Tuesday, September 8, 2026
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Justice Delayed: 35 साल और एक भी गवाह नहीं…इस तरह के हालात में एक पुलिस अफसर के ट्रायल पर लगाई रोक, जानिए केस और अन्य वजह

Justice Delayed: सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस के एक अधिकारी के खिलाफ 1989 से लंबित आपराधिक मामले की सुनवाई पर रोक (Stay) लगा दी है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने ‘कैलाश चंद्र कपरी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। बेंच ने संकेत दिया कि वे इतनी लंबी देरी के आधार पर इस पूरी कार्यवाही को ही रद्द (Quash) करने के पक्ष में हैं। कोर्ट ने इस तथ्य पर गंभीर हैरानी जताई कि पिछले 35 वर्षों में अभियोजन पक्ष (Prosecution) के एक भी गवाह की जांच नहीं की गई है।

1989 से अब तक: क्या है मामला?

  • शुरुआत: यह मामला 1989 में प्रयागराज के GRP रामबाग पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई एक FIR से शुरू हुआ था।
  • आरोप: याचिकाकर्ता (पुलिस अधिकारी) पर दंगा करने (147), मारपीट (323), शांति भंग करने के इरादे से अपमान (504) और रेलवे अधिनियम की धारा 120 के तहत आरोप लगाए गए थे।
  • वर्तमान स्थिति: चार्जशीट में कुल 5 आरोपी थे। इनमें से 2 की मृत्यु हो चुकी है, जबकि 2 अन्य को पहले ही बरी (Acquittal) किया जा चुका है क्योंकि अभियोजन पक्ष कोई गवाह पेश नहीं कर सका। केवल यह पुलिस अधिकारी 35 साल बाद भी ट्रायल का सामना कर रहा है।

सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी

  • अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की, जिसने ट्रायल पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।
  • एकमात्र आधार: “इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, विशेष रूप से 35 साल बीत जाने के तथ्य को ध्यान में रखते हुए, हम केवल इसी आधार पर कार्यवाही को रद्द करने के इच्छुक हैं।”
  • राज्य से जवाब तलब: हालांकि, कोई भी अंतिम आदेश पारित करने से पहले कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर उनका पक्ष पूछा है।

निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार (Right to Speedy Trial)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘स्पीडी ट्रायल’ (त्वरित सुनवाई) एक मौलिक अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कई फैसलों में कहा है कि यदि बिना किसी वैध कारण के दशकों तक मुकदमा चलता रहता है, तो यह आरोपी के प्रति अन्याय है और न्याय की विफलता है।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
मामला दर्ज होने का वर्ष1989 (35 साल पुराना)।
मुख्य समस्यासाढ़े तीन दशक में एक भी गवाह (Prosecution Witness) का न होना।
अदालत का रुखकार्यवाही पर रोक (Stay) और राज्य को नोटिस।
अगली सुनवाई29 अप्रैल, 2026

सिस्टम की जवाबदेही पर सवाल

यह मामला उत्तर प्रदेश के निचले स्तर के अभियोजन तंत्र (Prosecution Machinery) की भारी विफलता को दर्शाता है। जब दो सह-आरोपियों को गवाह न होने के कारण पहले ही बरी किया जा चुका है, तब भी एक ही मामले को 35 साल तक खींचना न केवल संसाधनों की बर्बादी है, बल्कि आरोपी के मानसिक और पेशेवर जीवन पर भी एक बड़ा बोझ है। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप यह सुनिश्चित करने के लिए है कि ‘न्याय की प्रक्रिया’ खुद ही ‘सजा’ न बन जाए।

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