Transgender Rights: केरल हाई कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर केंद्र सरकार से कड़ा सवाल पूछा है।
केरल हाई कोर्ट के जस्टिस बेचू कुरियन थॉमस की बेंच ने दो ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) पी. श्रीकुमार से स्पष्टीकरण मांगा है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि अस्पतालों ने नए कानून का हवाला देकर उनकी हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (HRT) बंद कर दी है।कोर्ट ने सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि क्या नए कानून के तहत ‘जेंडर अफर्मिंग सर्जरी’ (लिंक परिवर्तन सर्जरी) और ‘हार्मोन थेरेपी’ पर रोक लगा दी गई है।
विवाद की जड़: 2026 का नया संशोधन
- याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरुंधति काटजू ने कोर्ट को बताया कि 2026 का नया कानून ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों को पीछे ले जा रहा है।
- पहचान का संकट: पुराने 2019 के कानून में ‘सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन’ (स्व-पहचान) का अधिकार था, जिसे अब हटाकर अनिवार्य मेडिकल सर्टिफिकेट (Medical Board द्वारा) कर दिया गया है।
- इलाज पर असर: याचिकाकर्ताओं की हार्मोन थेरेपी बीच में ही रोक दी गई है, जिससे उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा बुरा असर पड़ रहा है।
- सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन: दलील दी गई कि यह कानून NALSA (2014) के ऐतिहासिक फैसले के खिलाफ है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने ‘स्व-पहचान’ को मौलिक अधिकार माना था।
नई परिभाषा पर आपत्ति (Change in Definition)
- अधिवक्ता काटजू ने बताया कि धारा 2(k) के तहत ‘ट्रांसजेंडर’ की परिभाषा को बहुत संकुचित (Narrow) कर दिया गया है।
- केवल सामाजिक-सांस्कृतिक समूह: अब इसमें केवल ‘हिजड़ा’ या ‘किन्नर’ जैसे सामाजिक-सांस्कृतिक समूहों को शामिल किया गया है।
- किसे बाहर किया गया?: जो लोग इन समूहों का हिस्सा नहीं हैं या जिनकी पहचान ‘स्व-अनुभूत’ (Self-perceived) है, उन्हें अब इस श्रेणी से बाहर कर दिया गया है। याचिकाकर्ता ने कहा, “मैं न तो हिजड़ा समूह से हूँ और न ही जन्म से कोई शारीरिक विषमता (Congenital variation) थी। अब मेरी पहचान ही मिटाई जा रही है।”
2019 Act vs. 2026 Amendment
| प्रावधान | 2019 का अधिनियम | 2026 का संशोधन |
|---|---|---|
| पहचान का आधार | स्व-पहचान (Self-ID) | मेडिकल बोर्ड का सर्टिफिकेट |
| परिभाषा का दायरा | विस्तृत (Transmen, Non-binary शामिल) | सीमित (मुख्यतः जैविक और सामाजिक समूह) |
| निजता का अधिकार | सुरक्षित | मेडिकल बोर्ड के कारण खतरे में |
कोर्ट की टिप्पणी और केंद्र का जवाब
- कोर्ट का सवाल: “क्या हार्मोन थेरेपी करा रहे व्यक्ति इस बदलाव से प्रभावित हो सकते हैं? यह उनकी सेहत का मामला है।”
- केंद्र (ASG) का तर्क: ASG ने कहा कि यह कानून की खामी नहीं है, बल्कि एक व्यावहारिक मुद्दा (Practical Issue) है जिसे अलग से देखा जा सकता है। उन्होंने कानून पर ‘स्टे’ (Stay) लगाने का विरोध किया।
- कोर्ट का रुख: अदालत ने फिलहाल कानून पर रोक लगाने से इनकार कर दिया (Presumption of Constitutionality), लेकिन केंद्र से इस पर विस्तृत निर्देश (Instructions) लाने को कहा है कि यह बदलाव क्यों लाए गए हैं।
अन्य गंभीर मुद्दे
- कानूनी असुरक्षा: एक याचिकाकर्ता ने बताया कि उनके साथ यौन शोषण हुआ, लेकिन नए कानून के कारण पुलिस मामला दर्ज करने में आनाकानी कर रही है।
- मानसिक तनाव: समुदाय के सदस्यों में कानूनी बहिष्कार और सामाजिक कलंक के डर से ‘आत्महत्या के विचार’ (Suicidal Ideation) और गंभीर तनाव देखा जा रहा है।
- पहचान पत्रों की वैधता: जिनके पास पुराने कानून के तहत ID कार्ड थे, अब उनकी वैधता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
निष्कर्ष: पहचान की जंग
केरल हाई कोर्ट का यह रुख ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यह मामला न केवल चिकित्सा के अधिकार से जुड़ा है, बल्कि गरिमा के साथ जीने और अपनी पहचान खुद चुनने के अधिकार (Right to Privacy & Identity) से भी जुड़ा है।

