Summoning Of Advocate: झारखंड हाईकोर्ट ने एक वकील को जांच अधिकारी द्वारा समन भेजे जाने पर कड़ी आपत्ति जताई है।
प्रैक्टिसिंग वकील के दायर रिट पिटीशन का मामला
यह मामला एक प्रैक्टिसिंग वकील द्वारा दायर रिट पिटीशन से जुड़ा है, जिन्हें रेलवे प्रॉपर्टी (अनलॉफुल पजेशन) एक्ट, 1996 के तहत पूछताछ के लिए समन भेजा गया था। यह केस वही वकील देख रहे हैं। जस्टिस आनंदा सेन की सिंगल बेंच ने कहा, “जिस वकील की भूमिका आरोपी का बचाव करने की है, उसे जांच अधिकारी द्वारा समन भेजना चिंताजनक है। वकील और उसके क्लाइंट के बीच की बातचीत गोपनीय होती है और इसे किसी भी जांच अधिकारी के सामने उजागर करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।”
RP(UP) एक्ट, 1996 की धारा 8 का दिया हवाला
कोर्ट ने माना कि यह समन सिर्फ इस गोपनीय बातचीत की जानकारी हासिल करने के लिए भेजा गया है, जो दुर्भाग्यपूर्ण है।कोर्ट ने कहा कि वकील और उसके क्लाइंट के बीच की बातचीत हमेशा गोपनीय होती है, चाहे क्लाइंट की स्थिति कुछ भी हो। कोर्ट ने इस समन को “वास्तव में परेशान करने वाला” बताया। पिटीशनर की ओर से वकील अजय कुमार साह ने पक्ष रखा, जबकि जवाबदाता की ओर से भारत सरकार के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अनिल कुमार पेश हुए। समन में कहा गया था कि RP(UP) एक्ट, 1996 की धारा 8 के तहत पूछताछ जरूरी है, इसलिए पिटीशनर की उपस्थिति जरूरी है।
पिटीशनर के वकील ने भी दलील दी
पिटीशनर के वकील ने दलील दी कि पिटीशनर खुद एक वकील हैं और इस केस में तीन-चार आरोपियों का बचाव कर रहे हैं। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि आरोपी ने अपने इकबालिया बयान में कहा है कि पिटीशनर उनके डिफेंस काउंसल हैं और उन्होंने भरोसा दिलाया था कि वे उन्हें बचा लेंगे, इसलिए वे अपनी गतिविधियां जारी रख सकते हैं। इसी आधार पर समन जारी किया गया। कोर्ट ने इस घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए साफ किया कि पिटीशन के निपटारे तक पिटीशनर को इस तरह का कोई और समन नहीं भेजा जाएगा। कोर्ट ने पिटीशन को स्वीकार कर लिया है।

