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SC News: Presumption of innocence पर सुप्रीम कोर्ट को करनी पड़ी टिप्पणी, अपीलीय अदालत को ट्रायल कोर्ट के फैसले को हल्के में नहीं लेना चाहिए…पलटने से बचें

SC News: सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट से बरी होने के फैसले को अपीलीय अदालत तभी पलटें, जब उसमें कोई कानूनी त्रुटि स्पष्ट पाई जाए।

निर्दोष होने की प्रत्ययमानता पर चर्चा

न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट द्वारा जगदीश गोंड को उसकी पत्नी की कथित हत्या के मामले में दोषी ठहराए जाने के आदेश को पलटने के मामले में फैसला दिया गया। कहा, यदि किसी आरोपी को ट्रायल कोर्ट द्वारा बरी कर दिया गया है, तो निर्दोष होने की प्रत्ययमानता (presumption of innocence) सिद्ध होती है और अपीलीय अदालतों को ऐसे फैसलों को केवल तभी पलटना चाहिए जब उसमें स्पष्ट रूप से कोई कानूनी त्रुटि या अनुचितता (perversity) पाई जाए।

शीर्ष कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश पर लगाई मुहर

न्यायमूर्ति चंद्रन ने पीठ की ओर से यह निर्णय लिखा और ट्रायल कोर्ट द्वारा गोंड को दी गई बरी की सजा को बहाल कर दिया। फैसले में कहा गया कि गोंड की दोषसिद्धि में कोई ठोस साक्ष्य नहीं था और यह कानून की उस कसौटी पर खरी नहीं उतरती जिससे किसी बरी किए गए व्यक्ति को दोषी ठहराया जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, यह स्थापित सिद्धांत है कि जब तक यह स्पष्ट रूप से सिद्ध न हो जाए कि ट्रायल कोर्ट ने दोषसिद्धि पर पहुंचने में कोई गंभीर कानूनी गलती या अनुचितता की है, तब तक किसी बरी के आदेश को पलटना नहीं चाहिए।

एलीबाई सिद्ध नहीं होने पर हाईकोर्ट ने आदेश को पलटा: सुप्रीम कोर्ट

पीठ ने यह भी कहा कि अगर दो व्याख्याएं संभव हों, और ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी करना एक संभाव्य (plausible) दृष्टिकोण माना जाए, तो अपीलीय अदालत को उस निर्णय को हल्के में पलटना नहीं चाहिए, क्योंकि ट्रायल कोर्ट द्वारा बरी किए जाने से आरोपी की निर्दोषता की प्रत्ययमानता और भी मजबूत हो जाती है। पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट ने “दुर्भाग्यवश” सिर्फ इस आधार पर ट्रायल कोर्ट के बरी के आदेश को पलट दिया कि आरोपी द्वारा दिया गया एलीबाई (alibi) सिद्ध नहीं हुआ।

29 जनवरी 2017 को महिला की हुई थी मौत

यह मामला एक महिला की मौत से जुड़ा है, जिसकी शादी जगदीश गोंड से दो साल पहले हुई थी। 29 जनवरी 2017 की सुबह गोंड ने उसकी लाश मिलने की सूचना पुलिस को दी थी। इसके बाद दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 174 के तहत एक अस्वाभाविक मृत्यु का मामला दर्ज किया गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गले पर दबाव के निशान (ligature mark) पाए गए, लेकिन मृत्यु का स्पष्ट कारण निर्धारित नहीं हो सका। ट्रायल कोर्ट ने चिकित्सा साक्ष्यों की स्पष्टता की कमी और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के अभाव में इसे आत्महत्या मानते हुए गोंड को बरी कर दिया था।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया

राज्य सरकार ने बरी के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी, तो हाई कोर्ट ने इसे पलट दिया और गोंड को IPC की धारा 302 (हत्या) के तहत दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। हाई कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 का हवाला देते हुए कहा कि चूंकि पति-पत्नी एक साथ रहते थे, इसलिए गोंड पर यह भार था कि वह अपनी पत्नी की मृत्यु के हालात स्पष्ट करे। हाई कोर्ट ने गोंड के उस बचाव को भी खारिज कर दिया जिसमें उसने कहा था कि घटना की रात वह काम पर था, क्योंकि वह कथन अन्य साक्ष्यों से पुष्टि नहीं हो सका।

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