Friday, October 9, 2026
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Negligent Driving: क्रूर मर्डर को लापरवाही से गाड़ी चलाने का केस बना दिया…दिल्ली पुलिस ऐसा भी कर सकती है क्या, जानिए आईओ का कारनामा

Negligent Driving: बाहरी दिल्ली के शाहबाद डेयरी इलाके में हुए एक हत्याकांड की जांच में पुलिस की संदेहास्पद भूमिका और घोर लापरवाही को लेकर दिल्ली की एक अदालत ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है।

दिल्ली पुलिस कमिश्नर को व्यक्तिगत रूप से समीक्षा करने के दिए निर्देश

न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) भारती बेनीवाल ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर (Commissioner of Police) को व्यक्तिगत रूप से इस मामले की समीक्षा करने और आरोपी जांच अधिकारी (IO), थाना प्रभारी (SHO) तथा अन्य संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्यवाही (Disciplinary Action) शुरू करने का आदेश दिया है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई पर अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) भी तलब की है। शुरुआती दौर से ही पीड़ित परिवार द्वारा जानबूझकर हमला करने और हत्या के प्रयास के लगातार आरोप लगाए जा रहे थे। पीड़ित का मृत्युपूर्व बयान (Dying Declaration) भी मौजूद था। इसके बावजूद पुलिस ने इस क्रूर हत्याकांड को महज एक ‘लापरवाही से वाहन चलाने’ (Rash and Negligent Driving) का सड़क हादसा दिखाने की कोशिश क्यों की? जांच अधिकारियों की इस घोर लापरवाही के कारण मामले के महत्वपूर्ण और अकाट्य साक्ष्य (Vital Evidence) हमेशा के लिए नष्ट हो गए। यह केवल एक प्रक्रियात्मक चूक नहीं, बल्कि न्याय की जड़ पर हमला है।

मामला क्या है?: दम तोड़ने से पहले भाई के कैमरे पर लिया था कातिल का नाम

यह मामला पुलिस प्रशासन की उस कथित ‘लापरवाही’ को उजागर करता है जिसने एक मर्डर मिस्ट्री को एक्सीडेंट में बदलने की कोशिश की।

घटनाक्रम: पीड़ित चंद्रेश उर्फ मोनू 26 जनवरी की सुबह तड़के अपने घर बेहद घायल अवस्था में पहुंचा। उसने अपने परिवार को बताया कि नागेंद्र नाम के व्यक्ति ने उस पर बेरहमी से हमला किया, गाड़ी से उसका पीछा किया और उसे कुचल दिया।

मृत्युपूर्व बयान (वीडियो रिकॉर्डिंग): अस्पताल ले जाते समय मोनू के भाइयों ने उसका एक वीडियो रिकॉर्ड किया, जिसमें वह बार-बार नागेंद्र को अपने हमलावर के रूप में नामित कर रहा था। अस्पताल में 22 दिनों तक जिंदगी और मौत की जंग लड़ने के बाद 16 फरवरी को मोनू ने दम तोड़ दिया।

पुलिस की संदेहास्पद ढिलाई: शाहबाद डेयरी पुलिस ने शुरुआत में इस मामले को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 281 और 125(ए) के तहत दर्ज किया, जो लापरवाही से गाड़ी चलाने और जीवन को खतरे में डालने से जुड़ी हैं। मोनू की मौत के बाद भी पुलिस ने मर्डर की धारा लगाने के बजाय केवल धारा 106 बीएनएस (लापरवाही से मौत का कारण) जोड़ी।

अदालत की तीखी टिप्पणियां: सीनियर अफसरों ने भी आंखें मूंद लीं

पीड़ित के पिता द्वारा दायर एक याचिका (जिसमें अदालत से जांच की निगरानी करने की मांग की गई थी) पर सुनवाई करते हुए मजिस्ट्रेट भारती बेनीवाल ने पुलिस की केस डायरी और सुपरवाइजरी रिपोर्ट की धज्जियां उड़ा दीं।

फॉरेंसिक रिपोर्ट को किया दरकिनार

अदालत ने नोट किया कि मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज की फॉरेंसिक रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया था कि पीड़ित के शरीर पर लगी चोटों में से एक चोट सीधे तौर पर ‘हमले’ (Assault) से मेल खाती है। इसके बावजूद, पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने अपनी सुपरवाइजरी रिपोर्ट में इस वैज्ञानिक राय को नजरअंदाज कर दिया और लिख दिया कि ‘विशेषज्ञ की राय का इंतजार है’।

हत्या (Section 103) के बजाय गैर-इरादतन हत्या (Section 105) क्यों?

कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब मामला सीधे तौर पर सोची-समझी हत्या (धारा 103 BNS) का प्रतीत हो रहा था, तो पुलिस ने इसमें धारा 105 BNS (गैर-इरादतन हत्या) क्यों लगाई? कोर्ट ने कहा कि आईओ 22 दिनों तक अस्पताल में डॉक्टरों से संपर्क करने और पीड़िता का उचित बयान दर्ज कराने में नाकाम रहा, जो कि एक अक्षम्य विफलता है।

दिखावे का कारण बताओ नोटिस नाकाफी

अदालत को जब बताया गया कि आईओ को कारण बताओ नोटिस और एसएचओ से स्पष्टीकरण मांगा गया है, तो कोर्ट ने वरिष्ठ अधिकारियों को फटकार लगाते हुए कहा कि इतने गंभीर मामले में (जहां साक्ष्य हमेशा के लिए खो गए हैं) यह विभागीय खानापूर्ति बेहद अपर्याप्त है। कोर्ट ने वरिष्ठ पर्यवेक्षी अधिकारियों (Senior Supervisory Officers) की भी आलोचना की कि उन्होंने खुद केस रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बजाय मातहतों की रिपोर्ट पर आंख मूंदकर भरोसा कर लिया।

कोर्ट के कड़े निर्देश

मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने निम्नलिखित आदेश जारी किए हैं।

पुलिस कमिश्नर को हस्तक्षेप: आदेश की प्रति सीधे दिल्ली पुलिस कमिश्नर को भेजी जाए ताकि वे व्यक्तिगत रूप से दोषी पुलिसकर्मियों पर विभागीय जांच और कड़ा एक्शन तय करें।

मेडिकल ओपिनियन: पुलिस उपायुक्त (DCP) को निर्देश दिया गया है कि वे डॉक्टरों से एक स्पष्ट और अंतिम मेडिकल राय लें कि क्या पीड़ित को आई चोटें प्रकृति के सामान्य क्रम में मृत्यु का कारण बनने के लिए पर्याप्त थीं।

इस मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई, 2026 को होगी। अदालत में पीड़ित पक्ष की ओर से अधिवक्ता तनुज कुमार शर्मा और राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक प्रमोद कुमार ने पैरवी की।

केस शीट: दिल्ली मजिस्ट्रेट कोर्ट निर्देश (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांअदालत की विधिक स्थिति और निर्देश
संबंधित अदालतजिला अदालत, दिल्ली (JMFC भारती बेनीवाल)
मामले का शीर्षकसोनू बनाम नागेंद्र
संबंधित पुलिस थानाशाहबाद डेयरी पुलिस स्टेशन (बाहरी दिल्ली)
लागू कानून/धाराएंभारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103, 105, 106, 125(a), 281
अदालत का अंतिम निर्देशपुलिस कमिश्नर को व्यक्तिगत जांच का आदेश; दोषी IO और SHO पर कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई के निर्देश।
अगली सुनवाई13 जुलाई, 2026
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