UP Govt: उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों को टालने और ग्राम प्रधानों का कार्यकाल खत्म होने के बाद उन्हें ही बैकडोर से ‘प्रशासक’ बनाकर कमान सौंपने के राज्य सरकार के फैसले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है।
हाईकोर्ट के जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने सरकार के 25 मई 2026 के प्रशासनिक आदेश पर गंभीर संवैधानिक सवाल खड़े किए हैं और पंचायती राज विभाग के अपर मुख्य सचिव (Additional Chief Secretary) को कोर्ट में तलब किया है। अदालत ने एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए यह तल्ख टिप्पणी की। कहा, जब इलाहाबाद हाई कोर्ट की एक खंडपीठ (Division Bench) वर्ष 2000 में ही यह साफ कर चुकी है कि संविधान के मुताबिक ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 5 साल से एक भी दिन ज्यादा नहीं हो सकता, तो उत्तर प्रदेश सरकार ने उसी पुराने नियम का सहारा लेकर निवर्तमान ग्राम प्रधानों को ही ‘प्रशासक’ (Administrator) नियुक्त करने का आदेश कैसे जारी कर दिया? क्या राज्य सरकार हाई कोर्ट के उस स्थापित कानून की अवहेलना कर सकती है जो आज की तारीख में भी देश का कानून (Law of the Land) है?
मामला क्या है?: ओबीसी आरक्षण की आड़ में टले चुनाव, प्रधान बने ‘प्रशासक’
यह पूरा प्रशासनिक और संवैधानिक विवाद उत्तर प्रदेश की त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था से जुड़ा है।
सरकार का फैसला: उत्तर प्रदेश सरकार ने 25 मई को एक प्रशासनिक आदेश जारी किया था। इसके तहत जिन ग्राम प्रधानों का 5 साल का संवैधानिक कार्यकाल पूरा हो चुका था, उन्हें ही अगले चुनाव होने तक संबंधित पंचायतों का ‘प्रशासक’ नियुक्त कर दिया गया।
सरकार की दलील: राज्य सरकार का तर्क था कि चूंकि एक समर्पित ओबीसी आयोग (OBC Commission) अभी ग्राम प्रधान और पंचायत सदस्यों के पदों के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण पर अपनी रिपोर्ट तैयार कर रहा है, इसलिए फिलहाल नए चुनाव नहीं कराए जा सकते। ऐसे में आपात स्थिति को देखते हुए यू.पी. पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 12(3-A) का इस्तेमाल कर प्रधानों को ही प्रशासक बनाया गया।
PIL में चुनौती: याचिकाकर्ता संजय कुमार शर्मा ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी। याचिका में भारत के संविधान के अनुच्छेद 243-E(1) का हवाला दिया गया, जो स्पष्ट रूप से कहता है कि प्रत्येक पंचायत अपनी पहली बैठक से केवल 5 वर्ष तक काम करेगी, “और इससे अधिक नहीं” (and no longer)।
हाई कोर्ट की विधिक व्याख्या: वर्ष 2000 का ‘प्रेम लाल पटेल’ ऐतिहासिक फैसला
सुनवाई के दौरान जस्टिस राजन रॉय की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार को कानून का पाठ पढ़ाते हुए वर्ष 2000 के ‘प्रेम लाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले में हाई कोर्ट के ही एक पुराने फैसले की याद दिलाई।
‘And No Longer’ का संवैधानिक महत्व
वर्ष 2000 में हाई कोर्ट की खंडपीठ ने साफ कहा था कि संविधान में लिखे शब्द “और इससे अधिक नहीं” (no longer) का मतलब यह है कि राज्य सरकार किसी भी परिस्थिति या बहाने से पंचायत का चुनाव 5 साल की अवधि बीतने से पहले कराने के लिए बाध्य है। राज्य सरकार के पास ऐसी कोई सर्वोच्च शक्ति (Superior Power) नहीं है कि वह चुनाव टाल सके।
राज्य चुनाव आयोग के पर कतरने की कोशिश
उस ऐतिहासिक फैसले में कोर्ट ने माना था कि अधिनियम की धारा 12(3-A) (जो पहले अध्यादेश के रूप में थी) संविधान के अनुच्छेद 243-E और 243-K के खिलाफ (Ultra Vires) है। कोर्ट ने कहा था कि चुनाव टालकर और प्रशासक नियुक्त करके राज्य सरकार असल में राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission) के अधिकारों का हनन करती है और उसके वजूद को शून्य बना देती है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ था?
यूपी सरकार ने वर्ष 2000 के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। लेकिन 2001 तक यूपी में पंचायत चुनाव संपन्न हो गए थे, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने अपील को यह कहते हुए बंद (Dispose) कर दिया था कि अब यह मामला निष्प्रभावी (Infructuous) हो चुका है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने साफ लिखा था कि “इसके कानूनी सवाल अभी भी खुले (Open) हैं। वर्तमान खंडपीठ ने इसी बिंदु पर सरकार को घेरा और कहा कि भले ही सुप्रीम कोर्ट ने तकनीकी आधार पर अपील बंद कर दी थी, लेकिन ‘प्रेम लाल पटेल’ मामले में हाई कोर्ट द्वारा तय किया गया विधिक सिद्धांत आज भी पूरी तरह प्रभावी और बाध्यकारी है।
❓ हाई कोर्ट द्वारा तैयार किए गए 3 बड़े संवैधानिक सवाल
हाई कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए विस्तृत समीक्षा के लिए तीन मुख्य विधिक प्रश्न (Constitutional Questions) तैयार किए हैं।
क्या यू.पी. पंचायत राज अधिनियम की धारा 12(3-A) के तहत किसी प्रशासक की नियुक्ति करने से, पंचायत का कार्यकाल संविधान के अनुच्छेद 243-E के उल्लंघन में 5 वर्ष से आगे बढ़ जाता है?
क्या इस धारा के तहत प्रशासक नियुक्त करने से राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission) की उन शक्तियों और अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण होता है, जो उसे संविधान के अनुच्छेद 243-K के तहत प्राप्त हैं?
क्या केवल इसलिए कि सुप्रीम कोर्ट ने पुरानी अपील को निष्प्रभावी मानकर निस्तारित कर दिया था, ‘प्रेम लाल पटेल’ फैसले में प्रतिपादित कानूनी तर्क और सिद्धांत राज्य सरकार के लिए गैर-बाध्यकारी हो जाते हैं?
अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी: खंडपीठ ने यह भी नोट किया कि ‘पंचायत’ एक बड़ा निकाय है जिसमें कई सदस्य होते हैं और प्रधान उसका केवल एक हिस्सा होता है। यदि कार्यकाल खत्म होने के बाद अकेले ग्राम प्रधान को ही प्रशासक बना दिया जाए, तो वह पूरी पंचायत का ‘विकल्प’ बन जाता है, जो लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की मूल भावना के विपरीत है।
केस शीट: इलाहाबाद हाई कोर्ट (लखनऊ बेंच) पंचायत विवाद (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और विवरण |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ खंडपीठ) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला (खंडपीठ) |
| प्रासंगिक कानून और धारा | यू.पी. पंचायत राज अधिनियम, 1947 [धारा 12(3-A)] |
| संबंधित संवैधानिक अनुच्छेद | अनुच्छेद 243-E (5 साल का कार्यकाल) और अनुच्छेद 243-K (चुनाव आयोग) |
| पुरानी नज़ीर (Precedent) | Prem Lal Patel vs State of U.P. (2000) |
| अदालत का अंतरिम निर्देश | अपर मुख्य सचिव (पंचायती राज) तलब; वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट को संतुष्ट करने का आदेश। |

