Prisoner Release: दिल्ली हाई कोर्ट ने 22 साल से जेल में बंद एक कैदी की समय पूर्व रिहाई (Premature Release) का आदेश देते हुए सरकारी तंत्र पर बेहद तीखी टिप्पणी की है।
हाईकोर्ट के जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने सेंटेंस रिव्यू बोर्ड (SRB) द्वारा 2016 से 2024 के बीच कैदी की समय पूर्व रिहाई की अर्जी को बार-बार खारिज करने पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने बोर्ड के फैसलों को “कॉपी-पेस्ट” औपचारिकता करार दिया। अदालत ने कहा कि सरकारी मशीनरी के लोकतांत्रिक और यांत्रिक (Mechanical) कामकाज ने एक इंसान को ‘अदृश्य अस्तित्व’ (Invisible Existence) में बदल दिया।
सिस्टम की “अलोकतांत्रिक” कार्यप्रणाली
- अदालत ने SRB की बैठकों के तरीके पर सवाल उठाते हुए कहा।
- अनदेखी: “एसआरबी की बैठकें जिस तरह से हो रही हैं, वह रिहाई के कारकों के प्रति पूर्ण उपेक्षा दर्शाती हैं। अधिकारी के लिए कैदी केवल एक फाइल या नाम बनकर रह गया है।”
- अदृश्य अस्तित्व: कोर्ट ने मर्माहत होकर कहा कि सरकारी मशीनरी के इस अलोकतांत्रिक कामकाज में उस व्यक्ति का जीवन और उसका अस्तित्व पूरी तरह से ‘गायब’ रहा।
- भीड़ में गुम: एक ही बैठक में 100 से अधिक मामलों पर निर्णय लेने की प्रक्रिया को कोर्ट ने “समझ से परे” बताया।
कैदी का सुधरा हुआ आचरण (Reformation & Conduct)
- हाई कोर्ट ने नोट किया कि 2003 के एक यौन अपराध मामले में सजा काट रहे इस व्यक्ति ने जेल में अनुकरणीय बदलाव दिखाया था।
- बहुमुखी कार्य: जेल में रहने के दौरान उसने वेल्डिंग, लंगर ड्यूटी, योग प्रशिक्षण और जेल कैंटीन प्रबंधन जैसे कई काम किए।
- योग ट्रेनर: उसके पास योग प्रशिक्षण का प्रमाण पत्र (2018) भी है और वह जेल में अन्य कैदियों को योग सिखाता था।
- समाज में वापसी की इच्छा: कोविड-19 के दौरान पैरोल पर बाहर रहने पर उसने ई-रिक्शा चलाकर सम्मानजनक आजीविका कमाई और समय पर सरेंडर किया।
‘अनुच्छेद 21’ का उल्लंघन
- कोर्ट ने साफ किया कि जब कोई कैदी पूरी तरह सुधर चुका हो, तो उसे रिहाई के लाभ से वंचित रखना अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है।
- सजा की अवधि: कैदी ने 22 साल 5 महीने की वास्तविक सजा काट ली थी (छूट मिलाकर 28 साल से अधिक)।
- बैलेंसिंग एक्ट: कोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत सुधार और समाज के कल्याण के बीच संतुलन बनाते हुए, यह मामला रिहाई के लिए पूरी तरह उपयुक्त है।
- भूल गए अधिकारी: सोशल वेलफेयर विभाग और चीफ प्रोबेशन ऑफिसर ने कई बार रिहाई की सिफारिश की थी, लेकिन पुलिस और प्रशासन ने केवल “अपराध की गंभीरता” का हवाला देकर उसे बार-बार खारिज किया।
Timeline of the Case (2003-2026)
| वर्ष | घटनाक्रम |
|---|---|
| जनवरी 2003 | गिरफ्तारी (3.5 साल की बच्ची के साथ यौन शोषण का आरोप)। |
| दिसंबर 2005 | ट्रायल कोर्ट द्वारा उम्रकैद की सजा। |
| 2016 – 2024 | रिहाई के लिए 10 बार आवेदन, हर बार SRB द्वारा खारिज। |
| अप्रैल 2026 | दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा तत्काल रिहाई का आदेश। |
निष्कर्ष: सुधार का मौका देना जरूरी
यह फैसला जेल सुधार (Prison Reform) की दिशा में एक बड़ा कदम है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि सजा का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि सुधार करना भी है। यदि कोई व्यक्ति दो दशकों के बाद खुद को बदल चुका है, तो सिस्टम को उसकी “अदृश्य” फाइलों से परे जाकर उसके “मानवीय अस्तित्व” को पहचानना होगा।

