Supreme Court View
Reasonable prospect: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें एक आरोपी की डिस्चार्ज याचिका खारिज कर दी गई थी।
चार्जशीट में कोई ‘मजबूत संदेह’ (Strong Suspicion) नहीं बनता है..
शीर्ष कोर्ट के न्यायाधीश मनमोहन ने संपत्ति विवाद से जुड़े एक मामले में आरोपी पर लगे ‘छेड़छाड़’ (धारा 354C) और ‘आपराधिक धमकी’ (धारा 506) सहित अन्य आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि FIR और चार्जशीट में कोई ‘मजबूत संदेह’ (Strong Suspicion) नहीं बनता है। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि पुलिस को केवल उन मामलों में चार्जशीट दायर करनी चाहिए जिनमें दोषसिद्धि की ‘उचित संभावना’ हो, अन्यथा यह न्याय प्रणाली को बाधित करता है।
यह था मामला
19 मार्च 2020 को, ममता अग्रवाल नामक एक महिला ने बिधाननगर नॉर्थ पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई। महिला ने दावा किया कि वह साल्ट लेक, कोलकाता की एक संपत्ति में सह-मालिक (अमलेंदु बिस्वास) की कथित किरायेदार है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि 18 मार्च 2020 को जब वह अपने दोस्त और मजदूरों के साथ संपत्ति में घुसने की कोशिश कर रही थी, तब आरोपी ने उसे डराया-धमकाया और अंदर जाने से रोका। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी ने उसकी सहमति के बिना अपने मोबाइल से उसकी तस्वीरें लीं और वीडियो बनाए, जिससे उसकी निजता भंग हुई और शील भंग हुआ (IPC धारा 354C, 506)।
शिकायतकर्ता ने न्यायिक बयान देने से मना किया
पुलिस ने अपनी चार्जशीट में जांच पूरी होने के बाद अदालत में सौंपी। इसमें पुलिस ने IPC की धारा 341 (सदोष अवरोध), 354C (ताक-झांक/वॉयूरिज्म) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। मगर इसमें यह कहा गया कि शिकायतकर्ता ने न्यायिक बयान देने से मना कर दिया था।
SC ने क्यों रद्द किए आपराधिक आरोप?
सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी सिद्धांतों की समीक्षा करते हुए पाया कि आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं:
- धारा 354C (वॉयूरिज्म/ताक-झांक) लागू नहीं
कानून की परिभाषा: धारा 354C के तहत अपराध तब बनता है जब कोई पुरुष किसी महिला का ‘निजी कृत्य’ (Private Act) करते समय उसकी छवि को देखता या कैद करता है, जब महिला को न देखे जाने की उम्मीद होती है। ‘निजी कृत्य’ में गुप्तांग, स्तन या नितंब का दिखना या केवल अंडरवियर में होना, या शौचालय का उपयोग करना शामिल है।
SC का निष्कर्ष: कोर्ट ने कहा कि FIR या चार्जशीट में कहीं भी यह आरोप नहीं लगाया गया है कि आरोपी ने शिकायतकर्ता को ‘निजी कृत्य’ करते हुए देखा या उसकी तस्वीर ली। इसलिए, इस धारा के तहत कोई अपराध नहीं बनता है।
- धारा 506 (आपराधिक धमकी) के तत्व नहीं मिले
आवश्यकता: आपराधिक धमकी के लिए यह दिखाना जरूरी है कि आरोपी ने किसी व्यक्ति को शारीरिक चोट, प्रतिष्ठा या संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की धमकी दी, जिसका उद्देश्य डर पैदा करना था।
SC का निष्कर्ष: आरोपी द्वारा तस्वीरें खींचने के कोरे आरोप के अलावा, FIR या चार्जशीट में यह पूरी तरह से खामोश है कि किस तरह से धमकी दी गई थी या कौन से शब्द बोले गए थे। यह धारा भी लागू नहीं होती।
- धारा 341 (सदोष अवरोध) भी नहीं
संपत्ति विवाद: कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता का संपत्ति में प्रवेश करने का अधिकार किरायेदार होने के नाते बताया गया था, लेकिन चार्जशीट के साथ ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया कि वह किरायेदार थी।
कोर्ट का तर्क: यहां तक कि एक सह-मालिक (अमलेंदु बिस्वास) ने भी अपने बयान में कहा कि महिला केवल संपत्ति देखने आई थी। संपत्ति पर पहले से ही सिविल कोर्ट का स्थगन आदेश (Injunction Order) लागू था।
निष्कर्ष: कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने सद्भावपूर्वक (Bonafidely) वही लागू करने की कोशिश की जिसे वह कानूनी अधिकार मानता था। यह सिविल विवाद का मामला है, न कि सदोष अवरोध का आपराधिक मामला।
न्यायपालिका को SC की सख्त हिदायत
निर्णय के अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस और आपराधिक अदालतों को कड़ी हिदायत दी:
- “जहां पक्षों के बीच सिविल विवाद लंबित है, वहां पुलिस को चार्जशीट दाखिल करने और आपराधिक अदालतों को आरोप तय करने में सावधानी बरतनी चाहिए।”
- “पुलिस को चार्जशीट दाखिल करते समय और आपराधिक कोर्ट को आरोप तय करते समय शुरुआती फिल्टर के रूप में कार्य करना चाहिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि केवल ‘मजबूत संदेह’ वाले मामले ही औपचारिक ट्रायल चरण तक पहुँचें।”
- “बिना ‘मजबूत संदेह’ वाले मामलों में चार्जशीट दायर करने की प्रवृत्ति न्याय प्रणाली को बाधित करती है, और न्यायाधीशों, स्टाफ तथा अभियोजकों का समय उन मुकदमों पर बर्बाद होता है जिनका परिणाम अंततः बरी होने की संभावना है।”
- सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ सभी आपराधिक कार्यवाही को तत्काल समाप्त करते हुए उसकी डिस्चार्ज याचिका को स्वीकार कर लिया।
IN THE SUPREME COURT OF INDIA
CRIMINAL APPELLATE JURISDICTION
CRIMINAL APPEAL NO.5146 OF 2025
(Arising out of Special Leave Petition (Crl.) No. 3002/2024)
TUHIN KUMAR BISWAS @ BUMBA VERSUS THE STATE OF WEST BENGAL





