सुप्रीम COURT की मुख्य टिप्पणियां और निष्कर्ष
- “त्रिमूर्ति की भूमिका संदेहास्पद” (Questionable Triumvirate):शीर्ष अदालत ने यस बैंक, उसके प्रशासक और नियामक RBI की भूमिका पर सवाल उठाते हुए अपने फैसले में कहा:“₹8,514 (8,415) करोड़ से अधिक मूल्य के बांड्स से निपटने के इस पूरे मामले में RBI, प्रशासक और यस बैंक की त्रिमूर्ति का रवैया, सौम्य शब्दों में कहें तो, पूरी तरह संदेहास्पद है।”
- खुदरा (Retail) निवेशकों को हाई-रिस्क बांड बेचना:अदालत ने पाया कि RBI के दिशानिर्देशों के बावजूद यस बैंक ने व्यक्तिगत/खुदरा निवेशकों को लुभाकर ये उच्च-जोखिम वाले बांड बेचे। कोर्ट ने 28 दिसंबर 2016 के एक ईमेल का हवाला दिया, जिसमें यस बैंक के अधिकारियों द्वारा व्यक्तिगत निवेशकों को बांड्स की बिक्री का प्रस्ताव दिया गया था। पीठ ने कहा कि ऐसे जोखिम भरे वित्तीय उपकरणों में निवेशकों को फंसाने से पहले कड़ी जांच की जानी चाहिए थी।
- प्रशासक (Administrator) के पास अधिकार नहीं था:अदालत ने स्पष्ट किया कि जब केंद्र सरकार ने 13 मार्च 2020 को यस बैंक की अंतिम पुनर्गठन योजना स्वीकृत की, तो उसमें से बांड्स को राइट-ऑफ करने का प्रावधान सोच-समझकर हटा दिया गया था। इसके बावजूद अगले ही दिन (14 मार्च) प्रशासक द्वारा बांड्स को बट्टे खाते में डालना कानूनन गलत और उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर था।
- प्रशासनिक कमियों का खामियाजा निवेशक क्यों भुगतें?पीठ ने टिप्पणी की कि बैंक और नियामक की विफलता या प्रशासनिक खामियों का खामियाजा आम निवेशकों पर डालना पूरी तरह से अन्यायपूर्ण और अनुचित है।
नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 और बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 के तहत केंद्रीय बैंक के विनियामक पर्यवेक्षण (Regulatory Oversight), बेसल-III पूंजी पर्याप्तता मानदंडों के तहत सामान्य इक्विटी टियर 1 (CET1) अनुपात का खतरनाक स्तर तक गिरना, व्यक्तिगत व खुदरा निवेशकों (Retail Investors) को उच्च जोखिम वाले अतिरिक्त टियर-1 (AT1) बॉन्ड गलत तरीके से बेचना (Misselling of High-Risk Bonds), तथा संकटग्रस्त बैंक के पुनर्गठन के दौरान आरबीआई, प्रशासक और बैंक प्रबंधन की विधिक भूमिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक विधिक टिप्पणी की है।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने गुरुवार (15 अक्टूबर 2026) को बॉम्बे उच्च न्यायालय के उस फैसले को पूरी तरह बरकरार रखा, जिसने 14 मार्च 2020 को यस बैंक के ₹8,415 करोड़ के AT1 बॉन्ड्स को शून्य/बट्टेखाते में डालने (Write-down/Write-off) के आदेश को खारिज कर दिया था। शीर्ष अदालत ने न केवल बैंक और प्रशासक के फैसले को अधिकारिता-विहीन माना, बल्कि देश के बैंकिंग नियामक—भारतीय रिजर्व बैंक (RBI)—की कार्यप्रणाली पर भी कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि जब बैंक की वित्तीय स्थिति चरमरा रही थी और कार्यप्रणाली संदिग्ध थी, तब आरबीआई एक “मूकदर्शक” (Mere Bystander) बना रहा।
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं तीखी टिप्पणियां
1. ‘जब CET1 अनुपात गिरकर 0.6% हो गया, तब RBI मूकदर्शक बना रहा’
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने केंद्रीय बैंक के विनियामक ढीलेपन पर सवाल उठाते हुए दर्ज किया: “आरबीआई एक मूकदर्शक (Mere Bystander) बना रहा, जिसने यस बैंक के सामान्य इक्विटी टियर-1 (CET1) अनुपात को गिरकर 0.6% के चौंकाने वाले निचले स्तर तक जाने दिया, जबकि उस दौरान यस बैंक का कारोबार गुप्त/संदिग्ध तरीके से (Clandestine manner) चलाया जा रहा था। बैंक के कामकाज में गंभीर अनियमितताएं बहुत पहले ही सामने आ चुकी थीं और उसके कुछ अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाहियां भी शुरू की गई थीं। किंतु, इन प्रशासनिक चूकों (Administrative lapses) का खामियाजा निवेशकों पर डालना पूरी तरह से अनुचित और अन्यायपूर्ण होगा।”*
2. RBI, प्रशासक और यस बैंक की ‘त्रिमूर्ति’ की संदिग्ध भूमिका:
पीठ ने पुनर्गठन के दौरान 8,415 करोड़ रुपये से अधिक के बॉन्ड्स को समाप्त करने के तरीके को अत्यंत संदिग्ध करार दिया: “आरबीआई, प्रशासक और स्वयं यस बैंक की त्रिमूर्ति (The Triumvirate of the RBI, the Administrator, and YES BANK) द्वारा 8,415 करोड़ रुपये से अधिक के बॉन्ड्स से निपटने के पूरे मामले का संचालन—हल्के शब्दों में कहें तो—पूरी तरह से संदिग्ध (Questionable) है।”
3. खुदरा निवेशकों को उच्च जोखिम वाले बॉन्ड्स की बिक्री (Misselling to Retail Investors):
- अदालत ने पाया कि यस बैंक ने आरबीआई के उन दिशा-निर्देशों का खुला उल्लंघन किया, जो खुदरा या व्यक्तिगत निवेशकों को ऐसे अत्यधिक जोखिम वाले जटिल वित्तीय उत्पादों को बेचने पर प्रतिबंध लगाते हैं।
- पीठ ने चेन्नई में यस बैंक के एक वरिष्ठ प्रबंधक और वित्तीय सलाहकार द्वारा 28 दिसंबर 2016 को भेजे गए ईमेल का संज्ञान लिया, जिसके जरिए व्यक्तिगत निवेशकों को लुभाकर AT1 बॉन्ड बेचे गए थे।
- अदालत ने टिप्पणी की:“व्यक्तिगत निवेशकों को ऐसी उच्च-जोखिम वाली प्रतिभूतियों की ओर लुभाने से पहले अत्यधिक सख्त जांच-पड़ताल (Tighter scrutiny) की जानी चाहिए थी।”
4. सरकार द्वारा योजना से हटाने के बाद प्रशासक का मनमाना फैसला:
- अदालत ने रेखांकित किया कि केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित प्रारंभिक मसौदा योजना में AT1 बॉन्ड्स को स्थायी रूप से राइट-ऑफ करने का क्लॉज मौजूद था।
- परंतु, निवेशकों की आपत्तियों के बाद सरकार ने अंतिम स्वीकृत योजना (Final Reconstruction Scheme, dated March 13, 2020) से इस प्रावधान को सचेत रूप से हटा (Consciously deleted) दिया था।
- इसके बावजूद, 14 मार्च 2020 को प्रशासक ने बॉन्ड्स को समाप्त कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा:“यदि सरकार द्वारा प्रावधान को सचेत रूप से हटाए जाने के बावजूद प्रशासक को बॉन्ड राइट-ऑफ करने की अनुमति दी जाती, तो यह सरकार को जनता के साथ कपट करने (Committing a fraud on the public) और गुप्त रूप से कार्य करने के आरोपों के घेरे में ला खड़ा करता।”
- अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि सरकार की ऐसी कोई कपटपूर्ण मंशा नहीं थी, किंतु प्रशासक ने इस गलत धारणा में काम किया कि योजना लागू होने के बाद भी उनके पास बॉन्ड्स को समाप्त करने की शक्ति बची हुई थी।
5. ‘वित्तीय अनिवार्यता’ स्थापित प्रक्रिया के उल्लंघन का आधार नहीं बन सकती:
- अदालत ने स्पष्ट किया कि नियामक ढांचे में कुछ परिस्थितियों में AT1 बॉन्ड्स को राइट-डाउन करने का प्रावधान हो सकता है, परंतु यह शक्ति केवल सक्षम प्राधिकारी द्वारा और निर्धारित विधिक प्रक्रिया के तहत ही प्रयोग की जानी चाहिए।
- बैंक को वित्तीय संकट से उबारने की ‘आर्थिक अनिवार्यता’ कानून और स्थापित प्रक्रिया से भटकने का वैध बहाना नहीं हो सकती।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विधिक घटनाक्रम
| तिथि / चरण | घटनाक्रम एवं तथ्य |
|---|---|
| 28 दिसंबर 2016 | यस बैंक के अधिकारियों द्वारा व्यक्तिगत और खुदरा निवेशकों को ईमेल भेजकर उच्च जोखिम वाले AT1 बॉन्ड बेचे गए (मिस-सेलिंग)। |
| 5 मार्च 2020 | वित्तीय स्थिति बदतर होने और CET1 अनुपात 0.6% पर आने के बाद केंद्र सरकार ने मोराटोरियम लगाया और आरबीआई ने बोर्ड को निलंबित कर प्रशासक नियुक्त किया। |
| प्रारूप योजना (Draft Scheme) | आरबीआई के ड्राफ्ट में AT1 बॉन्ड राइट-ऑफ का खंड था, जिसका निवेशकों ने पुरजोर विरोध किया। |
| 13 मार्च 2020 (अंतिम योजना) | केंद्र सरकार ने ‘यस बैंक लिमिटेड पुनर्गठन योजना, 2020’ अधिसूचित की; बॉन्ड राइट-ऑफ का प्रावधान अंतिम अधिसूचना से पूरी तरह हटा दिया गया। |
| 14 मार्च 2020 | अंतिम योजना में अधिकार न होने के बावजूद प्रशासक ने स्टॉक एक्सचेंजों को सूचित किया कि ₹8,415 करोड़ के AT1 बॉन्ड स्थायी रूप से बट्टेखाते में डाल दिए गए हैं। |
| 20 जनवरी 2023 (बॉम्बे HC) | बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक्सिस ट्रस्टीशिप और निवेशकों की याचिका स्वीकार करते हुए राइट-ऑफ को अधिकारिता-विहीन करार देकर रद्द किया। |
| 15 अक्टूबर 2026 (सुप्रीम कोर्ट) | शीर्ष अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट का निर्णय बरकरार रखा; यस बैंक, आरबीआई और केंद्र सरकार की अपीलें खारिज। |
विधिक एवं विनियामक विश्लेषण: बैंकिंग न्यायशास्त्र
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│ यस बैंक AT1 बॉन्ड विवाद: विधिक पदानुक्रम │
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【आरबीआई का विनियामक दायित्व】 【केंद्र सरकार की अंतिम योजना】 【प्रशासक की विधिक सीमा】
• CET1 अनुपात का गिरना प्रणालीगत • धारा 45(7) के तहत स्वीकृत अंतिम • पुनर्गठित योजना लागू होने के बाद
जोखिम था; समय पर सुधारात्मक योजना में राइट-ऑफ क्लॉज नहीं था। प्रशासक के पास नीतिगत या एकतरफा
कार्रवाई (PCA) में विफलता। • अंतिम योजना प्रशासक व बैंक पर बाध्य। पूंजी समाप्ति की शक्ति शेष नहीं थी।
- सामान्य इक्विटी टियर 1 (CET1) और बेसल-III मानक:
- बेसल-III नियमों के अनुसार बैंकों को न्यूनतम पूंजी बफर बनाए रखना होता है। जब यस बैंक का पूंजी आधार सिकुड़ रहा था और एनपीए बढ़ रहे थे, तब त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई (Prompt Corrective Action – PCA) लागू करने में देरी विनियामक असफलता मानी गई।
- अधिकारिता का सिद्धांत (Doctrine of Ultra Vires):
- किसी भी प्रशासक या सांविधिक प्राधिकारी की शक्तियां उस वैधानिक योजना से ही उत्पन्न होती हैं जिसके तहत उसे नियुक्त किया गया है। जब केंद्र सरकार ने अंतिम योजना से बॉन्ड समाप्त करने का अधिकार बाहर कर दिया, तो 14 मार्च 2020 का प्रशासक का आदेश सीधे तौर पर ‘अधिकारिता-विहीन’ (Ultra Vires) और अमान्य था।
विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता
- केस संदर्भ: यस बैंक लिमिटेड बनाम एक्सिस ट्रस्टीशिप सर्विसेज लिमिटेड व अन्य [सिविल अपील – सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह (खंडपीठ)
- फैसले की तिथि: 15 अक्टूबर 2026
- संबद्ध निचली अदालत: बॉम्बे उच्च न्यायालय (फैसला दिनांक: 20 जनवरी 2023)
- विवादित वित्तीय राशि: ₹8,415 करोड़ (अतिरिक्त टियर-1 बॉन्ड्स)
प्रमुख विधिक प्रतिनिधित्व:
- यस बैंक और प्रशासक की ओर से:
- वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान और वरिष्ठ अधिवक्ता बलबीर सिंह
- शार्दुल अमरचंद मंगलदास की विधिक टीम (अधिवक्ता शैली भसीन, वीणा शिवरामकृष्णन, सिद्धांत कांत, प्रतीक गुप्ता, प्रतीक यादव व अन्य)।
- भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से:
- भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) राघव शंकर (अधिवक्ता विवेक शेट्टी, निशांत उपाध्याय व अन्य के साथ)।
- बॉन्डधारकों और प्रतिवादियों (एक्सिस ट्रस्टीशिप आदि) की ओर से:
- वरिष्ठ अधिवक्ता सी.ए. सुंदरम, नीरज किशन कौल, अभिषेक मनु सिंघवी, रितिन राय और रेखा पल्ली (अधिवक्ता सुनील तिलोकचंदानी, हिमालय चौधरी, श्रवण पेठे, सानिध्य कुमार, महेश अग्रवाल, ऋषि अग्रवाल, कमलदीप दयाल व अन्य के साथ)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 — धारा 45 (बैंकों का पुनर्गठन और समामेलन)
- भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 — विनियामक और पर्यवेक्षी शक्तियां
- आरबीआई मास्टर सर्कुलर (बेसल-III पूंजी विनियम) — अतिरिक्त टियर-1 बॉन्ड्स की बिक्री व निर्गमन के नियम
- अंतिम परिणाम: यस बैंक, आरबीआई और केंद्र सरकार की सभी अपीलें खारिज; बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश पूरी तरह बहाल; ₹8,415 करोड़ के AT1 बॉन्ड्स को राइट-डाउन करने का 14 मार्च 2020 का निर्णय अवैध घोषित।
RBI & Yes Bank: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता एवं न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह |
| मुख्य मुद्दा | यस बैंक पुनर्गठन (मार्च 2020) के दौरान ₹8,415 करोड़ के AT-1 बांड्स को प्रशासक द्वारा शून्य (Write-off) घोषित करना। |
| कोर्ट का कड़ा रुख | 1. RBI की ढिलाई और यस बैंक द्वारा रिटेल/खुदरा निवेशकों को गुमराह करके हाई-रिस्क बांड बेचने पर फटकार। 2. बॉम्बे हाईकोर्ट का जनवरी 2023 का फैसला बरकरार; बांड्स राइट-ऑफ रद्द ही रहेगा। |
| पक्षकारों के वकील | यस बैंक: वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान व बलबीर सिंह RBI: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता बांडधारक: वरिष्ठ अधिवक्ता सी.ए. सुंदरम, अभिषेक मनु सिंघवी व नीरज किशन कौल |

