Saturday, July 25, 2026
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Political Witch-Hunting: अदालत में क्यों हारी सांसदों की संपत्ति जांच वाली याचिका? जानिए सुप्रीम कोर्ट की विच-हंटिंग वाली टिप्पणी का सच

Political Witch-Hunting: सुप्रीम कोर्ट ने सांसदों (MPs) की ‘अघोषित’ संपत्ति की चुनिंदा जांच (Selective Probe) कराने से इनकार कर दिया है।

एनजीओ ‘लोक प्रहरी’ के जनहित याचिका पर सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की बेंच एनजीओ ‘लोक प्रहरी’ द्वारा दायर एक अवमानना याचिका (Contempt Petition) पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि केंद्र सरकार ने 2018 के उस फैसले का पालन नहीं किया है, जिसमें जनप्रतिनिधियों की संपत्ति में बेतहाशा बढ़ोतरी की जांच के लिए तंत्र बनाने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने अपने 2018 के ऐतिहासिक फैसले को दोहराते हुए चेतावनी दी कि बिना किसी समान तंत्र (Uniform Mechanism) के केवल कुछ चुनिंदा जनप्रतिनिधियों को निशाना बनाना ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ (Political Witch-Hunting) का रास्ता खोल सकता है।

कोर्ट का मुख्य तर्क: निशाना बनाना गलत

  • अदालत ने साफ किया कि वह किसी एक पक्ष द्वारा दी गई सूची के आधार पर चुनिंदा जांच का आदेश नहीं दे सकती।
  • चुनिंदा जांच: कोर्ट ने कहा कि जब तक सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों की संपत्ति की निगरानी के लिए एक स्थायी और समान तंत्र नहीं बन जाता, तब तक कुछ लोगों के खिलाफ जांच का आदेश देना ‘चयनात्मक’ (Selective) होगा।
  • दुरुपयोग का खतरा: बेंच ने स्पष्ट किया, “इस तरह की चुनिंदा जांच राजनीतिक प्रतिशोध की ओर ले जा सकती है। इसलिए, हम इस स्तर पर इस राहत से इनकार करते हैं।”

केंद्र सरकार का बचाव: नहीं हुई कोई अवमानना

  • केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि 2018 के फैसले की कोई जानबूझकर अवमानना नहीं की गई है।
  • संसदीय बाधाएं: सरकार ने बताया कि इस संबंध में लोकसभा सचिवालय के साथ चर्चा की गई थी। सचिवालय का मानना है कि संसद के भीतर सांसदों की संपत्ति की निगरानी के लिए विशेष सेल बनाना ‘संसदीय प्रथाओं’ के खिलाफ हो सकता है और लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर सकता है।
  • मौजूदा तंत्र: सरकार ने दलील दी कि चुनाव आयोग (EC) और केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के बीच समन्वय और ‘लोकपाल’ जैसे संस्थान पहले से ही विसंगतियों की जांच के लिए मौजूद हैं।

2018 के मूल फैसले का संदर्भ

  • यह पूरा मामला 2015 की एक जनहित याचिका (PIL) से शुरू हुआ था, जिसमें चुनाव सुधारों की मांग की गई थी।
  • भ्रष्ट आचरण: 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि यदि कोई उम्मीदवार अपनी संपत्ति या आय के स्रोत का खुलासा नहीं करता है, तो इसे चुनाव कानून के तहत ‘भ्रष्ट आचरण’ (Corrupt Practice) माना जाएगा।
  • विवाद: याचिकाकर्ता ने कुछ विशिष्ट सांसदों के नाम देकर जांच की मांग की थी, जिसे कोर्ट ने तब भी और अब भी ‘चुनिंदा’ होने के कारण खारिज कर दिया।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
अदालतसुप्रीम कोर्ट (बेंच: जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस विश्वनाथन)।
याचिकाकर्ताएनजीओ ‘लोक प्रहरी’ (सचिव एस. एन. शुक्ला)।
मुख्य निर्णयकेंद्र के खिलाफ अवमानना का मामला नहीं बनता; याचिका बंद।
कोर्ट का रुखजांच ‘यूनिफॉर्म’ होनी चाहिए, ‘सेलेक्टिव’ नहीं।
महत्वपूर्ण टिप्पणीबिना सिस्टम के कार्रवाई ‘पॉलिटिकल विच-हंटिंग’ को बढ़ावा देगी।

पारदर्शिता बनाम निष्पक्षता

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला चुनावी पारदर्शिता और राजनीतिक निष्पक्षता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है। जहाँ एक ओर अदालत ने उम्मीदवारों के लिए संपत्ति का खुलासा अनिवार्य किया है, वहीं दूसरी ओर वह यह भी सुनिश्चित करना चाहती है कि न्यायिक प्रक्रिया का उपयोग किसी भी राजनीतिक दल द्वारा अपने प्रतिद्वंद्वियों को निशाना बनाने के लिए न किया जाए।

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