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POCSO & Consent: प्यार का मतलब रेप का लाइसेंस नहीं…क्यूं किया कोर्ट ने समझौते’ के बाद भी केस खत्म करने से मना, जान लें

POCSO & Consent: गुवाहाटी हाई कोर्ट ने ‘सहमति’ और ‘प्रेम संबंध’ को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस प्रांजल दास ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि POCSO और रेप जैसे गंभीर अपराधों को ‘निजी विवाद’ मानकर आपसी समझौते से नहीं सुलझाया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी महिला के साथ प्रेम संबंध होने का मतलब यह नहीं है कि पुरुष को उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाने का “लाइसेंस” मिल गया है। कोर्ट ने पीड़िता (जो घटना के वक्त नाबालिग थी) के परिवार और आरोपी के बीच हुए ‘समझौते’ (Compromise) के बावजूद रेप केस को रद्द करने से इनकार कर दिया।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी (License vs. Relationship)

  • अदालत ने प्रेम संबंधों और सहमति के बीच की बारीक रेखा को स्पष्ट किया।
  • जबरन संबंध अपराध है: “भले ही स्त्री और पुरुष रिलेशनशिप में हों, लेकिन यह पुरुष को लड़की के साथ बलात्कार करने का लाइसेंस नहीं देता। भले ही देश में ‘मैरिटल रेप’ (Marital Rape) को अभी अपराध नहीं माना गया है, लेकिन शादी से पहले के प्रेम संबंधों में भी इच्छा के विरुद्ध शारीरिक संबंध बनाना एक आपराधिक कृत्य है।”
  • सहमति का अभाव: कोर्ट ने पाया कि पीड़िता ने आरोपी के साथ प्रेम संबंध की बात तो स्वीकार की थी, लेकिन उसने लगातार इस बात पर जोर दिया कि शारीरिक संबंध उसकी मर्जी के बिना, जबरन बनाए गए थे।

‘समझौते’ को क्यों नहीं माना?

  • आरोपी ने दलील दी थी कि अब लड़की बालिग हो गई है और दोनों परिवारों ने शादी के वादे के साथ समझौता कर लिया है। कोर्ट ने इसे खारिज करने के पीछे 3 बड़े कारण दिए।
  • समाज पर असर: रेप और POCSO एक्ट के तहत आने वाले अपराध केवल दो व्यक्तियों के बीच का झगड़ा नहीं हैं, बल्कि इनका पूरे समाज पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
  • पिता बनाम बेटी: कोर्ट ने नोट किया कि समझौता आरोपी और पीड़िता के पिता के बीच हुआ था। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं था जिससे यह पता चले कि अब बालिग हो चुकी पीड़िता खुद इस समझौते का समर्थन करती है।
  • सुप्रीम कोर्ट की नजीर: कोर्ट ने नरेंद्र सिंह बनाम पंजाब राज्य जैसे फैसलों का हवाला दिया, जिनमें स्पष्ट है कि जघन्य अपराधों (Heinous Offences) में समझौते के आधार पर कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती।

मामला क्या था? (The FIR Timeline)

  • घटना: 29 जनवरी, 2025 को असम में आरोपी ने कथित तौर पर 17 वर्षीय पीड़िता के घर में घुसकर उसके साथ बलात्कार किया और धमकी देकर फरार हो गया।
  • सबूत: पिता ने FIR में बताया कि घटना के समय लड़की के कपड़े फटे हुए थे, जो जबरदस्ती किए जाने की पुष्टि करते हैं।
  • चार्जशीट: पुलिस ने 30 अप्रैल, 2025 को भारतीय न्याय संहिता (BNS) और POCSO एक्ट की धारा 4 के तहत आरोप पत्र दाखिल किया था।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

विषयअदालत का निर्णय
मुख्य तर्क“Love isn’t Consent” (प्यार का मतलब सहमति नहीं है)।
पीड़िता की उम्रघटना के वक्त 17 साल (नाबालिग), इसलिए POCSO अनिवार्य रूप से लागू।
समझौते की स्थितिपरिवार के बीच हुआ समझौता कानूनन अमान्य, क्योंकि अपराध जघन्य है।
नतीजायाचिका खारिज, आरोपी को अब ट्रायल (मुकदमे) का सामना करना होगा।

निष्कर्ष: कानून और नैतिकता का संदेश

गुवाहाटी हाई कोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो ‘शादी का वादा’ या ‘रिलेशनशिप’ की आड़ में सहमति के बिना शारीरिक संबंध बनाने को जायज ठहराते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि एक बार अपराध (विशेषकर नाबालिग के खिलाफ) दर्ज होने के बाद, उसे परिवारों की आपसी रजामंदी से ‘रफा-दफा’ नहीं किया जा सकता।

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