Tuesday, October 6, 2026
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Right to marry: विवाह का अधिकार एक मानव अधिकार है; पुनर्विवाह में बाधाओं को दूर करने के लिए हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन का दिया सुझाव

मुख्य बिंदु (Key Indicators)

  • हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 15 में बदलाव का सुझाव: कोर्ट ने सुझाव दिया कि अपील दायर करने वाले व्यक्ति को अपील की तिथि से दो महीने के भीतर तलाक की डिक्री पर अंतरिम स्थगन (Interim Stay) प्राप्त करना अनिवार्य होना चाहिए।
  • धारा 15 की कठोर व्याख्या: विवाह के अधिकार को मानव अधिकार मानते हुए कोर्ट ने कहा कि धारा 15 जैसी पाबंदियों की न्यायिक व्याख्या अत्यंत सख्त होनी चाहिए।
  • अपील खारिज (Dismissed) होने का प्रभाव: यदि तलाक के खिलाफ अपील डिफॉल्ट या गैर-पैरवी (Non-prosecution) के कारण खारिज हो जाती है, तो धारा 15 के तहत लगी रोक तुरंत समाप्त हो जाएगी।
  • पुनर्विवाह और अपील की बहाली: यदि अपील खारिज होने के बाद पीड़ित पक्ष ने पुनर्विवाह कर लिया है, तो बाद में अपील को बहाल करने (Restoration) की याचिका निष्फल (Infructuous) मानकर खारिज कर दी जाएगी।
  • चरित्र पर संदेह करना ‘क्रूरता’: जीवनसाथी के चरित्र पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष (Insinuation) रूप से संदेह व्यक्त करना धारा 13(1)(i-a) के तहत मानसिक क्रूरता का आधार है।

Right to marry: मद्रास हाईकोर्ट ने माना है कि “विवाह करने का अधिकार एक मानव अधिकार है” (Right to marry is a human right) और पुनर्विवाह पर रोक लगाने वाली शर्तों की व्याख्या कड़ाई से की जानी चाहिए।

न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति एम.डी. सुमति की पीठ ने (मुथुकुमार बनाम लेखा) मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) की धारा 15 में संशोधन करने का सुझाव दिया। न्यायालय ने कहा कि तलाक की डिक्री के खिलाफ केवल अपील दायर कर देने मात्र से सफल पक्षकार को सालों तक पुनर्विवाह करने से अनिश्चित काल के लिए नहीं रोका जा सकता।

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मद्रास हाईकोर्ट के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं सुझाव

  1. धारा 15 (Section 15 HMA) में संशोधन का प्रस्ताव
    • वर्तमान में, धारा 15 के तहत तलाकशुदा व्यक्ति केवल तभी पुनर्विवाह कर सकता है जब अपील का अधिकार न हो, अपील की समय-सीमा समाप्त हो गई हो, या दायर की गई अपील खारिज कर दी गई हो।
    • पीठ ने सुझाव दिया कि केवल निर्धारित समय के भीतर अपील दायर करना ही काफी नहीं होना चाहिए। अपीलकर्ता को अपील दायर करने के 2 महीने के भीतर तलाक की डिक्री पर अंतरिम स्टे (Interim Stay) भी प्राप्त करना अनिवार्य होना चाहिए।
  2. अपील खारिज (Dismissed for Default) होने का प्रभाव
    • कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 15 में ‘अपील खारिज’ शब्द में डिफ़ॉल्ट या गैर-पैरवी (Non-prosecution) के कारण खारिज हुई अपीलें भी शामिल हैं।
    • यदि अपील डिफ़ॉल्ट में खारिज हो जाती है, तो पुनर्विवाह पर लगी रोक समाप्त हो जाती है। यदि इस दौरान दूसरा पक्ष पुनर्विवाह कर लेता है, तो बाद में अपील की बहाली (Restoration) की अर्जी निष्फल (Infructuous) मानी जाएगी।
  3. चरित्र पर संदेह करना ‘क्रूरता’ (Cruelty)
    • तलाक की डिक्री को बरकरार रखते हुए पीठ ने माना कि जीवनसाथी के चरित्र पर संदेह करना—चाहे वह प्रत्यक्ष (Explicit) हो या इशारों में (Insinuation)—हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i-a) के तहत मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।
  4. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का संदर्भ (Lila Gupta Case)
    • हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के लीला गुप्ता बनाम लक्ष्मी नारायण फैसले का जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि धारा 15 का उल्लंघन करके किया गया पुनर्विवाह अमान्य (Void or Voidable) नहीं होता है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि वर्तमान नियम एक असामान्य स्थिति पैदा करते हैं जहाँ एक वैध पुनर्विवाह को वर्षों तक लंबित अपील के अनिश्चित परिणाम पर निर्भर कर दिया जाता है।

मामले के मुख्य तथ्य और कानूनी विश्लेषण

यह मामला एक फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील से जुड़ा था, जिसमें क्रूरता और परित्याग (Desertion) के आधार पर विवाह को भंग कर दिया गया था। अपील लंबित रहने के दौरान ही महिला ने पुनर्विवाह कर लिया। अदालत में मुख्य सवाल यह उठा कि क्या बिना किसी अंतरिम स्थगन (Interim Stay) के अपील के दौरान किया गया पुनर्विवाह वैध है?

धारा 15 की वर्तमान स्थिति और विसंगति वर्तमान में धारा 15 के तहत कोई व्यक्ति केवल तीन स्थितियों में पुनर्विवाह कर सकता है।

  1. जब अपील का कोई अधिकार न बचा हो।
  2. जब अपील दायर करने की समय-सीमा बीत चुकी हो।
  3. जब दायर की गई अपील खारिज कर दी गई हो।

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले लीला गुप्ता बनाम लक्ष्मी नारायण का उल्लेख करते हुए कहा कि धारा 15 के उल्लंघन में किया गया विवाह न तो शून्य (Void) होता है और न ही शून्यकरणीय (Voidable)। ऐसे में, वर्षों तक चलने वाली अपीलों के कारण सफल पक्षकार को अनिश्चितता में छोड़ देना न्यायसंगत नहीं है।

सामाजिक बदलाव और विधिक सुधार की आवश्यकता

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की, “तलाक की अपीलें तय होने में सालों लग जाते हैं। बदलते सामाजिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए धारा 15 में संशोधन जरूरी है। केवल अपील दायर कर देना ही काफी नहीं होना चाहिए, बल्कि अपीलाथी को दो महीने के भीतर स्थगन आदेश भी हासिल करना होगा।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चरित्र पर संदेह करना वैवाहिक संबंधों में क्रूरता की श्रेणी में आता है, जिसके आधार पर दिया गया तलाक का फैसला पूरी तरह जायज है। अंततः हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के तलाक के फैसले को बरकरार रखा।

केस अवलोकन टेबल (Case Snapshot)

पहलूविवरण
अदालत / पीठमद्रास उच्च न्यायालय (न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन एवं न्यायमूर्ति एम.डी. सुमति)
मामलामुथुकुमार बनाम लेखा (Muthukumar Vs Lekha)
मुख्य कानूनी प्रावधानहिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 15 (पुनर्विवाह की शर्तें) और धारा 13(1)(i-a) (क्रूरता)
मुख्य सिफारिशधारा 15 में संशोधन: अपील दायर करने के 2 महीने के भीतर अंतरिम स्टे प्राप्त करना अनिवार्य हो।
कानूनी सिद्धांतचरित्र पर संदेह करना क्रूरता है; विवाह का अधिकार मानव अधिकार है।
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