Thursday, October 1, 2026
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Comments Upon Arbitral Tribunal: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस दीपक वर्मा की याचिका; ट्रिब्यूनल को ‘सुस्त’ कहने के आदेश को चुनौती, पढ़ें

मामला सारांश (At a Glance)

पहलूविवरण
मामलापूर्व जज सुप्रीम कोर्ट पहुंचे (राजस्थान हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ)
याचिकाकर्ताजस्टिस दीपक वर्मा (पूर्व SC जज), जस्टिस दिनेश चंद्र सोमानी, जस्टिस एन. कुमार (पूर्व HC जज)
सुनवाईकर्ता पीठCJI सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची, जस्टिस वी. मोहना
एडवोकेट ऑन रिकॉर्डवाहेब हुसैनी (Waheb Hussaini)
मुख्य विवादआर्बिट्रेशन में देरी, ₹13 करोड़ का भारी खर्च और फीस में 5% की कटौती के निर्देश

Comments Upon Arbitral Tribunal: सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस दीपक वर्मा ने राजस्थान उच्च न्यायालय के उस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है, जिसमें उनके नेतृत्व वाले मध्यस्थता न्यायाधिकरण (Arbitral Tribunal) को “सुस्त” (Lethargic) बताते हुए पहले से भुगतान की गई फीस में 5% की कटौती करने का निर्देश दिया गया था।

जस्टिस दीपक वर्मा के साथ ट्रिब्यूनल के अन्य दो सदस्य—हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश दिनेश चंद्र सोमानी और एन. कुमार भी याचिकाकर्ता के रूप में सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं। इस याचिका पर मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ सुनवाई करेगी।

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राजस्थान हाई कोर्ट का 27 मई 2026 का सख्त आदेश

राजस्थान हाई कोर्ट की एकल पीठ ने 27 मई 2026 को दिए अपने आदेश में कहा था कि मध्यस्थता प्रक्रिया में कार्यप्रणालीगत अनुशासन (Procedural Discipline) का अभाव रहा है, जिसने समयबद्ध न्याय वितरण के विधायी उद्देश्य को विफल कर दिया।

  1. फीस में 5% की कटौती
    • अदालत ने ट्रिब्यूनल की देरी के कारण पहले से भुगतान की जा चुकी मध्यस्थता फीस (Arbitral Fees) में 5% प्रति माह की कटौती का आदेश दिया था।
  2. जयपुर शिफ्ट करने और दैनिक सुनवाई का निर्देश
    • हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया था कि वह 31 मई 2026 से जयपुर आर्बिट्रेशन एंड मेडिएशन सेंटर में रोजाना (Day-to-Day) सुनवाई शुरू करे और 45 दिनों के भीतर कार्यवाही व अंतिम फैसला (Award) पूरा करे।
  3. ₹13 करोड़ के खर्च और ₹7.5 लाख प्रति सत्र फीस पर टिप्पणी
    • हाई कोर्ट ने ₹7.5 लाख प्रति सिटिंग फीस संरचना पर टिप्पणी करते हुए कहा कि उच्च फीस और लंबे अंतरालों पर सुनवाई के संयोजन ने प्रक्रियात्मक अनुशासन को कमजोर किया, जिससे कुल मध्यस्थता खर्च बढ़कर लगभग ₹13 करोड़ तक पहुंच गया।

मामले की पृष्ठभूमि और विवाद (Case Background)

  • मूल अनुबंध (2009): जयपुर विद्युत वितरण निगम (JVVNL), अजमेर (AVVNL) और जोधपुर (JdVVNL) डिस्कॉम ने राजस्थान में पावर और आईटी इन्फ्रास्ट्रक्चर कार्यों के लिए HCL इंफोसिस को अनुबंध सौंपा था।
  • विवाद और मध्यस्थता (2019-2020): काम में देरी और कटौतियों के बाद HCL ने 27 सितंबर 2019 को मध्यस्थता क्लॉज़ लागू की। ट्रिब्यूनल की कार्यवाही 27 जुलाई 2020 से शुरू हुई।
  • समय-सीमा और विस्तार (Sec 29A): वैधानिक समय-सीमा (28 फरवरी 2023) समाप्त होने के बाद वाणिज्यिक अदालत (Commercial Court) ने धारा 29A के तहत ट्रिब्यूनल के कार्यकाल को समय-समय पर बढ़ाया (पहले 30 अप्रैल 2025 तक, फिर 24 फरवरी 2026 के आदेश द्वारा 30 सितंबर 2026 तक)।
  • हाई कोर्ट में डिस्कॉम्स की चुनौती: डिस्कॉम कंपनियों ने कार्यकाल विस्तार को अनुच्छेद 227 के तहत चुनौती दी। उन्होंने आरोप लगाया कि ट्रिब्यूनल ने प्रक्रिया को बहुत ढीले रवैये और लंबे स्थगनों के साथ चलाया, तथा सुनवाई का स्थान राजस्थान से नई दिल्ली स्थानांतरित कर दिया, जिससे लॉजिस्टिक और वित्तीय बोझ बहुत बढ़ गया।
  • HCL का बचाव: HCL ने ट्रिब्यूनल का बचाव करते हुए कहा कि मामले में 22 गवाहों का परीक्षण, 160 से अधिक बैठकें, भारी दस्तावेजी रिकॉर्ड और कोविड-19 महामारी के कारण हुई रुकावटें शामिल थीं।

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