Thursday, October 1, 2026
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Pay Fixation: सेवानिवृत्ति के बाद पुनः नियुक्त अधिकारी नियमित कर्मचारियों से अलग वर्ग; वेतन निर्धारण में भेदभाव का दावा करने की याचिका पर निर्देश जानें

मामला सारांश (At a Glance)

पहलूविवरण
माननीय पीठन्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी एवं न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया
मुख्य विषयपुनः नियुक्त अधिकारियों (Re-employed Officers) और नियमित कर्मचारियों के वेतन निर्धारण में अंतर
संविधानिक प्रावधानअनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (लोक नियोजन में अवसर की समानता)
अदालत का फैसलापुनर्नियोजित अधिकारी और नियमित कर्मचारी दो अलग वर्ग हैं; 6ठे वेतन आयोग का दावा खारिज।

Pay Fixation: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि सेवानिवृत्ति (Retirement) के बाद पुनः नियुक्त किए गए सरकारी अधिकारियों को वेतन निर्धारण (Pay Fixation) के उद्देश्य से नियमित सरकारी कर्मचारियों से अलग वर्ग माना जा सकता है। अदालत ने माना कि यह वर्गीकरण संविधान के अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (अवसर की समानता) का उल्लंघन नहीं करता है।

न्यायाधीश एस.वी.एन. भट्टी (Justice S.V.N. Bhatti) और न्यायाधीश एन.वी. अंजारिया (Justice N.V. Anjaria) की पीठ ने सेंट्रल गवर्नमेंट इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल-कम-लेबर कोर्ट (CGIT-cum-LCs) के पीठासीन अधिकारियों (Presiding Officers) द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य तर्क एवं कानूनी निष्कर्ष

  1. समान वर्ग (Homogeneous Class) का समाप्त होना:“पुनः नियुक्ति होने पर, सेवानिवृत्त अधिकारी/व्यक्ति सरकार के नियमित सेवा में मौजूद अधिकारियों के समान वर्ग (Homogeneous Class) का हिस्सा नहीं रहते। वे एक अलग वर्ग से संबंध रखते हैं। 6ठे वेतन आयोग के वेतनमान का दावा करने का उनका कोई मौलिक अधिकार या अन्य कानूनी आधार नहीं है।”
  2. अनुच्छेद 14 और 16 के तहत वैध वर्गीकरण (Intelligible Differentia)
    • पीठ ने कहा कि नियमित कर्मचारियों और पुनः नियुक्त अधिकारियों के बीच एक “स्पष्ट और तर्कसंगत अंतर” (Substantial Distinction) है। इसलिए उनके वेतनमान को अलग रखना या उन्हें न्यायिक सेवा (District Judiciary) के समकक्ष मानना संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ नहीं है।
  3. कार्यपालिका का अधिकार क्षेत्र
    • सुप्रीम COURT ने दोहराया कि वेतन निर्धारण (Pay Fixation) मुख्य रूप से कार्यपालिका (Executive) का कार्य है। जब तक कि सरकार का फैसला पूरी तरह से मनमाना न हो या किसी विशेषज्ञ निकाय की सिफारिशों के विपरीत न हो, अदालतों का इसमें हस्तक्षेप सीमित रहता है।
  4. ‘सेंट्रल सिविल सर्विसेज (Fixation of Pay of Re-employed Pensioners) Orders, 1986’ का नियम
    • अदालत ने माना कि पुनः नियुक्त पेंशनभोगियों का वेतन 1986 के विशेष नियमों के तहत निर्धारित होता है। ऐसे अधिकारी अपने पुनर्नियोजित पद के निर्धारित वेतन को प्राप्त करते हैं, न कि सेवानिवृत्ति से पहले के अपने पद के वेतन ढांचे के दावेदार होते हैं।

मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)

  • याचिकाकर्ताओं की मांग: CGIT-cum-LCs के दो पीठासीन अधिकारियों ने अन्य केंद्रीय ट्रिब्यूनल के अधिकारियों की तर्ज पर 6ठे केंद्रीय वेतन आयोग (6th Pay Commission) का लाभ देने की मांग की थी।
  • याचिकाकर्ता का तर्क: उन्होंने दावा किया कि उन्हें अन्य ट्रिब्यूनल अधिकारियों से अलग रखकर और उनका वेतन ‘शेट्टी आयोग’ (Shetty Commission) व ‘जस्टिस ई. पदमनाभन समिति’ की सिफारिशों के आधार पर जिला न्यायपालिका से जोड़कर उनके साथ भेदभाव किया गया है।
  • केंद्र सरकार का पक्ष: केंद्र ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता सेवानिवृत्ति के बाद पुनर्नियुक्ति (Re-employment) के आधार पर सेवा दे रहे हैं, इसलिए उनका वेतन पुनर्नियोजित पेंशनभोगी नियमों (1986) द्वारा नियंत्रित होता है, जो नियमित कर्मचारियों से अलग है।
  • अदालत का फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की दलीलों को स्वीकार करते हुए याचिका को पूरी तरह से आधारहीन मानकर खारिज कर दिया।

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