Monday, August 31, 2026
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Live-in Protection: पसंद का साथी चुनना हर किसी का अधिकार…इस तरह शादीशुदा पुरुष- लिव-इन पार्टनर को दी सुरक्षा, यह केस है अहम

Live-in Protection:पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार (Article 21) को सर्वोपरि रखते हुए एक महत्वपूर्ण आदेश दिया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस रुपिंदरजीत चहल ने एक लिव-इन कपल की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। कपल ने अपने परिजनों और रिश्तेदारों से जान का खतरा बताते हुए सुरक्षा की मांग की थी। कोर्ट ने रिश्ते की वैधता (Legality) पर टिप्पणी किए बिना सुरक्षा सुनिश्चित करने को कहा। कोर्ट ने एक ऐसे लिव-इन जोड़े को पुलिस सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया है, जिसमें पुरुष पहले से शादीशुदा है और उसके दो बच्चे हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का अपने साथी को चुनने का अधिकार उसकी वैधानिक स्थिति से ऊपर है।

संविधान का अनुच्छेद 21: जीवन और स्वतंत्रता (Life & Liberty)

  • बुनियादी अधिकार: “जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा भारतीय संविधान की एक बुनियादी विशेषता है। हर वयस्क व्यक्ति को अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार है।”
  • नैतिकता बनाम कानून: कोर्ट ने ‘इशरत बानो बनाम पंजाब राज्य’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि जब मामला जीवन की सुरक्षा का हो, तो कोर्ट को रिश्ते की वैधता या आपराधिक मामलों में उलझे बिना तुरंत सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)

  • चिकाकर्ता: पुरुष (जन्म 1988) पहले से विवाहित है और उसके दो बच्चे हैं। महिला (जन्म 2001) उसके साथ लिव-इन में रह रही है।
  • खतरा: जोड़े का आरोप था कि उनके रिश्ते से नाखुश रिश्तेदार उन्हें नुकसान पहुँचा सकते हैं।
  • दलील: याचिकाकर्ता के वकील ने ‘प्रदीप सिंह बनाम हरियाणा राज्य’ और अन्य फैसलों का उदाहरण दिया, जहाँ तलाक की अर्जी खारिज होने के बावजूद लिव-इन जोड़ों को सुरक्षा दी गई थी।

‘वैधता’ पर कोर्ट का रुख (Legality of Relationship)

  • अदालत ने यह स्पष्ट किया कि सुरक्षा देने का अर्थ रिश्ते को ‘कानूनी’ घोषित करना नहीं है।
  • पुलिस को निर्देश: कोर्ट ने अमृतसर के पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया कि वे जोड़े के खतरे का आकलन करें और कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करें।
  • अदालत की टिप्पणी: यदि कोर्ट को प्रथम दृष्टया (Prima Facie) लगता है कि रिश्तेदारों से खतरा है, तो सुरक्षात्मक निर्देश जारी करना कोर्ट की जिम्मेदारी है, भले ही रिश्ते की कानूनी स्थिति कुछ भी हो।

Comparisons of Recent Live-in Relationship Rulings

हाई कोर्टकोर्ट का रुख/फैसला
पंजाब और हरियाणा HCजीवन की सुरक्षा सर्वोपरि है; विवाहित होने के बावजूद लिव-इन जोड़े को सुरक्षा दी।
इलाहाबाद HC (Division Bench)“नैतिकता और कानून को अलग रखना होगा”; वयस्क के साथ लिव-इन में रहना अपराध नहीं।
इलाहाबाद HC (Single Bench)बिना तलाक लिए दो शादीशुदा व्यक्ति लिव-इन में नहीं रह सकते (सुरक्षा याचिका खारिज)।

निष्कर्ष: सुरक्षा का अधिकार सार्वभौमिक है

यह फैसला एक बार फिर स्थापित करता है कि भारत में ‘जीवन का अधिकार’ (Right to Life) अत्यंत व्यापक है। कोर्ट का मानना है कि किसी व्यक्ति के आचरण को ‘अनैतिक’ माना जा सकता है, लेकिन इसके आधार पर उसे शारीरिक नुकसान पहुँचने की अनुमति नहीं दी जा सकती। पुलिस का प्राथमिक कर्तव्य किसी भी व्यक्ति की जान बचाना है, चाहे उसका व्यक्तिगत जीवन कैसा भी हो।

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