ट्रायल कोर्ट ने समाचार पत्र को इस शर्त पर ‘सौराष्ट्र आज तक’ नाम रखने की अनुमति दे दी कि वह अखबार के मुख्य पृष्ठ पर एक प्रमुख ‘डिस्क्लेमर’ (Disclaimer) प्रकाशित करेगा, जिसमें स्पष्ट लिखा होगा कि इस दैनिक का टीवी टुडे के ‘आज तक’ से कोई संबंध नहीं है।
- दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला (30 जुलाई 2026):
- टीवी टुडे नेटवर्क ने ट्रायल कोर्ट के इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी।
- न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा ने ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द करते हुए कहा कि जब कोई चिह्न ‘वेल-नोउन मार्क’ की श्रेणी में आता है, तो केवल एक डिस्क्लेमर छाप देने से भ्रामक समानता और जनता के मन में उत्पन्न होने वाले भ्रम का निवारण नहीं हो सकता।
- हाईकोर्ट ने पाया कि ‘आज तक’ शब्द ने वर्ष 1995 से निरंतर उपयोग के माध्यम से द्वितीयक अर्थ (Secondary Meaning) और असाधारण विशिष्टता हासिल कर ली है।
- केवल एक क्षेत्रीय उपसर्ग (जैसे ‘सौराष्ट्र’) जोड़ देने से आम पाठक को यह भ्रम होने से नहीं रोका जा सकता कि यह गुजराती संस्करण टीवी टुडे का ही एक क्षेत्रीय उपक्रम है।
- हाईकोर्ट ने स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) जारी करते हुए अखबार को पूरी तरह भिन्न नाम अपनाने का आदेश दिया था।
ट्रेडमार्क व पासिंग ऑफ के विधिक सिद्धांत: क्या कहता है कानून?
- पासिंग ऑफ (Passing Off) का सामान्य विधिक सिद्धांत:
- ट्रेडमार्क अधिनियम, 1999 की धारा 27(2) सामान्य विधि के तहत पासिंग ऑफ के उपचार की रक्षा करती है।
- क्लासिक ट्रिनिटी (Classic Trinity) कसौटी:
- प्रतिष्ठा एवं साख (Goodwill): वादी (टीवी टुडे) ने सिद्ध किया कि 1995 से ‘आज तक’ ब्रांड ने व्यापक साख अर्जित की है।
- मिथ्या निरूपण (Misrepresentation): ‘सौराष्ट्र आज तक’ शीर्षक का उपयोग जनता को यह विश्वास दिलाने के लिए पर्याप्त था कि अखबार टीवी टुडे का हिस्सा है।
- संभावित क्षति (Damage): मूल ट्रेडमार्क धारक की विशिष्टता और प्रतिष्ठा का क्षरण (Dilution)।
- डिस्क्लेमर रक्षा नहीं बन सकता:
- सुस्थापित बौद्धिक संपदा न्यायशास्त्र के अनुसार, जहां दो चिह्नों के मुख्य शब्द हूबहू समान हों, वहां किसी छोटे अस्वीकरण या नोट से उपभोक्ता का अवचेतन भ्रम दूर नहीं होता।
- क्षेत्रीय उपसर्ग का प्रभाव:
- यदि कोई ट्रेडमार्क अत्यधिक प्रसिद्ध है, तो उसके आगे किसी शहर, राज्य या क्षेत्र का नाम जोड़ना (उदा. दिल्ली, सौराष्ट्र, मुंबई) दुर्भावनापूर्ण अंगीकरण (Mala Fide Adoption) माना जाता है, जब तक कि प्रतिवादी अपने स्वयं के स्वतंत्र और प्रामाणिक सद्भाव को साबित न कर दे।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: सौराष्ट्र आज तक बनाम टीवी टुडे नेटवर्क [विशेष अनुमति याचिका (सिविल) – सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 7 अक्टूबर 2026
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- ट्रेडमार्क अधिनियम, 1999 (Trade Marks Act, 1999):
- धारा 27(2) (अपरिष्कृत सामान्य विधि अधिकार — पासिंग ऑफ के विरुद्ध कार्रवाई)
- धारा 29 (भ्रामक समानता एवं चिह्नों का अतिलंघन)
- धारा 11 (सुप्रसिद्ध ट्रेडमार्क / Well-known Trademark का संरक्षण)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 136 (विशेष अनुमति याचिका)
- ट्रेडमार्क अधिनियम, 1999 (Trade Marks Act, 1999):
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- कैडिला हेल्थकेयर लिमिटेड बनाम कैडिला फार्मास्यूटिकल्स (2001, सुप्रीम कोर्ट) — ‘व्यापारिक चिह्नों में भ्रामक समानता की जांच आम बोलचाल और सामान्य समझ वाले उपभोक्ता के दृष्टिकोण से की जानी चाहिए।’
- लक्समोबाइल्स बनाम लक्स (सुप्रीम कोर्ट) — ‘स्थापित ट्रेडमार्क के आगे उपसर्ग या प्रत्यय जोड़कर किसी को भ्रम फैलाने और प्रतिष्ठा का दोहन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।’
- अंतिम परिणाम: विशेष अनुमति याचिका खारिज; दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा जारी स्थायी निषेधाज्ञा का आदेश पूरी तरह बरकरार; समाचार पत्र को नया नाम अपनाने के लिए 3 महीने की अंतिम समय-सीमा निर्धारित।
Aaj Tak: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (CJI सूर्यकांत एवं न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची) |
| याचिकाकर्ता | सौराष्ट्र आज तक (राजकोट, गुजरात का एक दैनिक समाचार पत्र) |
| प्रतिवादी | टीवी टुडे नेटवर्क (TV Today Network – ‘आज तक’ की मूल कंपनी) |
| मुख्य कानूनी मुद्दा | ट्रेडमार्क उल्लंघन और पासिंग ऑफ (Passing Off) |
| सुप्रीम कोर्ट का आदेश | याचिका खारिज; अखबार को नाम बदलने के लिए 3 महीने का समय दिया गया। |

