मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- उदाहरण देकर समझाया: अगर किसी खाते में ₹5 लाख हैं और संदिग्ध साइबर फ्रॉड की राशि केवल ₹500 है, तो पुलिस सिर्फ ₹500 पर होल्ड लगाएगी, बाकी के ₹4,99,500 पर खाताधारक का पूरा अधिकार रहेगा।
- संविधानत्मक अधिकारों का उल्लंघन: कोर्ट ने कहा कि बैंक खाता सिर्फ पैसों का जमावड़ा नहीं है, बल्कि जीवनयापन (वेतन, चिकित्सा, शिक्षा, किराया) का जरिया है। पूरे खाते को फ्रीज करना नागरिक के अधिकारों पर मनमाना हमला है।
- मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट करना अनिवार्य: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 106 के तहत खाते पर की गई जब्ती की सूचना तुरंत संबंधित मजिस्ट्रेट को दी जानी चाहिए।
- समय-सीमा और समीक्षा: जांच पूरी होने या खाताधारक की कोई संलिप्तता न मिलने पर खाते से तुरंत रोक हटाई जानी चाहिए। अनिश्चितकालीन रोक पूरी तरह अवैध है।
Fraud-Risk Management: राजस्थान हाईकोर्ट ने साइबर अपराधों की जांच के दौरान बैंकों और जांच एजेंसियों द्वारा खाताधारकों के पूरे बैंक खाते को अंधाधुंध और अनिश्चितकाल के लिए फ्रीज करने की प्रथा पर रोक लगाते हुए एक विस्तृत कानूनी ढांचा (Framework) निर्धारित किया है [बालाजी एंटरप्राइजेज बनाम आरबीआई]।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि कथित साइबर धोखाधड़ी से जुड़ी राशि की पहचान संभव है, तो सामान्य प्रक्रिया के तहत केवल उस विशिष्ट राशि पर ‘लीन’ (Lien/Hold) लगाया जाना चाहिए और खाताधारक को खाते में शेष बची राशि का सामान्य रूप से उपयोग करने की अनुमति दी जानी चाहिए।
मुख्य कानूनी बिंदु व सिद्धांत
- आनुपातिकता और संवैधानिकता: न्यायमूर्ति आनंद शर्मा की एकल पीठ ने कहा कि साइबर अपराध के पीड़ितों की सुरक्षा और धोखाधड़ी की रकम की बरामदगी जरूरी है, लेकिन जांच एजेंसियों की शक्तियां भी संवैधानिकता, तर्कसंगतता और आनुपातिकता (Proportionality) के दायरे में आती हैं।“साइबर अपराध की गंभीरता किसी निर्दोष नागरिक को राज्य की मनमानी कार्रवाई से बचाने वाले सुरक्षा उपायों को खत्म करने का औचित्य नहीं हो सकती।””
- दैनिक जीवन और व्यापार पर प्रभाव: अदालत ने रेखांकित किया कि बैंक खाता केवल पैसे रखने की जगह नहीं है, बल्कि वेतन प्राप्त करने, भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, किराया और करों का भुगतान करने का प्राथमिक साधन है। पूरे खाते को फ्रीज करने से व्यापार ठप हो जाता है और कर्मचारियों के वेतन व अन्य वैधानिक देयताओं का भुगतान रुक जाता है।
- उदाहरण: यदि धोखाधड़ी की संदिग्ध राशि ₹500 है और खाते में ₹5 लाख जमा हैं, तो केवल ₹500 पर होल्ड लगाना ही जांच के उद्देश्य को पूरा करता है; पूरे ₹5 लाख को ब्लॉक कर खाताधारक को शेष ₹4,99,500 से वंचित करना अनुचित है।
बैंक खाते फ्रीज करने को लेकर हाईकोर्ट के प्रमुख दिशानिर्देश
- अनिश्चितकालीन पूर्ण रोक नहीं: केवल किसी अस्पष्ट, असत्यापित या संक्षिप्त संदेश (Cryptic Communication) के आधार पर पूरे खाते पर अनिश्चितकाल के लिए पूर्ण डेबिट फ्रीज नहीं लगाया जा सकता।
- अपराध से सीधा संबंध दर्ज करना अनिवार्य: किसी भी खाते पर रोक लगाने से पहले जांच अधिकारी को यह स्पष्ट रूप से रिकॉर्ड करना होगा कि उस खाते या लेन-देन का अपराध से प्रथम दृष्टया क्या संबंध है।
- रोक केवल विवादित राशि तक सीमित हो: यदि संदिग्ध राशि तय है, तो केवल उसी राशि पर लीन लगाया जाए। पूरे खाते को केवल तभी फ्रीज किया जाए जब इसके ठोस कारण मौजूद हों (जीनत बानो मामले के निर्देशों का कड़ाई से पालन हो)।
- पूरा खाता फ्रीज करने के कारण बताना: यदि अपराध की प्रकृति, बार-बार संदिग्ध लेन-देन, मनी-म्यूल (Mule Account) के संकेत या रकम को अलग करने में असमर्थता के चलते पूरा खाता फ्रीज करना आवश्यक हो, तो इसके विशिष्ट कारण दर्ज कर बैंक को सूचित करने होंगे।
- मजिस्ट्रेट को जब्ती की सूचना: यदि कार्रवाई BNSS की धारा 106 के तहत जब्ती (Seizure) के दायरे में आती है, तो इसकी सूचना तत्काल संबंधित मजिस्ट्रेट को दी जानी चाहिए।
- कुर्की की वैधानिक प्रक्रिया (Attachment): अपराध की आय के रूप में संपत्ति कुर्क करने के लिए BNSS की धारा 107 के तहत सक्षम अदालत या मजिस्ट्रेट से आदेश प्राप्त करना होगा।
- नियमित समीक्षा (Periodic Review): जांच लंबित होने मात्र से रोक हमेशा जारी नहीं रह सकती; जांच अधिकारी और पर्यवेक्षी अधिकारी को समय-समय पर समीक्षा करनी होगी कि क्या रोक बरकरार रखना अभी भी आवश्यक है।
- अनावश्यक रोक तत्काल हटाना: यदि जांच में साबित हो जाए कि खाताधारक का अपराध से कोई लेना-देना नहीं है, तो तुरंत प्रभाव से खाते से रोक हटाई जानी चाहिए।
- जांच पूरी होने पर डी-फ्रीज: जांच समाप्त होने, क्लोजर रिपोर्ट दाखिल होने या खाताधारक के निर्दोष पाए जाने पर बिना किसी देरी के खाते को सामान्य (De-freeze) करने के निर्देश जारी किए जाएं।
- बैंक को विस्तृत जानकारी देना: बैंक को भेजे जाने वाले नोटिस में केस नंबर, खाता संख्या, विशिष्ट लेन-देन, विवादित राशि और कानूनी आधार का पूरा ब्योरा होना चाहिए।
- बैंक सीमित अनुरोध को पूर्ण फ्रीज में न बदलें: बैंक किसी एक लेन-देन पर होल्ड लगाने के निर्देश को स्वतः पूरे खाते के फ्रीज में परिवर्तित नहीं कर सकते, जब तक कि कानूनी रूप से ऐसा अनिवार्य न हो।
- केवाईसी/रेगुलेटरी प्रतिबंधों से अंतर: बैंक द्वारा अपने आंतरिक नियमों (KYC, AML, Fraud-Risk Management) के तहत लगाए गए प्रतिबंधों को पुलिस या साइबर सेल के अनुरोध पर की गई कार्रवाई से अलग रखा जाना चाहिए।
- मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) और ई-सत्यापन: 2 जनवरी 2026 के एसओपी के खंड 10 के तहत शिकायत निवारण तंत्र का कड़ाई से पालन हो। दूसरे राज्य की शिकायत होने पर भी खाताधारक की शिकायत की अनदेखी नहीं की जा सकती। खाताधारकों की समस्याओं का सत्यापन यथासंभव इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए किया जाए; व्यक्तिगत उपस्थिति केवल वास्तविक आवश्यकता पर ही मांगी जाए।
अपवाद की स्थितियां (जब पूरा खाता फ्रीज हो सकता है)
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दुर्लभ और असाधारण मामलों में पूरे खाते पर रोक लगाई जा सकती है, जैसे:
- जब खाता जानबूझकर साइबर ठगी के पैसों के लेन-देन के लिए ‘मनी म्यूल’ के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा हो।
- जब खाते में बार-बार संदिग्ध रकम का आना और आगे ट्रांसफर होना दर्ज हो।
- जब धोखाधड़ी में खाताधारक की सक्रिय संलिप्तता के प्रमाण हों या खाते में मौजूद पूरी रकम के अपराध की कमाई होने का पुख्ता संदेह हो।
हाईकोर्ट के दिशा-निर्देश बिंदुवार समझें
- केवल विवादित राशि पर ही होल्ड लगे
- यदि किसी खाते में केवल ₹100, ₹1,000 या ₹10,000 का संदिग्ध ट्रांजैक्शन हुआ है, तो पूरी जमा पूंजी वाले खाते को पूरी तरह से बंद (Blanket Debit Freeze) नहीं किया जा सकता। केवल विवादित राशि पर लियन मार्क किया जाना चाहिए।
- पूरा खाता फ्रीज करने के लिए लिखित कारण जरूरी
- खाता पूरी तरह से तभी फ्रीज किया जाएगा जब वह ‘म्यूल अकाउंट’ (Mule Account) हो, आरोपी बार-बार धोखाधड़ी के पैसे मंगा रहा हो, या अपराध की प्रकृति ऐसी हो जहां फंड को अलग करना असंभव हो। ऐसे मामलों में जांच अधिकारी को लिखित में कारण दर्ज करने होंगे।
- मैजिस्ट्रेट को तुरंत देनी होगी सूचना (BNSS Sec 106 & 107)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 106 के तहत अगर संपत्ति जब्ती (Seizure) की जाती है, तो जांच अधिकारी को तुरंत सक्षम मैजिस्ट्रेट को रिपोर्ट करना अनिवार्य है।
- संपत्ति कुर्की (Attachment) के लिए BNSS की धारा 107 के तहत अदालत से विधिवत आदेश प्राप्त करना होगा।
- अन्वेषण समाप्त होते ही तुरंत अनफ्रीज करें
- जांच एजेंसियों और बैंकों को समय-समय पर खातों की समीक्षा करनी होगी। यदि खाताधारक की संलिप्तता नहीं पाई जाती है या जांच समाप्त हो जाती है, तो बैंक खाते पर लगी पाबंदी को बिना किसी देरी के तुरंत हटाया जाना चाहिए।
- बैंक स्वतः संज्ञान लेकर पूरा खाता बंद न करें
- पुलिस द्वारा किसी विशिष्ट ट्रांजैक्शन की जानकारी देने पर बैंक यांत्रिक रूप से पूरे खाते को डेबिट-फ्रीज न करें। बैंक की खुद की KYC/Anti-Money Laundering कार्रवाई को पुलिस के अनुरोध पर की गई कार्रवाई से अलग रखा जाना चाहिए।
अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी
न्यायमूर्ति आनंद शर्मा ने फैसला सुनाते हुए कहा: साइबर अपराध की गंभीरता किसी निर्दोष नागरिक के खिलाफ मनमानी राज्य कार्रवाई का औचित्य नहीं बन सकती। जांच शक्तियों का प्रयोग संवैधानिकता, वैधानिकता और आनुपातिकता (Proportionality) के सिद्धांतों के तहत होना चाहिए। अदालत ने राजस्थान पुलिस, साइबर क्राइम विंग और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को 8 सप्ताह के भीतर इन दिशानिर्देशों के अनुपालन का हलफनामा हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश दिया है।
अनुपालन रिपोर्ट
राजस्थान उच्च न्यायालय ने राजस्थान पुलिस, साइबर क्राइम विंग और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को निर्देश दिया है कि वे इन दिशानिर्देशों के क्रियान्वयन के संबंध में आठ सप्ताह के भीतर उच्च न्यायालय के महापंजीयक (Registrar General) को अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) प्रस्तुत करें।
केस अवलोकन (Case Snapshot)
| पहलू | विवरण |
| अदालत | राजस्थान उच्च न्यायालय (High Court of Rajasthan) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति आनंद शर्मा (Justice Anand Sharma) |
| मुख्य याचिकाकर्ता | बालाजी एंटरप्राइजेज (Balaji Enterprises v. RBI) |
| मूल सिद्धांत | अनुपातिकता का सिद्धांत (Principle of Proportionality) |
| प्रमुख निर्देश | पुलिस व RBI 8 सप्ताह में हाईकोर्ट के समक्ष अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) पेश करें। |

