POCSO Case: हाईकोर्ट के जस्टिस सलिल कुमार राय और जस्टिस अजय कुमार द्वितीय की बेंच ने एक नाबालिग पीड़िता के मामले में निचली अदालत के फैसले पर ‘पीड़ा’ व्यक्त की है।
हाई कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता के शरीर पर मिली चोटों और मेडिकल रिपोर्ट का अपने फैसले में जिक्र तक नहीं किया। हाई कोर्ट ने विशेष जज को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 15 अप्रैल को तय की गई है। यह आदेश स्पष्ट करता है कि जजों की जिम्मेदारी केवल गवाहों को सुनना नहीं, बल्कि उपलब्ध वैज्ञानिक और मेडिकल सबूतों का बारीकी से विश्लेषण करना भी है।
हाई कोर्ट की मुख्य आपत्तियां (Key Objections)
- चोटों का जिक्र नहीं: हाई कोर्ट ने नोट किया कि पीड़िता की मेडिकल रिपोर्ट में जांघ, पेट और पीठ पर खरोंच और चोट के निशान थे। साथ ही FSL रिपोर्ट के अनुसार कपड़ों पर खून के निशान भी मिले थे, लेकिन जज ने इनका कोई विश्लेषण नहीं किया।
- डॉक्टर की गवाही: कोर्ट इस बात से हैरान था कि अभियोजन (Prosecution) ने उस डॉक्टर का परीक्षण नहीं किया जिसने मेडिकल जांच की थी। सबसे बड़ी बात यह कि ट्रायल कोर्ट ने भी अपनी शक्ति का इस्तेमाल कर डॉक्टर को ‘कोर्ट गवाह’ के रूप में समन नहीं किया।
- पुराने सर्कुलर का उल्लंघन: हाई कोर्ट ने याद दिलाया कि 1982 और 2002 के सर्कुलर के अनुसार, जजों के लिए यह अनिवार्य है कि वे अपने फैसलों में घायलों की चोटों का विवरण स्पष्ट रूप से दें।
मामले की पृष्ठभूमि (Background)
- घटना: यह मामला 2024 में कुशीनगर जिले में दर्ज हुआ था।
- निचली अदालत का फैसला: 9 अप्रैल, 2025 को विशेष जज ने आरोपी को बरी कर दिया था।
- अपील: उत्तर प्रदेश सरकार ने इस बरी किए जाने के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी।
कोर्ट की तल्ख टिप्पणी
“ट्रायल कोर्ट के फैसले को पढ़ने से प्रथम दृष्टया (Prima Facie) पता चलता है कि मेडिको-लीगल रिपोर्ट पर चर्चा ही नहीं की गई। यह एक प्रासंगिक तथ्य था, जिसकी अनदेखी ने आरोपी को बरी होने में मदद की।”

