हाईकोर्ट की मुख्य व मार्मिक टिप्पणियां
- “माताओं को भगवान के भरोसे छोड़ दिया जाता है”:अदालत ने अपने आदेश में डॉक्टरों की टालमटोल की कार्यशैली पर कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा:“विशेषकर मेडिकल कॉलेजों से संबद्ध अस्पतालों और जिला अस्पतालों में काम करने वाले पंजीकृत मेडिकल प्रैक्टिशनर MTP अधिनियम, 1971 और 2003 के नियमों के तहत अपनी वैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं करते हैं। इससे व्यथित माताओं को भगवान के भरोसे छोड़ दिया जाता है, जो राहत की तलाश में कानूनी निर्देशों के लिए अदालतों का रुख करने का अतिरिक्त मानसिक संताप और बोझ उठाने पर मजबूर होती हैं।”
- 24 सप्ताह की सीमा और भ्रूण विकृति का नियम (MTP Act Exemption):अदालत ने MTP अधिनियम की धारा 3 की उप-धारा 2-B और धारा 5 की उप-धारा 1 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि:
- MTP एक्ट के तहत सामान्य मामलों में गर्भपात की अधिकतम सीमा 24 सप्ताह निर्धारित है।
- किंतु, यदि भ्रूण में गंभीर शारीरिक या मानसिक असामान्यताएं (Substantial Foetal Abnormalities) पाई जाती हैं या गर्भवती महिला की जान को खतरा हो, तो 24 सप्ताह की यह समय-सीमा लागू नहीं होती है।
- डॉक्टरों के लिए स्पष्ट निर्देश:पीठ ने जोर देकर कहा कि आपातकालीन स्थिति और गंभीर बीमारियों वाले भ्रूण के मामलों में डॉक्टरों को अनावश्यक रूप से मरीजों को वापस नहीं लौटाना चाहिए और न ही हर मामले में कोर्ट का चक्कर कटवाना चाहिए।
श्रीनगर: गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम, 1971 (Medical Termination of Pregnancy Act, 1971 – MTP Act) की धारा 3(2B) और धारा 5(1) के तहत गंभीर भ्रूण असामान्यताओं (Substantial Foetal Abnormalities) में 24 सप्ताह की ऊपरी सीमा से छूट, गर्भवती महिला के जीवन की रक्षा, पंजीकृत चिकित्सकों (RMPs) द्वारा अदालती आदेशों के बिना गर्भपात करने से बचने की प्रशासनिक हिचकिचाहट (Reluctance/Hesitancy of Medical Practitioners), तथा संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार पर जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने एक अत्यंत संवेदनशील और सख्त फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति मोहम्मद यूसुफ वानी की एकल पीठ ने 31 सप्ताह के गर्भ में गंभीर भ्रूण असामान्यताओं से जूझ रही एक गर्भवती महिला और उसके पति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए डॉक्टरों के टालमटोल वाले रवैये पर कड़ी आपत्ति दर्ज की। अदालत ने कहा कि मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों में काम करने वाले डॉक्टर स्पष्ट कानूनी प्रावधान होने के बावजूद अपनी वैधानिक जिम्मेदारियों को निभाने से बचते हैं, जिससे पीड़ित महिलाओं को कानूनी आदेश हासिल करने के लिए अदालतों के चक्कर काटने और अत्यधिक मानसिक प्रताड़ना सहने पर विवश होना पड़ता है। अदालत ने श्रीनगर स्थित लाला डेड अस्पताल (Lalla Ded Hospital) के अधीक्षक को तत्काल एक सक्षम मेडिकल बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘डॉक्टर अपनी वैधानिक जिम्मेदारी नहीं निभाते, माताओं को भगवान के भरोसे छोड़ देते हैं’
न्यायमूर्ति मोहम्मद यूसुफ वानी ने डॉक्टरों की प्रशासनिक उदासीनता पर चिंता व्यक्त करते हुए दर्ज किया: “चिकित्सा महाविद्यालयों से संबद्ध अस्पतालों और अन्य जिला अस्पतालों में कार्यरत पंजीकृत चिकित्सक (RMPs) न्यायसंगत मामलों में MTP अधिनियम, 1971 और 2003 के नियमों के तहत अपनी वैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं करते हैं।
इसके परिणामस्वरूप पीड़ित माताओं को भगवान के भरोसे (Leaving aggrieved mothers at the mercy of God) छोड़ दिया जाता है, जो राहत की तलाश में कानूनी निर्देश प्राप्त करने के लिए अदालतों का दरवाजा खटखटाने और अत्यधिक मानसिक वेदना (Mental Agony) सहने को मजबूर होती हैं।”
2. ‘आपातकालीन मामलों में न्यायिक आदेश की प्रतीक्षा गैर-जरूरी’:
- अदालत ने जोर दिया कि चिकित्सकों को उन आपातकालीन मामलों में प्रक्रिया से अनावश्यक रूप से बचने (Avoid attending emergent cases) की प्रवृत्ति छोड़नी चाहिए, जहां कानून और नियम पहले से पूरी तरह स्पष्ट हैं।
- यदि मेडिकल बोर्ड या विशेषज्ञ डॉक्टरों की राय में भ्रूण में अपरिवर्तनीय गंभीर असामान्यताएं पाई जाती हैं, तो अस्पताल स्तर पर ही निर्णय लिया जाना चाहिए, न कि हर मामले में मरीज को हाईकोर्ट जाने की शर्त थोपी जाए।
3. MTP एक्ट की धारा 3(2B) और 5(1) की विधिक स्थिति:
- हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हालांकि MTP एक्ट के तहत सामान्य गर्भपात की सीमा 24 सप्ताह निर्धारित है, परंतु कानून में इसके स्पष्ट अपवाद शामिल हैं:
- धारा 3(2B): यदि राज्य-स्तरीय मेडिकल बोर्ड द्वारा यह प्रमाणित कर दिया जाता है कि भ्रूण में ‘गंभीर असामान्यताएं’ (Substantial Foetal Abnormalities) हैं, तो 24 सप्ताह की गर्भधारण अवधि का प्रतिबंध लागू नहीं होता।
- धारा 5(1): यदि गर्भवती महिला की जान बचाने के लिए तत्काल गर्भपात आवश्यक हो, तो गर्भावस्था की किसी भी अवधि में गर्भपात की अनुमति है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं कालक्रम
| विवरण | घटनाक्रम एवं तथ्य |
| याचिकाकर्ता | एक विवाहित दंपति, जिन्होंने अजन्मे बच्चे में गंभीर चिकित्सकीय विकृतियां पाए जाने पर अदालत का दरवाजा खटखटाया। |
| गर्भावस्था की अवधि | 31 सप्ताह (31 Weeks Gestational Age)। |
| अस्पताल व डॉक्टरों का रुख | 29 सितंबर 2026 को डॉक्टरों ने अल्ट्रासाउंड व परीक्षणों में भ्रूण में गंभीर असामान्यताएं पाईं, परंतु गर्भावस्था के अग्रिम चरण (31 सप्ताह) का हवाला देकर कहा कि “उच्च न्यायालय के आदेश के बिना गर्भपात नहीं किया जा सकता।” |
| दंपति की विवशता | डॉक्टरों द्वारा सीधे प्रक्रिया से इनकार किए जाने के बाद दंपति को मानसिक तनाव के बीच तत्काल हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर करनी पड़ी। |
| हाईकोर्ट का निर्देश (6 अक्टूबर 2026) | अदालत ने लाला डेड अस्पताल, श्रीनगर के अधीक्षक को निर्देश दिया कि वे तत्काल एक सक्षम विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड का गठन करें जो स्थिति की जांच कर गर्भपात पर त्वरित निर्णय ले। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: MTP अधिनियम का वैधानिक ढांचा
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│ MTP अधिनियम, 1971 (2021 संशोधन उपरांत) के प्रावधान │
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【0 से 20 सप्ताह तक】 【20 से 24 सप्ताह तक】 【24 सप्ताह से अधिक (विशेष श्रेणियां)】
• 1 पंजीकृत डॉक्टर (RMP) की राय। • 2 डॉक्टरों की सहमति; दुष्कर्म • **धारा 3(2B):** मेडिकल बोर्ड द्वारा गंभीर
• मां के शारीरिक/मानसिक स्वास्थ्य पीड़िताओं, नाबालिगों व दिव्यांग भ्रूण असामान्यताओं की पुष्टि पर कोई सीमा नहीं।
को गंभीर क्षति का जोखिम। महिलाओं के लिए लागू। • **धारा 5(1):** महिला का जीवन बचाने के लिए जरूरी।
- सुप्रीम कोर्ट का न्यायशास्त्र (एक्स बनाम दिल्ली स्वास्थ्य सचिव, 2022):
- सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि एक महिला की प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) का अनिवार्य हिस्सा है।
- यदि भ्रूण में जन्मजात असाध्य विकृतियां हैं, तो महिला को बच्चे को जन्म देने के लिए विवश करना उसके मानसिक स्वास्थ्य के प्रति गंभीर क्रूरता है।
- अस्पतालों की हिचकिचाहट का कारण और निवारण:
- डॉक्टर आपराधिक अभियोजन या विधिक विवादों के डर से 24 सप्ताह के बाद निर्णय लेने से कतराते हैं। हाईकोर्ट का यह आदेश स्पष्ट करता है कि जब कानून स्वयं डॉक्टरों और मेडिकल बोर्ड को अधिकार देता है, तो सुरक्षात्मक रवैया अपनाकर नागरिकों को न्यायिक प्रक्रिया में घसीटना वैधानिक कर्तव्य का उल्लंघन है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: दंपति बनाम जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति मोहम्मद यूसुफ वानी (एकल पीठ)
- आदेश की तिथि: 6 अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: अधिवक्ता आसिफ वानी एवं अधिवक्ता ओवैस कादरी
- राज्य / केंद्र शासित प्रदेश की ओर से: वरिष्ठ अतिरिक्त महाधिवक्ता (Sr. AAG) मोहसिन कादरी (अधिवक्ता महा माजिद के साथ)
- संबद्ध अस्पताल: लाला डेड अस्पताल (Lalla Ded Hospital), श्रीनगर
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम, 1971 (MTP Act) — धारा 3(2B) (भ्रूण असामान्यताओं में छूट), धारा 5(1) (जीवन रक्षा हेतु आपातकालीन गर्भपात)
- MTP नियम, 2003 (संशोधित नियम 2021)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (जीवन, स्वास्थ्य और प्रजनन स्वायत्तता का अधिकार) एवं अनुच्छेद 226
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- प्रजनन स्वायत्तता और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा: ‘MTP एक्ट के तहत स्पष्ट वैधानिक अधिकार होने के बावजूद डॉक्टरों द्वारा अदालती आदेश की मांग करना प्रशासनिक विफलता है; गंभीर भ्रूण असामान्यताओं के मामलों में अस्पतालों को स्वयं मेडिकल बोर्ड गठित कर त्वरित निर्णय लेना चाहिए।’
- अंतिम परिणाम: याचिका पर राहत; लाला डेड अस्पताल, श्रीनगर को तत्काल मेडिकल बोर्ड गठित कर 31 सप्ताह के गर्भ के चिकित्सीय समापन पर त्वरित और स्वतंत्र निर्णय लेने का निर्देश।
मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | जम्मू और कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति मोहम्मद यूसुफ वानी |
| गर्भधारण की अवधि | 31 सप्ताह (31 Weeks Gestational Age) |
| कारण | भ्रूण में गंभीर विकृतियों (Substantial Foetal Abnormalities) की पहचान |
| डॉक्टरों का रुख | अस्पताल के डॉक्टरों ने उन्नत चरण का हवाला देकर बिना हाईकोर्ट के आदेश के अबॉर्शन से इनकार किया। |
| हाईकोर्ट का आदेश | लाला देद अस्पताल (Srinagar) के अधीक्षक को तत्काल मेडिकल बोर्ड गठित करने और कानून के अनुसार निर्णय लेने का निर्देश दिया। |

