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Privacy First: रेप पीड़िता की पहचान उजागर करना ‘प्रतिष्ठा की हत्या’ के समान…हाईकोर्ट्स को कड़ी हिदायत दी गई

Privacy First: सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर यौन अपराधों (Sexual Offences) की उत्तरजीवियों (Survivors) की गोपनीयता को लेकर कड़ा रुख अपनाया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने देश की सभी हाई कोर्ट्स और निचली अदालतों को आदेश दिया है कि वे सुनिश्चित करें कि बलात्कार पीड़ितों और उनके परिवार के सदस्यों के नाम अदालती आदेशों में बिल्कुल न लिखे जाएं। कोर्ट ने कड़े शब्दों में उस लापरवाही की निंदा की है, जिसमें अदालती आदेशों और रिकॉर्ड में नाबालिग पीड़िता की पहचान उजागर कर दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला याद दिलाता है कि न्याय केवल अपराधी को सजा देना नहीं है, बल्कि पीड़ित की गरिमा और उसके भविष्य की रक्षा करना भी है। नाम उजागर करना पीड़िता को दोबारा मानसिक आघात पहुंचाने जैसा है।

कोर्ट की नाराजगी: लापरवाही और संवेदनहीनता

  • सुप्रीम कोर्ट ने पहचान उजागर होने के पीछे दो मुख्य कारण बताए।
  • अदालतों की उदासीनता: निचली अदालतों द्वारा नियमों का पालन न करना।
  • जागरूकता की कमी: इस बात का अहसास न होना कि ऐसी पहचान उजागर होने से पीड़ित को समाज में कितनी गहरी कलंक (Stigma) और प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है।

ऐतिहासिक संदर्भ: कानून क्या कहता है?

  • अदालत ने याद दिलाया कि पीड़ितों की सुरक्षा के लिए कानून में पहले से कड़े प्रावधान हैं।
  • Section 228A IPC: यह धारा यौन अपराधों के पीड़ितों की पहचान उजागर करने पर रोक लगाती है। इसका उल्लंघन करना खुद एक अपराध है।
  • 1983 का संशोधन: विधायिका ने 1983 में IPC में बदलाव किए थे ताकि पीड़ितों को सामाजिक बहिष्कार और प्रतिष्ठा की हानि से बचाया जा सके।
  • निपुण सक्सेना केस (2018): सुप्रीम कोर्ट ने इस लैंडमार्क फैसले में साफ कहा था कि कोई भी व्यक्ति (प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक या सोशल मीडिया) पीड़िता का नाम या ऐसी कोई जानकारी प्रकाशित नहीं कर सकता जिससे उसकी पहचान सार्वजनिक हो सके।

मामला क्या था? (The Context)

  • यह टिप्पणी हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के एक फैसले को पलटते हुए आई।
  • मामला: एक 9 साल की बच्ची के साथ बलात्कार का मामला था।
  • HC का रुख: हाई कोर्ट ने छोटी-मोटी विसंगतियों (Discrepancies) के आधार पर आरोपी की सजा को रद्द कर दिया था।
  • SC का कड़ा स्टैंड: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोर्ट के रिकॉर्ड में पीड़िता का नाम किसी भी अन्य गवाह की तरह ‘फ्री’ इस्तेमाल किया गया है, जो कानून की मंशा के खिलाफ है।

भविष्य के लिए निर्देश

बेंच ने निर्देश दिया है कि इस फैसले की एक प्रति सभी हाई कोर्ट्स के रजिस्ट्रार जनरल को भेजी जाए ताकि भविष्य में किसी भी आदेश में पीड़िता का नाम न आए। अदालती कार्यवाही के दौरान गोपनीयता के मानकों का सख्ती से पालन हो।

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