हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश
- सुप्रीम कोर्ट का 2020 का ऐतिहासिक आदेश:केरल हाईकोर्ट ने 14 अक्टूबर 2026 को दिए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के 2020 के उस निर्देश का हवाला दिया, जिसमें शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों को निर्देश दिया था कि पोक्सो (POCSO) मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए गठित विशेष अदालतों में केवल पोक्सो मामलों के लिए समर्पित एक्सक्लूसिव पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (Exclusive Public Prosecutors) नियुक्त किए जाएं। पोक्सो वकीलों से अन्य कोई भी गैर-पोक्सो मामला संचालित न कराया जाए।
- 6 सप्ताह में नियुक्ति का अल्टीमेटम:हाईकोर्ट ने केरल सरकार को 6 सप्ताह की समयावधि के भीतर राज्य की सभी पोक्सो अदालतों में विशेष और समर्पित वकीलों की नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने का कड़ा निर्देश दिया है।
- 13 नए पोक्सो कोर्ट और इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार:रजिस्ट्रार (जिला न्यायपालिका) के हलफनामे का संज्ञान लेते हुए, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को एर्नाकुलम जिला छोड़कर केरल के प्रत्येक जिले में 13 अतिरिक्त स्थायी पोक्सो विशेष अदालतें (Permanent POCSO Special Courts) स्थापित करने पर विचार करने के लिए कहा। साथ ही, राज्य को पोक्सो व जेजे एक्ट की गाइडलाइंस के अनुसार इन अदालतों के बुनियादी ढांचे को सुधारने के लिए आवश्यक वित्तीय सहायता प्रदान करने का निर्देश देकर जनहित याचिका (PIL) का निस्तारण कर दिया।
कोच्चि: यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act, 2012) की धारा 32 के तहत विशेष लोक अभियोजक (Special Public Prosecutor – SPP) की नियुक्ति का वैधानिक अधिदेश, POCSO अदालतों की ‘अनन्यता’ (Exclusivity of Fast-Track Special Courts), किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (Juvenile Justice Act, 2015) के मामलों में बाल-मित्र न्याय प्रणाली (Child-Friendly Jurisprudence), तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 2020 में जारी बाध्यकारी दिशानिर्देशों के विपरीत कार्यपालिका द्वारा जारी प्रशासनिक शासनादेशों (Government Orders – GO) की असंवैधानिकता पर केरल हाईकोर्ट ने एक युगांतरकारी विधिक निर्णय दिया है।
मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और न्यायमूर्ति श्याम कुमार वी.एम. की खंडपीठ ने 14 अक्टूबर 2026 को थोडुपुझा-मुट्टम स्थित डिस्ट्रिक्ट कोर्ट बार एसोसिएशन और उसके सचिव शाजी जोसेफ द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) को स्वीकार करते हुए केरल राज्य सरकार के उस विवादित शासनादेश को पूरी तरह से गैर-कानूनी और असमर्थनीय (Legally Unsustainable) करार देकर रद्द कर दिया, जिसके जरिए POCSO अदालतों के विशेष लोक अभियोजकों को किशोर न्याय (JJ) अधिनियम के मामलों सहित गैर-POCSO मुकदमों में भी पेश होने की अनुमति दी गई थी।
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक व्यवस्था
1. ‘POCSO विशेष लोक अभियोजक केवल POCSO मामलों का ही संचालन करेंगे’
खंडपीठ ने POCSO मामलों की संवेदनशीलता और त्वरित सुनवाई की वैधानिक अनिवार्यता पर जोर देते हुए व्यवस्था दी: “POCSO मामलों के लिए नियुक्त विशेष लोक अभियोजकों (SPPs) को गैर-POCSO मामलों का संचालन करने की अनुमति देने वाला सरकारी आदेश (Government Order) विधिक रूप से कायम नहीं रखा जा सकता (Cannot be sustained)। यह दोहराया जाता है कि POCSO विशेष लोक अभियोजकों को केवल और केवल POCSO अधिनियम के तहत दर्ज मामलों को ही अनन्य रूप से (Exclusively) संभालना होगा।”
2. सुप्रीम कोर्ट के 2020 के बाध्यकारी निर्देशों का हवाला:
- खंडपीठ ने रेखांकित किया कि सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2020 में POCSO मामलों की स्वतः संज्ञान निगरानी के दौरान स्पष्ट आदेश दिया था कि विशेष रूप से स्थापित फास्ट-ट्रैक अदालतों में नियुक्त SPP को किसी भी गैर-POCSO मामले की जिम्मेदारी नहीं दी जा सकती।
- शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों को निर्देश दिया था कि वे विशेष POCSO अदालतों के लिए अनन्य लोक अभियोजकों (Exclusive Public Prosecutors) की नियुक्ति सुनिश्चित करें।
- हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार का आदेश सुप्रीम कोर्ट के इन बाध्यकारी निर्देशों का सीधा उल्लंघन था।
3. राज्य को 6 सप्ताह की सख्त समय-सीमा:
- अदालत ने केरल सरकार को निर्देश दिया कि वह आदेश की प्रति प्राप्त होने के छह सप्ताह (6 Weeks) के भीतर सभी POCSO विशेष अदालतों के लिए पूर्णतः अनन्य विशेष लोक अभियोजकों की विधिवत नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करे।
13 नई स्थायी POCSO विशेष अदालतों के गठन एवं अधोसंरचना के निर्देश
रजिस्ट्रार (जिला न्यायपालिका) द्वारा प्रस्तुत हलफनामे का संज्ञान लेते हुए खंडपीठ ने राज्य के न्यायिक ढांचे को सुदृढ़ करने हेतु निम्नलिखित ऐतिहासिक निर्देश दिए:
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│ केरल हाईकोर्ट: POCSO न्यायिक अधोसंरचना एजेंडा │
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【13 अतिरिक्त स्थायी POCSO अदालतें】 【अनिवार्य बाल-मित्र सुविधाएं】 【राज्य द्वारा पूर्ण वित्तीय सहायता】
• एर्नाकुलम को छोड़कर राज्य के प्रत्येक • सभी मौजूदा अदालतों में JJ एक्ट व POCSO • बाल पीड़ितों के अनुकूल प्रतीक्षालय,
जिले में 1-1 नई स्थायी विशेष POCSO अधिनियम के तहत उल्लिखित बाल-सुलभ पर्दे/स्क्रीन व वीडियो लिंक स्थापित करने
अदालत स्थापित करने पर विचार। सुविधाएं (Child-Friendly) सुनिश्चित हों। हेतु पर्याप्त वित्तीय अनुदान जारी करना।
- 13 अतिरिक्त स्थायी अदालतें: एर्नाकुलम जिले को छोड़कर, राज्य के शेष प्रत्येक 13 जिलों में 1-1 अतिरिक्त स्थायी विशेष POCSO अदालत स्थापित करने के लिए राज्य सरकार को ठोस कदम उठाने का निर्देश।
- बाल-अनुकूल न्यायिक वातावरण: रजिस्ट्रार (जिला न्यायपालिका) को यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया गया कि सभी कार्यरत POCSO अदालतों में POCSO कानून और JJ एक्ट की गाइडलाइंस के अनुरूप बाल-सुलभ संरचना, संवेदनशील बयान दर्ज करने के कक्ष (Vulnerable Witness Deposition Complexes) और गोपनीयता के मानक मौजूद हों।
- वित्तीय संवितरण: राज्य सरकार को इन अदालतों की भौतिक अधोसंरचना और सुविधाओं के आधुनिकीकरण हेतु आवश्यक वित्तीय सहायता तुरंत स्वीकृत करने का निर्देश दिया गया।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विधिक घटनाक्रम
| विवरण | घटनाक्रम एवं तथ्य |
| याचिकाकर्ता | डिस्ट्रिक्ट कोर्ट बार एसोसिएशन, थोडुपुझा-मुट्टम और उसके सचिव शाजी जोसेफ। |
| याचिका की प्रकृति | जनहित याचिका (PIL) — POCSO मुकदमों में अभियोजन की गुणवत्ता और अदालती समय के संरक्षण हेतु। |
| चुनौती का विषय | केरल सरकार द्वारा जारी वह प्रशासनिक आदेश (GO), जिसने POCSO विशेष लोक अभियोजकों को किशोर न्याय बोर्ड (JJB) और बाल कल्याण समिति (CWC) से जुड़े जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के मामलों में भी अभियोजन चलाने की अनुमति दी थी। |
| याचिकाकर्ताओं की दलील | POCSO एक्ट के तहत बाल यौन उत्पीड़न के मामलों की सुनवाई 1 वर्ष के भीतर पूरी करने का वैधानिक अधिदेश है। यदि अभियोजकों को अन्य सामान्य या JJ एक्ट के मुकदमों में लगाया जाएगा, तो बाल पीड़ितों को त्वरित न्याय मिलना असंभव हो जाएगा। |
| हाईकोर्ट का हस्तक्षेप | 14 अक्टूबर 2026 को दिए फैसले में GO निरस्त; अनन्य अभियोजक बहाल रखने और मुकदमों के बोझ को कम करने हेतु 13 नई अदालतों के गठन का निर्देश देकर PIL का निस्तारण किया। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- POCSO अधिनियम, 2012 की धारा 32 एवं 35:
- धारा 32: राज्य सरकार को प्रत्येक विशेष न्यायालय के लिए विशेष लोक अभियोजक नियुक्त करने का निर्देश देती है, जिसके पास कम से कम सात वर्ष का वकालत का अनुभव हो।
- धारा 35: स्पष्ट रूप से यह अधिदेश देती है कि बच्चे का साक्ष्य दर्ज करने का काम आरोप पत्र दाखिल होने के 30 दिनों के भीतर पूरा किया जाना चाहिए और मुकदमे का निपटारा एक वर्ष की अवधि के भीतर पूरा किया जाना चाहिए।
- यदि विशेष अभियोजक का ध्यान अन्य विविध मुकदमों में बंटा रहेगा, तो धारा 35 का सांविधिक उद्देश्य पूरी तरह विफल हो जाता है।
- किशोर न्याय अधिनियम, 2015 (JJ Act) बनाम POCSO अधिनियम:
- दोनों कानूनों की प्रक्रियात्मक और दंडात्मक व्यवस्था अलग-अलग है। JJ एक्ट जहां कानून के उल्लंघन में आए बच्चों (CCL) के सुधार, पुनर्वास और देखरेख पर केंद्रित है, वहीं POCSO एक्ट बाल यौन शोषण के गंभीर अपराधियों के दंडात्मक अभियोजन से संबंधित है।
- एक ही अभियोजक को दोनों अलग-अलग विधियों के संचालन में झोंकना न्याय प्रशासन की कार्यकुशलता को कम करता है।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- केस संदर्भ: डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन, थोडुपुझा-मुट्टम व अन्य बनाम केरल राज्य व अन्य [WP(C) / जनहित याचिका – केरल उच्च न्यायालय]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और न्यायमूर्ति श्याम कुमार वी.एम. (खंडपीठ)
- निर्णय की तिथि: 14 अक्टूबर 2026
- संबद्ध पक्षकार:
- याचिकाकर्ता: थोडुपुझा-मुट्टम जिला बार एसोसिएशन एवं सचिव शाजी जोसेफ
- प्रतिवादी: केरल राज्य (गृह एवं विधि विभाग) तथा उच्च न्यायालय प्रशासन
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत थम्पन (अधिवक्ता वी.एम. कृष्णकुमार, पी.आर. रीना और पूजा सुनील के साथ)।
- केरल राज्य की ओर से: अभियोजन महानिदेशक (Director General of Prosecution – DGP) टी. असफ अली।
- उच्च न्यायालय प्रशासन की ओर से: अधिवक्ता हरिकुमार जी.।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) — धारा 28 (विशेष न्यायालय), धारा 32 (विशेष लोक अभियोजक) एवं धारा 35 (त्वरित विचारण की समय-सीमा)
- किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (JJ Act)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (त्वरित विचारण का अधिकार), अनुच्छेद 39A (समान न्याय) एवं अनुच्छेद 226
- संबद्ध सर्वोच्च न्यायालय नजीर:
- स्वतः संज्ञान रिट याचिका (आपराधिक) संख्या 01/2019 (इन री: POCSO अदालतों में बच्चों के संरक्षण पर दिशानिर्देश – 2020) — ‘POCSO अदालतों और उनके अभियोजकों की अनन्यता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।’
- अंतिम परिणाम: जनहित याचिका पूर्णतः स्वीकार; विवादित GO निरस्त; सरकार को 6 सप्ताह में अनन्य POCSO अभियोजक नियुक्त करने और एर्नाकुलम के अलावा सभी 13 जिलों में एक-एक नई स्थायी विशेष POCSO अदालत स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू करने का आदेश।
Special Court:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | केरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन एवं न्यायमूर्ति श्याम कुमार वी.एम. |
| याचिकाकर्ता | जिला कोर्ट बार एसोसिएशन (थोडुपुझा-मुट्टम) एवं इसके सचिव शाजी जोसेफ |
| प्रतिवादी | केरल राज्य सरकार एवं अन्य |
| मुख्य मुद्दा | क्या पोक्सो मामलों के विशेष पीपी (SPP) गैर-पोक्सो और जुवेनाइल जस्टिस (JJ Act) के केस लड़ सकते हैं? |
| कोर्ट का अंतिम आदेश | 1. राज्य सरकार का आदेश (GO) रद्द; पोक्सो वकीलों को अन्य केसों से रोका। 2. 6 सप्ताह के भीतर विशेष रूप से केवल पोक्सo मामलों के लिए एक्सक्लूसिव वकीलों की नियुक्ति के निर्देश। 3. एर्नाकुलम को छोड़कर राज्य के बाकी 13 जिलों में 13 नए स्थायी पोक्सो कोर्ट बनाने का सुझाव। |

